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अंतर्ध्वनि: जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है, जो वृथा मोहों को रौंदती है

Tue, 03 Sep 2019 02:35 AM IST
Nilesh Kumar हजारी प्रसाद द्विवेदी
हजारी प्रसाद द्विवेदी Published by: Nilesh Kumar Updated Tue, 03 Sep 2019 02:35 AM IST
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Biographical power is very ruthless, which tramples the great attachments
सांकेतिक तस्वीर

अशोक के फूल फिर आ गए हैं। इन छोटे-छोटे, लाल-लाल पुष्पों के मनोहर स्तवकों में कैसा मोहन भाव है! बहुत सोच-समझकर कंदर्प देवता ने लाखों मनोहर पुष्पों को छोड़कर सिर्फ पांच को ही अपने तूणीर में स्थान देने योग्य समझा था। एक यह अशोक ही है। लेकिन पुष्पित अशोक को देखकर मेरा मन उदास हो जाता है।

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इसलिए नहीं कि सुंदर वस्तुओं को हतभाग्य समझने में मुझे कोई विशेष रस मिलता है। कुछ लोगों को मिलता है। वे बहुत दूरदर्शी होते हैं। जो भी सामने पड़ गया, उसके जीवन के अंतिम मुहूर्त तक का हिसाब वे लगा लेते हैं। मेरी दृष्टि इतनी दूर तक नहीं जाती। फिर भी मेरा मन इस फूल को देखकर उदास हो जाता है। असली कारण तो मेरे अंतर्यामी जानते होंगे, कुछ थोड़ा-सा मैं भी अनुमान कर सका हूं। भारतीय साहित्य में, इसलिए जीवन में भी इस पुष्प का प्रवेश और निर्गम, दोनों ही विचित्र नाटकीय व्यापार हैं।
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ऐसा तो कोई नहीं कह सकेगा कि कालिदास के पूर्व भारतवर्ष में इस पुष्प का कोई नाम ही नहीं जानता था। लेकिन कालिदास के काव्यों में यह जिस शोभा और सौकुमार्य भाव का भार लेकर प्रवेश करता है, वह पहले कहां था! उस प्रवेश में नववधू के गृह-प्रवेश की शोभा है, गरिमा है, पवित्रता है और सुकुमारता है।
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अशोक का वृक्ष जितना भी मनोहर हो, जितना भी रहस्यमय हो, जितना भी अलंकारमय हो, परंतु है वह उस विशाल सामंत-सभ्यता की परिष्कृत रुचि का ही प्रतीक, जो साधारण प्रजा के परिश्रमों पर पली थी। वे सामंत उखड़ गए, समाज ढह गए और मदनोत्सव की धूमधाम भी मिट गई। दुनिया अपने रास्ते चली गई, अशोक पीछे छूट गया। मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है। न जाने कितने धर्माचारों, विश्वासों, उत्सवों और व्रतों को धोती-बहाती यह जीवन-धारा आगे बढ़ी है। संघर्षों से मनुष्य ने नई शक्ति पाई है।


-दिवंगत हिंदी साहित्यकार।
 

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