अंतर्ध्वनि: ईमानदार लेखक भ्रम और उत्तेजना के बीच जीता है
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हिंदी में लेखक होने का अर्थ है, निरंतर उन जगहों द्वारा घूरे जाना, जो आपको अपराधी समझती हैं। साहित्य में या महज जीवन जीने के लिए आप कुछ कीजिए, वे निगाहें आपको लगातार एहसास देंगी कि आप गलत हैं, घोर स्वार्थी हैं, हल्के हैं आदि। लेखक के रूप में आप यात्री बनें, तो यह तैयारी मन में कर लेते हैं कि यात्रा कठिन होगी, मंजिल अनिश्चित और अनजानी है, सुख केवल चलने और चलते रहने भर का है। संकरे रास्ते और तंगदिल लोगों के आक्रामक समूहों से जूझते हुए चलने का प्रयत्न करना साहित्य में जीना है। हिंदी में लेखक का आस-पास बहुत भयावना और निर्मम होता है। वह हमला न भी करे, तो भी उसे बचाव की लड़ाई लड़नी ही पड़ती है। यहां (हिंदी में) केवल आरोप लगते हैं और निर्णय दिए जाते हैं। बल्कि आरोप ही अंतिम निर्णय होते हैं। यहां (हिंदी में) ‘आत्मकथ्य’ केवल एक शब्द भर है। यहां आत्मा को शक से देखा जाता है और कथ्य पर कोई भरोसा नहीं करता। अक्सर हिंदी का ईमानदार लेखक भ्रम और उत्तेजना के बीच की जिंदगी जीता है। लिखने के लिए मुझे कुछ नहीं चाहिए। थोड़ी-सी धूप, ठंडी हवा, बढ़िया कागज़ और एक ऐसी कलम, जो बीच में न रुके। एकाध चाय। मैं आपको एक सुंदर रचना देने का वादा करता हूं। पर इस धूप की गारंटी नहीं है हिंदी में। कितनी बार, कितने घर, कितने कमरे, कितने आंगन बदलता हुआ मैं आज भी अपने जीवन को लेकर अनिश्चित हूं। यहां जीवन जीने की साफ-सुथरी स्थिति नहीं मिलती। और मैं चूंकि व्यंग्य लिखता हूं, इसलिए मेरे लिए तो ऐसी स्थिति मिलने का प्रश्न ही नहीं है। लिखना पूर्वजन्म का कोई दंड झेलना है। इसे निरंतर झेले बिना इससे मुक्ति नहीं। मैं झेल रहा हूं। पर मुझसे कहा जाए कि इस जन्म में भी आप पाप कर रहे हैं, तो यह मुझे स्वीकार नहीं।
-हिंदी के दिवंगत साहित्यकार-व्यंग्यकार