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अंतर्ध्वनि : बोलना सुनने से बड़ा है, जैसे बनाना तोड़ने से बड़ा है

Wed, 22 May 2019 08:37 PM IST
अमर शर्मा रघुवीर सहाय
रघुवीर सहाय Published by: अमर शर्मा Updated Wed, 22 May 2019 08:37 PM IST
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antardhwani : Speaking is bigger than hearing, just like creation is bigger than destruction
बोलना (सांकेतिक) - फोटो : pexels
बोलने में एक सुख है, कोई सुने चाहे न सुने। सुननेवाले के लिए यही बात उलट कर नहीं कही जा सकती; सुनने में एक सुख है, मगर यह तो नहीं कि वह सुख रहेगा ही, कोई बोले चाहे न बोले। इसी से बोलता हूं अर्थात कहता हूं कि बोलना सुनने से कुछ बड़ा है... जैसे किसी कवि की वह पंक्ति है...'बनाना तोड़ने से कुछ बड़ा है।' 
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हालांकि शताब्दियों से लोग सुनने के उत्सुक चले आ रहे हैं। और इस दिशा में सबसे अधिक उपलब्धि उन कवियों को हुई है, जो इधर सृष्टि का निखिल मौन संगीत सुनते रहे, प्रेमिका का मूक स्वरों में अनुरोध भी। और आज तो हमें कोई सौ बातें सुनाता है, कोई सुना-सुनाकर कुछ कहता है और हमारी कहीं सुनवाई नहीं होती। फिर भी हम अनुरोध करते हैं, 'बोलो प्रभु, कब सुनोगे।' यह इसीलिए कि हम सुनने के आदी हो गए हैं और सुनना हीन है, बोलना श्रेष्ठ।
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सुनते हैं, मौन रहना स्वास्थ्यदायक भी होता है। मौन-व्रत रखने से वृथा नष्ट होनेवाली शक्ति संचित होती है। जब मन अविश्वास और विफलता से दुर्बल हो उठे, तब मौन ही शक्ति देता है। और मौन रहने का कारण यदि यह हो कि समझ में नहीं आता क्या कहें, तो थोड़ी देर मौन रहकर सोच ही लेना अच्छा है कि क्या कहें। परंतु यदि मौन रहने का कारण यह है कि 'साइलेंस इज गोल्ड' तो यह जान लीजिए कि बिना जरूरत बोल पड़ने का पश्चाताप उतना कभी नहीं होता, जितना जरूरत होते हुए चुप रह जाने का। मन पछताया करता है कि मैंने यह क्यों नहीं उस समय कहा। यह इसीलिए कि बोलना ही हमारा श्रेष्ठ कर्तव्य है, अभिव्यक्ति का सरलतम माध्यम भी है, और न बोलकर हम रह नहीं सकते, आप न सुनें, वह तो सुनेंगे।
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-दिवंगत हिंदी कवि
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