सामंती प्रसन्नता और दबंगई के आगे बेबस
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दिल्ली की एक अदालत में अपनी बेटी खो चुके एक पिता ने समाज में खुशी के मौके पर की जाने वाली गोलीबारी पर रोक लगाने की मांग करते हुए दिशा-निर्देश जारी करने की गुहार लगाई है। श्यामसुंदर नामक इस व्यक्ति की 17 वर्षीय बेटी की मौत पिछले महीने बारातियों द्वारा की गई फाइरिंग से तब हो गई, जब वह गली से गुजर रही बारात को देख रही थी। सिर्फ दिल्ली ही नहीं, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार आदि उत्तर भारतीय राज्यों में खुशी के मौके पर फाइरिंग रूपी दबंगई या कहें कि दिखावे की सामंती परंपरा एक लाइलाज मर्ज बनती जा रही है। लापरवाही से किसी दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने वाले मामलों में धारा 336 के तहत मुकदमा दायर हो सकता है, लेकिन शादी जैसे शुभ कार्य और रिश्तेदारी आदि की दुहाई देकर ऐसे मामलों को दबा दिया जाता है।
समस्या का एक पहलू यह है कि देश में छोटे हथियारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। संभवत: ऐसे हथियार ज्यादातर गैरलाइसेंसी होते हैं। छोटे हथियारों से की गई फायरिंग कितनी जानलेवा साबित हो रही है, इससे संबंधित एक आंकड़ा हाल ही में सामने आया है। इसके अनुसार, वर्ष 2014 में छोटे हथियारों से की गई फायरिंग के कारण हुई दुर्घटनाओं में प्रति दिन दो लोगों की मौत हुई। पिछले एक दशक में खुशी के मौके पर फायरिंग जैसी घटनाओं में कुल मिलाकर 15 हजार से अधिक जानें गई हैं, जिनमें दो-तिहाई मौतें अकेले उत्तर प्रदेश में हुईं।
गौरतलब है कि कई बार हादसों में घायल या मृत होने वाले लोगों में वे शामिल होते हैं, जिनका संबंधित शादी समारोह से कोई लेना-देना नहीं होता है। बारात निकलते वक्त सड़क किनारे से गुजरने वाले राहगीर या उस रास्ते के घरों की छत अथवा छज्जे से झांकते लोग ऐसी फाइरिंग की चपेट में आ जाते हैं। हाल में कानपुर में एक तिलक समारोह के दौरान पड़ोस के घर के छज्जे से झांक रही किशोरी की तमंचे से कई गई फायरिंग में मृत्यु हो गई थी।
ऐसी घटनाएं दो-तीन बातें स्पष्ट कर रही हैं। पहली बात यह है कि अब हथियार बड़ी आसानी से लोगों को हासिल हो रहे हैं। दूसरी अहम बात यह है कि हमारे समाज में दिखावे के साथ-साथ दबंगई भी बढ़ रही है। शादी समारोहों में महंगी आतिशबाजी करना दिखावे का संकेत है, जिस पर अब तक कोई रोक नहीं लग पाई है। विडंबना यह है कि पैसे वालों के साथ-साथ कुछ जानी-मानी हस्तियों में अथवा उनके रिश्तेदारों में भी दबंगई का यह भाव विद्यमान रहता है।
आखिर इस समस्या का समाधान क्या है? इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट यह निर्देश दे चुका है कि शादियों के दौरान अथवा किसी अन्य आयोजन के दौरान फायरिंग जैसी कोई घटना न होने पाए। लेकिन अनगिनत हादसे बताते हैं कि अदालतों के निर्देशों की कोई परवाह नहीं की जा रही है। खुद प्रशासन भी इनका स्वत: संज्ञान लेने से बचता है, क्योंकि उसे लगता है कि स्थानीय लोग प्रशासन के खिलाफ हो जाएंगे।
इसमें एक पक्ष जनता की जागरूकता का भी है। लोगों को जागरूक करने एक पहल राजनेताओं को भी करनी होगी। हालांकि कई बार खुद राजनेता भी ऐसी चीजों में शामिल हो जाते हैं, जिससे जनता में यही संदेश जाता है कि इसमें कोई हर्ज नहीं है। अच्छा हो कि यदि प्रशासन ऐसे मामलों में सख्ती बरते।