एफडीआई हर मर्ज की दवा नहीं
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निवेशक हमें मशविरा देते हैं कि एफडीआई से देश का आर्थिक परिदृश्य बदल सकता है और भारत ऐसे में चीन की स्थिति में पहुंच सकता है। वर्ष 2015 में 63 अरब डॉलर के विदेशी निवेश आकर्षित करने के बाद विदेशी गंतव्य के रूप में तेजी से उभरता भारत चीन की जगह ले रहा है। हालांकि, इसे भारत में निवेश चक्र के पुनरुद्धार का संकेतक मानना जल्दबाजी होगी, क्योंकि ऐसे बदलाव होने में करीब एक दशक लग जाते हैं। इन आंकड़ों से एक अलग तस्वीर का पता चलता है। 2015 की पहली छमाही में भारत मंे 31 अरब डॉलर सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया, प्रत्यावर्तन और विनिवेश के लिए कटौती से यह घटकर 20.4 अरब डॉलर रह जाएगा।
इसके अलावा, मेक इन इंडिया के जरिये होने वाले निर्यात का समर्थन करने के बजाय बढ़ते प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को घरेलू मांग से जोड़कर देखने की जरूरत है। उल्लेखनीय है कि हर तरह के एफडीआई से मिलने वाली रकम का 68 प्रतिशत हिस्सा आईटी, टेलीकम्युनिकेशन्स, ई-कॉमर्स, कैश ऐंड कैरी, ट्रेडिंग एवं ऑटोमोबाइल सेक्टर में आया है। रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि 2013 के बाद से, उपभोक्ता प्रौद्योगिकी और बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं एवं बीमा के क्षेत्र में उद्यम पूंजी/प्राइवेट इक्विटी फंड के प्रदर्शन में सुधार हुआ है। धातु, तेल एवं गैस, बिजली या फिर रोजगार देने वाले कंस्ट्रक्शन जैसे क्षेत्र, जो निवेश के लिए मुफीद माने जाते हैं, में 2015 में 9.3 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश देखा गया। इसी तरह होटल एवं पर्यटन कारोबार में विदेशी निवेश महज 3.2 प्रतिशत रहा, जिसे धीमा विकास ही कहा जा सकता है।
आने वाले समय में स्थिति क्या होगी, यह अभी अनिश्चित है। 2013 में, आर्सेलर मित्तल ने ओडिशा में प्रस्तावित 1.2 करोड़ टन क्षमता के इस्पात संयंत्र को रद्द कर दिया, जिसमें पचास हजार करोड़ का निवेश होना था। इसके लिए भूमि अधिग्रहण और लौह अयस्क ब्लॉक के आवंटन से जुड़े मुद्दों को जिम्मेदार बताया गया। ऑगेरे वायरलेस ने 4 जी लाइसेंस के लिए 125 करोड़ रुपये का भुगतान किया, जो अगले तीन से पांच साल में 270 करोड़ रुपये का निवेश करने की इच्छुक थी, और फिर दो राज्यों में 4 जी स्पेक्ट्रम बेचकर मई, 2012 में भारत को अलविदा कह दिया। ओडिशा पावर जेनरेशन कॉरपोरेशन में 49 प्रतिशत की हिस्सेदार एईएस पावर 1.43 करोड़ डॉलर का निवेश कर रही है। नवंबर, 2011 से भारत में परिचालन शुरू करने वाली इस कंपनी को भी पावर सेक्टर में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। वर्ष 2012 में वेदांता ने बिहार में हेल्थकेयर एवं शिक्षा क्षेत्र में 100 करोड़ रुपये निवेश करने का वायदा किया था। चार साल बीत चुके हैं, लेकिन अब तक एक रुपया भी लाभार्थियों तक नहीं पहुंच सका है। ठप परियोजनाओं की संख्या बढ़ रही है, तो इसके लिए प्रमोटरों की रुचि में कमी ही है। स्पष्ट है कि समाज को कोई फायदा पहुंचाने के बजाय कॉरपोरेट जगत की इन घोषणाओं के पीछे मुनाफा कमाने और मीडिया में बने रहने की मानसिकता ही होती है।
आमतौर पर निवेशकों के सम्मेलनों को सफल ही बताया जाता है, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। निवेश का बहुत छोटा-सा हिस्सा ही वास्तव में फलित हो पाता है। ज्यादातर राज्य इस मामले में विफल ही रहे हैं। पश्चिम बंगाल के हालिया निवेशकों के सम्मेलन को लें, जिसमें तथाकथित रूप से 2.43 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव की बात कही गई थी। निवेश का एक बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार की ओर से दिया गया था, वहीं 84 हजार करोड़ रुपये हाउसिंग एवं औद्योगिक पार्कों के लिए आवंटित किए गए थे। कानून-व्यवस्था की समस्या से जूझते उत्तर प्रदेश में 'मेक इन यूपी' के लिए सरकार को एफडीआई चाहिए, जबकि वहां मौजूदा औद्योगिक इकाइयों को ढांचागत, प्रक्रियात्मक एवं कानूनी मुद्दों से जूझना पड़ रहा है। दूसरी ओर राज्य से पूंजी का पलायन बढ़ रहा है। राज्य की औद्योगिक नीति (2006) के तहत मिलने वाले प्रोत्साहन, जिसका वायदा किया गया था, में देरी के कारण टाटा मोटर्स आंशिक रूप से उत्पादन उत्तराखंड में स्थानांतरित कर रहा है। आगरा एवं ताज बिजनेस समिट के आयोजन के बावजूद नोएडा-ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में अब तक कोई बड़ा औद्योगिक विकास देखने को नहीं मिला है।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में एफडीआई बहुत प्रभावी नहीं रहा है। वर्ष 2000 से 2012 के दौरान इस सेक्टर को कुल एफडीआई का महज एक तिहाई हिस्सा ही मिल सका है। वर्ष 2004-05 में सोनी इंडिया ने अपना परिचालन बंद करके आयातित उत्पाद बेचना शुरू कर दिया। इसी तरह सैमसंग इंडिया भी मैन्युफैक्रिंग के बजाय उत्पादों की एसेंब्लिंग अधिक कर रही है। इसके लिए कई कारण जिम्मेदार रहे हैं- असंगत कर ढांचा इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है।
एफडीआई हमारी विकास से जुड़ी चुनौतियों का एकमात्र इलाज नहीं है। वैश्विक पूंजी निर्माण में इसकी हिस्सेदारी 2007 के चौदह प्रतिशत से घटकर 2015 में नौ प्रतिशत रह गई थी। भारत में भी सकल पूंजी निर्माण में एफडीआई की भूमिका घटी है। अगले दो दशक में भारत को शहरों के विकास के लिए 12 खरब डॉलर निवेश की जरूरत होगी, जिसका अधिकांश सरकारी फंडिंग के अलावा म्यूनिसिपल फाइनेंस, भू-परिसंपत्तियों के मौद्रीकरण, संपत्ति कर की उगाही और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप से जुटाया जा सकता है।
उन्हीं क्षेत्रों में एफडीआई को प्रोत्साहन देना चाहिए, जिनमें टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की क्षमता मौजूद है। औद्योगिक लाइसेंसिंग, विदेशी निवेश के नियमों में सुधार समेत सरकार ने कई कदम उठाए हैं। टिकाऊ निवेश को आकर्षित करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों को ध्यान में रखकर मजबूत नीतियों का निर्माण जरूरी है, जो दीर्घकालीन वैश्विक पूंजी निर्माण में मददगार साबित हो सकें। इन्वेस्टमेंट समिट और इक्विटी प्रवाह को मीडिया में हवा दी जाती है। इस तरह का निवेश अस्थिर होता है। इसके बजाय ढांचागत सुविधाओं के निर्माण और औद्योगिक परियोजनाओं में निवेश होता है, तो उसे ज्यादा टिकाऊ माना जा सकता है।