विश्व जल दिवस 2021: जलसंकट से जूझ रहा है भारत, गांवों, महानगरों में पेयजल बना बड़ी समस्या
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भारत में 'जल ही जीवन है' का मुहावरा काफी प्रचलित है, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ देश की अधिकांश जनसंख्या को नहीं पता है, क्योंकि वो पानी के महत्व को न ठीक से समझते हैं ना ही ठीक से समझना चाहते हैं। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र ने विश्व के सभी देशों को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि पानी की बर्बादी को जल्द नहीं रोका गया तो जल्दी ही विश्व गंभीर जल संकट से गुजरेगा। दुनिया की आबादी जिस तरह से बढ़ रही है सबको स्वच्छ पेयजल मुहैया कराना विश्व के सभी देशों खासकर विकासशील देशों के लिए एक चुनौती है।
जलवायु में बदलाव व चुुुुुनौतियां
संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल विकास रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन से पानी की उपलब्धता पर प्रभाव पड़ेगा, जिसकी वजह से वैश्विक खाद्य उत्पादन का मौलिक स्वरूप बदल सकता है। इस तरह आने वाले समय में मौसम में छोटे से छोटा बदलाव भी खाद्य असुरक्षा (खाद्य कीमतों में वृद्धि) और ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी की घटनाओं को बढ़ा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र के शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) और यूएन वॉटर के सहयोग से तैयार वर्ड वाटर डेवलपमेंट रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि विश्व को अगले कई दशकों तक जल असुरक्षा और जलवायु परिवर्तन, दो बड़े संकटों का सामना करना पड़ेगा।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार दुनियाभर में 86 फीसदी से अधिक बीमारियों का कारण असुरक्षित व दूषित पेयजल है। वर्तमान में 1600 जलीय प्रजातियां जल प्रदूषण के कारण लुप्त होने के कगार पर हैं। विश्व में 1.10 अरब लोग दूषित पेयजल पीने को मजबूर हैं और साफ पानी के बगैर अपना गुजारा कर रहे हैं।
जलसंकट और भारत
पिछले दिनों एक वैश्विक संस्था नेचर कंजरवेंसी ने साढ़े सात लाख से अधिक आबादी वाले 500 शहरों का जल ढांचे का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि भारत के भी कई शहर गंभीर जल संकट से गुजर रहे हैं और अगर समय रहते इसके लिए प्रबंध नहीं किए गए तो आने वाले समय में यहां विकराल स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। देश के कई छोटे मझोले शहरों के साथ ही दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बंगलुरू और हैदराबाद जैसे बड़े महानगर भी जल संकट से जूझ रहे हैं।
देश में पानी के अधिकांश स्थानीय स्रोत सूख चुके हैं या उनका अस्तित्व नहीं रह गया है। देश की सैकड़ों छोटी नदियां विलुप्ति के कगार पर हैं, देश के अधिकांश गांव और कस्बों में तालाब और कुएं भी बिना संरक्षण के सूख चुके हैं। देश के अधिकांश जगहों में गंगा और यमुना अत्यधिक प्रदूषित हैं, जिसकी वजह से इसका पानी भी पीने योग्य नहीं रह गया है। कुल मिलाकर देश में जल संकट और जल संरक्षण को लेकर बहुत ज्यादा संजीदगी नहीं दिख रही है।
जल संरक्षण की दिशा में कुछ सार्थक प्रयास भी हो रहे हैं, मसलन मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य झाबुआ जिले में लोग सामूहिक रूप से जल संरक्षण के लिए हलमा के जरिए प्रयास कर रहे हैं। दरअसल, हलमा भीली बोली का शब्द है, जिसका मतलब होता है- 'सामूहिक श्रमदान'। झाबुआ जिले के हाथीपावा की पहाड़ी पर पानी को रोकने के लिए सैकड़ों ग्रामीण कंटूर बना रहे हैं, ताकि बारिश के पानी को रोककर इस पहाड़ी के जंगल को एक बार फिर से तैयार किया जाए।
इस काम में बच्चे, बूढ़े और जवान अपना योगदान दे रहे हैं। मध्य प्रदेश के सागर जिले की आदिवासी बाहुल्यता वाली केसली जनपद पंचायत की एक ऐसी ही ग्राम पंचायत मरामाधो है, जहां के 2 हजार 246 लोगों ने अपनी मेहनत के बलबूते और सरकारी पहल के बल पर अपने पंचायत क्षेत्र को सिंचित बना लिया है। इसका सुखद परिणाम ही है कि कभी बारिश के चार माह बाद भी पानी को तरसने वाले ग्रामीण अब जल संकट से छिड़ी जंग को लगभग जीत चुके हैं।
पेयजल होगा दुनिया के लिए चुनौती
जिस तरह दुनिया से पानी गायब होना शुरू हो रहा है, ऐसे में आने वाले समय में पानी झगड़ों का सबसे बड़ा कारण बनेगा। पानी की किल्लत व लड़ाई सिर्फ गली-कूचों तक नहीं रहने वाली, राज्यों व देशों के बीच नदियों का झगड़ा इसका उदाहरण है। हरियाणा, पंजाब और दिल्ली का झगड़ा हो या फिर कावेरी नदी के लिए कर्नाटक और तमिलनाडु की लड़ाई हो, मुद्दा पानी ही है। दूसरी तरफ ब्रह्मपुत्र के लिए चीन, भारत व बांग्लादेश का टकराव इसका उदाहरण है।
सच्चाई यह है कि भारत भी पानी के मामले में गंभीर जल संकट की स्तिथि से गुजर रहा है और अगर समय रहते इसके लिए प्रबंध नहीं किए गए तो आने वाले समय में यहां विकराल स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। देश में पानी के अधिकांश स्थानीय स्रोत सूख चुके हैं या उनका अस्तित्व नहीं रह गया है।
देश की सैकड़ों छोटी नदियां विलुप्ति के कगार पर हैं, देश के अधिकांश गांव और कस्बों में तालाब और कुएं भी बिना संरक्षण के सूख चुके हैं। देश के अधिकांश जगहों में गंगा और यमुना अत्यधिक प्रदूषित हैं जिसकी वजह से इसका पानी भी पीने योग्य नहीं रह गया है। फिर भी देश में जल संकट और जल संरक्षण को लेकर बहुत ज्यादा संजीदगी नहीं दिख रही है।
भारत के कई हिस्सों में पेयजल किल्लत इस कदर बढ़ गई है कि उसका लाभ उठाने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां आगे आ गई हैं। कुछ ने जमीन से पानी निकाल कर तो कुछ ने सामान्य जल आपूर्ति के जरिए मिलने वाले पानी को ही बोतल बंद रूप में बेचना शुरू कर दिया है। देश में बोतल बंद पानी का व्यवसाय लगातार बढ़ता जा रहा है।
नि:संदेह यह कोई खुशखबरी नहीं। तमाम शहरी इलाकों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में औसत गृहणियों का अच्छा-खासा समय पेयजल एकत्रित करने में बर्बाद हो जाता है। चिंताजनक यह है कि इस स्थिति में सुधार होता नहीं दिखता। पेयजल के मामले में ऐसे चिंताजनक हालात तब हैं जब पानी पर अधिकार जीवन के अधिकार के बराबर है। सरकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे हर नागरिक को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराएं, लेकिन वे इसके लिए सजग नहीं। भारत में पेयजल संकट बढ़ती आबादी और कृषि की जरूरतों के कारण भी गंभीर होता जा रहा है।
विशाल कृषि क्षेत्र और पानी
करीब 65-70 प्रतिशत जल कृषि कार्यों में खप जाता है। इसके अतिरिक्त उद्योगों के संचालन में भी जल का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। विडंबना यह है कि न तो उद्योग एवं कृषि क्षेत्र को अपनी आवश्यकता भर पानी उपलब्ध हो पा रहा है और न ही आम आदमी को। सर्वप्रथम कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल हो रहे जल के उपयोग को नियंत्रित करना होगा।
इसके लिए फसल के चयन में बदलाव के साथ सिंचाई के आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल करना होगा। बरसाती पानी को संजोकर रखने तथा गंदे पानी को दोबारा प्रयोग में लाने योग्य बनाने की दिशा में गंभीरतापूर्वक काम करने की जरूरत है।
इसी तरह भू-जल को प्रदूषण से बचाने पर भी प्राथमिकता के आधार पर ध्यान देना आवश्यक है। आवश्यकता पड़ने पर समुद्र के जल को सिंचाई के पानी के रूप में इस्तेमाल करने की विधि भी विकसित की जानी चाहिए, लेकिन यह ध्यान रहे कि ऐसी कोई विधि पर्यावरण को क्षति न पहुंचाए।
भू-जल के भारी दुरूपयोग की वजह हमारा मौजूदा कानून है जिसमे लोग जिनता चाहे उतना जल निकाल रहें है ।भू-जल संसाधन के इस्तेमाल को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं बना है जिसे तत्काल बनाने की जरूरत है। पानी की समस्या आज भारत के कई हिस्सों में विकराल रूप धारण कर चुकी है और इस बात को लेकर कई चर्चाएं भी हो रही हैं।
इस समस्या से जूझने के कई प्रस्ताव भी है। लेकिन जल संरक्षण से हम इस समस्या से काफी हद तक निजात पा सकते है । कहावत है बूंद-बूंद से सागर भरता है, यदि इस कहावत को अक्षरशः सत्य माना जाए तो छोटे-छोटे प्रयास एक दिन काफी बड़े समाधान में परिवर्तित हो सकते हैं। आकाश से बारिश के रूप में गिरे हुए पानी को बर्बाद होने से बचाना और उसका संरक्षण करना पानी को बचानें का एक अच्छा प्रयास हो सकता है। जल संरक्षण के लिए ऐसे ही कई और प्रयास करने पड़ेंगे तभी हम जल संकट से ठीक तरह से निपटनें में सक्षम हो पाएंगे।
भारत में जल प्रबंधन बहुत सारे नियम ,कानून और नीतियां हैं, परंतु समस्या उन नीतियों के कार्यान्वयन के स्तर पर है। अतः नीतियों के कार्यान्वयन में मौजूद शिथिलता को दूर कर उनके बेहतर क्रियान्वयन को सुनिश्चित किया जाना चाहिए, जिससे देश में जल के कुप्रबंधन की सबसे बड़ी समस्या का समाधान किया जा सके।
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