मुद्दा: दुनिया को संयुक्त राष्ट्र की जरूरत है, युद्ध-संघर्ष झेल चुके आम लोगों के लिए शांति और सुरक्षा का सपना
भूख, गरीबी व असमानता छाई है। यूक्रेन व सूडान युद्धरत और गाजा खंडहर है। अफगानिस्तान में स्त्रियों की दुर्दशा है, पर कुछ लोग कहते हैं कि यूएन की जरूरत नहीं।
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हाल ही में, संयुक्त राष्ट्र के 80 साल पूरे हो गए हैं। पर यह मौका जश्न मनाने का नहीं, बल्कि सोचने का है कि यह संगठन और इसका असली मतलब क्या है। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की कहानी उन दूरदर्शी लोगों की कहानी है, जो 1945 में सैन फ्रांसिस्को में इकट्ठा हुए थे और जिन्होंने युद्ध से तबाह दुनिया को शांति की राह पर ले जाने का सपना देखा था। यह उन हजारों संयुक्त राष्ट्र कर्मचारियों की भी कहानी है, जो आज दुनिया के सबसे खतरनाक इलाकों में काम कर रहे हैं। यह कहानी उन आम लोगों की है, जो संघर्ष व युद्ध में अकल्पनीय दुख सहते हैं।
ऐसे ही लोगों से मेरी मुलाकात एक संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी शिविर में हुई थी। ये शरणार्थी अपनी जान बचाने के लिए रेगिस्तान पार करके भागे थे। उनके पास शरीर पर कपड़ों के अलावा कुछ भी नहीं था। थे तो बस शरीर पर हिंसा के जख्म। एक मां ने मुझे बताया कि उसने कई बार मौत की दुआ की, ताकि उसे अपनी बेटी का बार-बार शोषण होते हुए न देखना पड़े। फिर भी उसे भरोसा है कि उसकी बेटी को शिविर में मनोवैज्ञानिक मदद मिलेगी और वह फिर से स्कूल जा पाएगी।
ये वही लोग हैं, जिनके लिए संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई थी। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 80वें सत्र की आम बहस की शुरुआत में मैंने सभी से संस्था की असली उद्देश्यों पर खरा उतरने का आह्वान किया। दरअसल, यह उस हिम्मत और मजबूत इरादे की कहानी है, जो 1945 में सैन फ्रांसिस्को में इकट्ठा हुए दुनिया के नेताओं ने दिखाया था। उस वक्त कई लोग उन्हें नासमझ कह रहे थे, फिर भी उन्हें भरोसा था कि विश्व युद्धों की तबाही के बाद भी एक बेहतर व शांत भविष्य बनाया जा सकता है।
यूक्रेन और सूडान में युद्ध हो रहे हैं। गाजा अब भी खंडहर बना हुआ है। तालिबान अफगानिस्तान की महिलाओं व लड़कियों को मानवाधिकारों से वंचित कर रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। असमानता, अत्यधिक गरीबी और भूख है। यह सब तब हो रहा है, जब संयुक्त राष्ट्र राजनीतिक और आर्थिक रूप से दबाव में है। बेशक इसे गहरे संरचनात्मक सुधारों की जरूरत है, पर जरा सोचिए कि अगर यह न होता, तो क्या होता! संयुक्त राष्ट्र ऐसे मुद्दों पर देशों को एकसाथ लाता है, जहां कोई भी देश अकेले कुछ नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए, परमाणु हथियारों के अप्रसार संधि के बिना, हर देश एटमी शक्ति बनने के लिए आजाद होता।
कोविड महामारी का सामना भी दुनिया अकेले नहीं कर पाई। विकसित शहर भी खुद को जंगल की आग और बाढ़ से नहीं बचा सकते। ऐसे में, इस वैश्वीकृत, डिजिटलीकृत दुनिया में, हमारे पास दो ही रास्ते हैं-हम मिलकर काम करें, या फिर अलग होकर दुख सहें। इसलिए, इसी सोच के साथ मैंने संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस सत्र की थीम रखी ‘बेटर टूगेदर : 80 इयर्स एंड मोर फॉर पीस, डेवलपमेंट एंड ह्यूमन राइट्स।’
क्या आने वाले 80 वर्षों तक शांति, विकास और मानवाधिकारों को आगे बढ़ाने का संयुक्त राष्ट्र का मिशन आसान होगा? बिल्कुल नहीं। यह आसान कामों के लिए बनाया ही नहीं गया था। इसे इसलिए बनाया गया था कि यह सबसे मुश्किल समस्याओं का समाधान कर सके।
संयुक्त राष्ट्र को और मजबूत, ज्यादा तेज, कम खर्चीला और भविष्य के लिए तैयार किया जाए। लेकिन सबसे बढ़कर, इसके लिए हर किसी को वैसी ही प्रतिबद्धता दिखानी होगी, जैसी 80 साल पहले सैन फ्रांसिस्को में संयुक्त राष्ट्र की नींव रखने वालों ने दिखाई थी, और जो आज यूक्रेन के किशोरों, सूडान की माताओं और भुला दी गई आपदाओं में फंसे लाखों लोग हर दिन दिखा रहे हैं।