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विश्व साहित्य का आकाश: प्लेग और कोरोना की साझी दुनिया

Sun, 07 Jul 2024 04:21 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Sun, 07 Jul 2024 04:21 PM IST
सार

प्लेग से बचाव के लिए क्वारन्टीन की व्यवस्था की जा रही है, मगर क्वारन्टीन के नियम मानने को अधिकांश लोग राजी नहीं हैं। मुनादी के बावजूद लोग झुंड में घूम रहे हैं, मजे में खा-पी रहे हैं।

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world literature Plague and Corona films and cinema
विश्व साहित्य - फोटो : Pixbay

विस्तार

‘यहां कोई बीमारी नहीं है।’ ‘क्वारन्टीन वैश्विक राजनीति है।’ इसके नाम पर टैक्स लगाया जा रहा है।

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क्वारन्टीन का मतलब है, दुकाने बंद, व्यापार ठप्प। दुकानदार इसके खिलाफ हैं। घर से नहीं निकलना। मुल्ला-मौलवी इसके खिलाफ हैं। चर्च कौन-सा इसके पक्ष में है? संक्रमण के नाम पर डॉक्टर, सैनिक किसी के भी घर में घुस कर जांच कर सकते हैं। उनका घर खाली करा कर उन्हें सेंटर भेज सकते हैं, जहां से लौटने की कोई आशा नहीं है। बची-खुची चीजों को आग के हवाले कर सकते हैं। अत: बीमारी छिपा कर लोग संक्रमण को बढ़ावा दे रहे हैं। हालात काबू से बाहर हो रहे हैं। लोगों को साफ-सफाई में नहीं प्रार्थना और गंडा-ताबीज में विश्वास है। संक्रमण के नाम पर लोगों को अलग करना पश्चिम का चोंचला है। सब सत्ता की साजिश है। 

लोग ऐसा व्यवहार करते दिख रहे हैं, मानो कुछ अनहोनी नहीं हो रही है। साथ ही जगह-जगह लायसोल का छिड़काव हो रहा है। लोग सामान बांध कर घर छोड़ कर जा रहे हैं। लोगों का हौसला टूट रहा है। लोग पटापट मर रहे हैं, इसके बावजूद कोई स्वीकारना नहीं चाहता है कि महामारी फैली हुई है। लोग डरे हुए हैं, लेकिन क्वारन्टीन के नियम मानने को राजी नहीं हैं। असल में सरकार, या मेयर, धनी-मानी, दुकानदार कोई क्वारन्टीन नहीं चाहता है। मर भले जाएं, आरामदायक जिंदगी अचानक समाप्त हो जाए, कोई इस बात को स्वीकारना नहीं चाहता।
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क्वारन्टीन से बचने के लिए घूस दी-ली जा रही है। जरूरत की चीजों की जमाखोरी, उसके साथ कालाबाजारी बढ़ गई है। मरने वाले के घर जाने की सख्त मनाही है। उसके कपड़े-लत्ते जला दिए जा रहे हैं। लोग अस्पताल जाने की बनिस्बत काढ़ा जैसे घरेलू इलाज पर निर्भर हैं।

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उपन्यास ‘नाइट्स ऑफ प्लेग’

यह सब पढ़ कर दो साल पहले का ‘कोरोना 19 काल’ का दृश्य आंखों के सामने घूम जाता है। यह कोरोना वायरस काल का नहीं बल्कि आज से करीब सवा सौ साल पहले का मंजर है, जिसे 2006 के नोबेल पुरस्कृत उपन्यासकार ओरहान पामुक ने 84 चैप्टर में लिखे, नवीनतम उपन्यास, ‘नाइट्स ऑफ प्लेग’ में पिरोया है। एक साक्षात्कार में वे कहते हैं, जब वे आधा उपन्यास लिख चुके थे, तब कोरोना वायरस आया। वे प्लेग को केंद्र में रख कर उपन्यास लिखने की बात तो बरसों से सोच रहे थे। उनके मन में इससे जुड़ी तीन रचनाएं थीं, डैनियल डिफो का ‘ए जरनल ऑफ द प्लेग ईयर’, एलेसान्ड्रो मैनजोनी का ‘द बेट्रोथेड’ तथा एल्बर्ट कामू का ‘द प्लेग’। इन तीनों रचनाकारों ने प्लेग काल देखा नहीं था।


पामुक इस श्रृंखला में चौथा नाम अपना जोड़ना चाहते थे, मगर ऐसा हो न सका। उनके किताब पूरा करने से पहले दुनिया दहशत की गिरफ़्त में आ गई, कोरोना आ गया। उनके अनुसार उन्होंने अपना भय अपने पात्रों में पिरो दिया। साथ में वे बताते हैं, वे अपने उपन्यास के पात्रों से अधिक भयभीत थे। उनका भय समझा जा सकता है। इस्तांबुल में कोरोना से मरने वालों की पहली खेप में पामुक की 94 साल की बूढ़ी ऑन्ट भी थीं, जो महज उनके घर से दो ब्लॉक की दूरी पर रहती थीं। 

उनके एडीटर उन्हें उपन्यास जल्द समाप्त करने को कह रहे थे ताकि प्रकाशक कोरोना काल के नाम पर इसे भुना सकें। पामुक ने अपना उपन्यास 1901 में स्थापित किया है, इसके लिए इस बार उन्होंने अपना प्रिय स्थान इस्तांबुल नहीं चुना है, वरन कई अन्य साहित्यकारों की भांति अपना एक काल्पनिक टापू मिंघेरिया बसाया है, जो वास्तविक से अधिक वास्तविक लगता है, जहां खबरियों और जासूसों की कमी नहीं है।

काल सुल्तान अब्दुल हामिद द्वितीय के ढ़हते साम्राज्य का है। सरकार जितना जकड़ने का प्रयास करती है बिखराव उतना बढ़ता जाता है। पामुक की अन्य कई किताबों की भांति यहां भी हत्याएं होती हैं, हत्याओं की गुत्थी सुलझाने केलिए इस किताब में शरलक होम्स की पद्धति अपनाने की बात कही जाती है। क्यों ऐसा कहा जा रहा है, स्वयं पढ़ कर जाने।

मिंघेरिया की पच्चीस हजार की आबादी में आधे ईसाई थे, मुस्लिमों के अट्ठाइस सेक्ट थे। इनमें विचारों को लेकर सदैव टकराव रहता। एक-दूसरे पर विश्वास न था। मुस्लिम और यूनानी संग रहते हैं मगर वे एक-दूसरे को जानते-समझते नहीं हैं। 

प्लेग से बचाव के लिए क्वारन्टीन की व्यवस्था की जा रही है, मगर क्वारन्टीन के नियम मानने को अधिकांश लोग राजी नहीं हैं। मुनादी के बावजूद लोग झुंड में घूम रहे हैं, मजे में खा-पी रहे हैं। चर्च और मस्जिद जाने वाले लोगों को समझाना कठिन है। प्लेग के चूहे फेंकने की, प्लेग फैलाने की अफवाहें फैल रही हैं। कारागार का बुरा हाल है, जो एक बार वहां भेज दिया जाता है, दोबारा नजर नहीं आता है। ‘ओटोमन साम्राज्य की कोई समस्या किसी को जेल में डाले बिना हल नहीं हो सकती है।’ लाशों के ढ़ेर हैं, उन्हें समुद्र किनारे खाई में फेंक दिया जा रहा है। 

विज्ञान और आस्था का द्वंद्व है। प्लेग से जब लोग पटापट मरने लगते हैं, तो वैज्ञानिक चेतना के लोगों का विश्वास भी हिल जाता है। धर्म पर आस्था रखने वालों को ऊपर वाले पर भरोसा है। ‘हम अल्लाह के हाथों में हैं!’ मजीद कहता है। ‘चिढ़ो मत; हमारी किस्मत पहले ही लिखी जा चुकी है, और जो आने वाला है उसके लिए हमें चिंता नहीं करनी है!’ ‘हम सब हमारी मदर मेरी और जीसेस क्राइस्ट के हाथ में हैं !’ नाई ने दुकान के कोने की ओर नजर डालते हुए कहा।

पामुक 700 पन्नों में महामारी, मनुष्य का स्वभाव, राष्ट्रवाद, शासन की बुराइयों, मिथक, तुर्की का दूसरे खासकर यूरोप के देशों से संबंध, इतिहास, सब एक परिकथा की तरह पिरोते चले जाते हैं। सब कुछ सुल्तान की भांजी राजकुमारी पाकीजे के पत्रों से जाना जाता है, मगर कहानी कहने वाले का खुलासा ‘नाइट्स ऑफ प्लेग’ में बहुत बाद में होता है।

 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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