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विश्व साहित्य का आकाश: जॉन स्टीनबेक का मोती

Sun, 04 May 2025 09:51 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Sun, 04 May 2025 09:51 PM IST
सार

स्टीनबेक पेंसिल से बहुत बारीक अक्षरों में लिखते थे और इसके लिए सुबह ढ़ेर सारी पेंसिल छील कर रखते थे लेकिन इतना अधिक काम खतम करने के लिए अक्सर उन्हें एक और पेंसिल की नोंक बनानी पड़ती थी। इसके अलावा वे तरह-तरह के पेन के शौकीन थे और टाइपराइटर का उपयोग भी करते थे।
 

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world history of literature John Steinbeck American writer
नॉवेल की दुनिया - फोटो : Freepik.com

विस्तार

जॉन स्टीनबेक का विश्व साहित्य में खासकर अमेरिकी साहित्य में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। ‘ए जायंट ऑफ अमेरिकन लेटर्स’ कहे जाने वाले जॉन अर्नेस्ट स्टीनबेक, जूनियर का जन्म अमेरिका के कैलिफोर्निया के सलीनास नामक स्थान में 27 फरवरी 1902 को हुआ।

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जॉन के पिता सीनियर जॉन एर्नेस्ट स्टीनबेक मोन्टेरी काउंटी के खजांची थे और मां ओलिव हेमिल्टन स्कूल टीचर थीं। मां-बेटे दोनों की रूचि पढ़ने-लिखने में थी। जॉन स्टीनबेक के 16 उपन्यास, छ: साहित्येत्तर किताबें और पांच कहानी संग्रह हैं। उन्होंने हजारों पत्र लिए जो किताब के रूप में बाद में प्रकाशित हुए।
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उनके लेखन कई देशों में लोकप्रिय है, वे त्रासद और हास्य दोनों स्थितियों में मानवीय व्यवहार के निर्भीक अवलोकनकर्ता रहे हैं। उन्होंने फिल्म ‘विवा ज़पाटा!’ का स्क्रीनप्ले भी लिखा।
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जॉन स्टीनबेक को अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘द ग्रेप्स ऑफ रॉथ’ पर 1939 का पुलित्जर पुरस्कार मिला, इसे उस साल का नेशनल बुक अवॉर्ड भी मिला। इस किताब की लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं, यह विश्व की कई भाषाओं में अनुवादित हुआ है।

नोबेल समिति ने उनके लेखन को यथार्थवादी और कलात्मक कहते हुए स्टीनबेक को 1962 में नोबेल पुरस्कार दिया और उनके लेखन की प्रशंसा में कहा कि वे अपने लेखन में सहानुभूतिपूर्ण हास्य और गहन सामाजिकता की धारणा रखते हैं।

स्टीनबेक पेंसिल से बहुत बारीक अक्षरों में लिखते थे और इसके लिए सुबह ढ़ेर सारी पेंसिल छील कर रखते थे लेकिन इतना अधिक काम खत्म करने के लिए अक्सर उन्हें एक और पेंसिल की नोंक बनानी पड़ती थी। इसके अलावा वे तरह-तरह के पेन के शौकीन थे और टाइपराइटर का उपयोग भी करते थे।

‘द पर्ल’- सार्वभौमिक और सार्वकालिक

लोक कथा पर आधारित स्टीनबेक के ‘द पर्ल’ का कथानक सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। यहां लालच को विध्वंसात्मक माना गया है। मोती के मिलते ही नायक कीनो संतुष्ट व्यक्ति से अपराधी-हत्यारे के रूप में बदल जाता है, उसकी मासूमियत समाप्त हो जाती है। हालांकि वह बहुत बड़े-बड़े ख्वाब नहीं देखता है। सोचता है, मोती बेचने से मिले पैसों से उन दोनों पति-पत्नी केलिए नए-नए कपड़े बनेंगे, बच्चे का बपतिस्मा होगा, चर्च में उनकी शादी होगी और सबसे बड़ी बात जो वह सोचता है कि उसका बेटा पढ़ने जाएगा।

वह जान सकेगा कि किताब में क्या लिखा है, जिससे वह खुद वंचित है। वह खुद न पढ़ सका मगर उसमें शिक्षा की ललक है, शिक्षा के प्रति आकर्षण है। वह अगली पीढ़ी को शिक्षित देखने की ख्वाइश रखता है।

मगर जिस मोती को वह आशा और सौभाग्य का प्रतीक मान रहा था, वही मोती उसके विनाश का बायस बन जाता है। मोती के कारण उस पर आक्रमण होता है, वह मरते-मरते बचता है। उसकी नाव नष्ट कर दी जाती है। उसके घर में अंधेरे में लोग मोती चुराने आते हैं, कीनो को घायल करते हैं और जब कोई बस नहीं चलता है तो उसकी झोपड़ी ही जला देते हैं। अंत में इसी मोती के चलते उसके बच्चे के सिर में गोली लगती है और वह मर जाता है।

कीनो मोती से इतना जुड़ जाता है, वह अपने भाई से कहता है, यह उसकी आत्मा बन गई है। अगर वह इसे त्याग देगा, तो उसकी अपनी आत्मा खो देगा। इसी मोती को उसकी पत्नी बुराई मान कर वापस समुद्र में फेंक देना चाहती है, इस पर कीनो अपनी पत्नी जुआना को खूब मारता है। इसे के चलते वह हत्यारा बनता है और एक समय ऐसा आता है, जब वह अपने समुदाय और अपनी सभ्यता-संस्कृति से भी कट जाता है।

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विश्व साहित्य का इतिहास - फोटो : Freepik.com

उपन्यासिका ‘द पर्ल’ में मनुष्य जीवन को दिशा देने वाली दो विरोधी ताकतों की बात आती है। एक ओर आदमी के नियंत्रण के बाहर उसका भाग्य है। दूसरी ओर आदमी का अपना परिश्रम है, जिससे वह अपना भाग्य खुद गढ़ता है। भाग्य दुर्घटना, अवसर, देव के रूप में आदमी के जीवन की दशा-दिशा बदल सकता है। कौन जानता था, बिच्छू बच्चे को काट लेगा और कीनो तथा जुआना का जीवन सदा-सदा के लिए बदल जाएगा।

कीनो और मोती की कहानी

समुद्र में डुबकी लगा कर कीनो मोती पाता है और वही मोती उसका दुर्भाग्य बन जाता है। गांव के मोती खरीददार, डॉक्टर, पादरी सब उसके दुश्मन साबित होते हैं। मोती अपने आप में निरपेक्ष हो सकता है लेकिन उसके साथ जुड़ा लोगों का लालच, महत्वाकांक्षा, अत्याचार, आक्रमण कीनो के शांत जीवन को सदा के लिए समाप्त कर देता है। कीनो भाग्य और समाज के लोगों के बीच फंस जाता है।

भाग्य जो उसे मिला है और भाग्य जो वह बनाना चाहता है, दोनों के बीच वह पिस जाता है। डॉक्टर उस नस्ल का है जिसे इस बात का घमंड है, वह जीवन बना या बिगाड़ सकता है। डॉक्टर और उस जैसे लोग अहंकार, लालच और महत्वाकांक्षा से संचालित होते हैं।

‘द पर्ल’ में जॉन स्टीनबेक गरीबों-शोषितों के साथ खड़े हैं। ‘द पर्ल’ एक रूपक है। इसमें कई प्रतीकों का उपयोग हुआ है। प्रतीक रूप में कीनो अभी पूर्ण विकसित नहीं है उसकी पहचान अभी पशुओं के साथ है। मुर्गे की बांग का अर्थ निकाला जा सकता है कि प्रगति का बिगुल फुंक चुका है। विकास का सूर्योदय हो रहा है।

कीनो को बहुत दिन तक दबा कर नहीं रखा जा सकता है। जब व्यक्ति के मन में प्रश्न उठने लगते हैं, तो यह उसके जागने का सूचक है। कीनो उन संस्थानों पर प्रश्न उठाने लगा है, जिन्होंने उसे आदिम बनाए रखा है।

प्रभुओं के प्रति उसके मन में भय है, तो गुस्सा भी है। आधुनिक औषधियों को वह शंका और संदेह की दृष्टि से देखता है। वह इन सत्ताधारियों के षडयंत्र को जानने-समझने लगा है। चर्च को ले कर भी उसकी धारणा प्रश्नाकुल है और व्यापारियों की चालाकी उससे बिल्कुल भी छुपी नहीं है। वह इन सबके चंगुल से निकल आता है।

कीनो केवल एक व्यक्ति न हो कर अपने पूरे समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है। वह पूरे विश्व के गरीब व्यक्ति का प्रतीक भी है इस नाते वह दुनिया का हरेक दमित-शोषित व्यक्ति है। वह मात्र स्थानीय व्यक्ति न हो कर वैश्विक व्यक्ति है।

मोती मिलने की खबर से कीनो के लोगों में लालच उत्पन्न नहीं होता है, लालच केवल सभ्य लोगों, डॉक्टर, पादरी, मोती के खरीददारों में उत्पन्न होता है। ये लालची लोग न केवल कीनो को शारीरिक हानि पहुंचाते हैं, वरन उसकी सम्पत्ति को भी नष्ट करते हैं। ये बिना चेहरे के लोग उसका घर जला देते हैं, उसकी डोंगी में सूराख कर देते हैं।

स्टीनबेक यहां एक बहुत मार्मिक बात कहते हैं, ‘आदमी को मारना इतना बुरा न था, जितना नाव को मारना। क्योंकि नाव के बेटे नहीं होते हैं, नाव खुद की रक्षा नहीं कर सकती है और घायल नाव स्वस्थ नहीं होती है।’ नाव मेहनत, रोजी-रोटी का प्रतीक है।

स्टीनबेक की इस उपन्यासिका पार फिल्म बनी है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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