विश्व धरोहर दिवस विशेष: 21वी सदी में विरासत और जलवायु दोनों ही खतरे में..!
यूनेस्को हर वर्ष एक थीम रखती है। स्टॉकहोम में एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने विश्व प्रसिद्ध इमारतों और प्राकृतिक स्थलों की रक्षा के लिए 1968 में प्रस्ताव के माध्यम से "यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज सेंटर" की स्थापना किया गया।
यूनेस्को हर वर्ष एक थीम रखती है। स्टॉकहोम में एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने विश्व प्रसिद्ध इमारतों और प्राकृतिक स्थलों की रक्षा के लिए 1968 में प्रस्ताव के माध्यम से "यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज सेंटर" की स्थापना किया गया।
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भारतीय सभ्यता दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है और हमें अपनी इस धरोहर को संरक्षित करना होगा। अपने इतिहास और संस्कृति को शताब्दियों तक संरक्षित रखने के लिए अपने धरोहरों को सुरक्षित और संरक्षित रखना अति आवश्यक है। समय के थपेड़े सिर्फ इंसान को ही कमजोर नहीं करते बल्कि इमारतें भी कमजोर होती जाती हैं।
भावी पीढ़ी को ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों से वंचित न होना पड़े इसके लिए इनको भविष्य के लिए सुरक्षित रखने और इनके प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए 18 अप्रैल को हर वर्ष वर्ल्ड हेरिटेज डे (विश्व धरोहर दिवस) मनाया जाता है।
यूनेस्को हर वर्ष एक थीम रखती है। स्टॉकहोम में एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने विश्व प्रसिद्ध इमारतों और प्राकृतिक स्थलों की रक्षा के लिए 1968 में प्रस्ताव के माध्यम से "यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज सेंटर" की स्थापना किया गया।
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इस संस्था के पहल पर 18 अप्रैल, 1978 में विश्व के कुल 12 स्थलों को विश्व स्मारक स्थलों की सूची में शामिल किया गया एवं इस दिन को 'विश्व स्मारक दिवस' के रूप में मनाया जाने लगा लेकिन यूनेस्को ने वर्ष 1983 से इस दिवस को "विश्व विरासत या धरोहर दिवस" के रूप में मनाने की नई शुरुआत की।
हमारी धरोहर और कुछ चिंताएं
इक्कीसवीं सदी में विरासत और जलवायु दोनों ही खतरे में हैं और इनका संरक्षण आज की आवश्यकता है। इस वर्ष की थीम संस्कृति और पर्यावरण के महत्व को स्वतः सिद्ध करता है। हमारी विरासत और धरोहर हमें अपनी संस्कृति, इतिहास और सभ्यता के बारे में बताते हैं। इसलिए विरासतों का संरक्षण करना सिर्फ सरकार की ही नहीं बल्कि हमारी भी जिम्मेदारी है।
विश्व धरोहर सांस्कृतिक, प्राकृतिक, पर्यावरणिक, ऐतिहासिक महत्व के होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय महत्व होने के कारण इन्हें बचाए रखने के लिए विशेष कदम उठाने की जरूरत होती है। ऐसे विशिष्ट महत्व के स्थलों को संयुक्त राष्ट्र की संस्था “यूनेस्को”, आधिकारिक तौर पर विश्व धरोहर की मान्यता देती है।
किसी भी विरासत अथवा धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए दो संगठनों अंतर्राष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल परिषद् और विश्व संरक्षण संघ द्वारा आकलन किया जाता है। इस आकलन की विश्व धरोहर समिति से सिफारिश की जाती है।
यह समिति वर्ष में एक बार बैठक कर यह निर्णय लेती है कि किसी नामांकित संपदा को विश्व धरोहर सूची में शामिल करना है अथवा नहीं। यूनेस्को विश्व विरासत स्थल समिति द्वारा चयनित विशेष स्थानों (वन क्षेत्र, पर्वत, झील, मरुस्थल, स्मारक, भवन, शहर आदि) की देखभाल करती है।
विश्व विरासत संधि (वर्ल्ड हेरिटेज ट्रीटी ) वैश्विक महत्व के प्राकृतिक, पर्यावरणीय स्थान को संरक्षित करने के उद्देश्य से प्रारम्भ किया गया। भारत ने इस पर 1976 में हस्ताक्षर किए। भारत में यूनेस्को द्वारा सांस्कृतिक, प्राकृतिक एवं मिश्रित धरोहर इन तीन श्रेणियों में 40 के लगभग विरासत स्थल शामिल किये गए हैं जिनमें ताजमहल, अजंता-एलोरा की गुफायें ,पश्चिमी घाट,खजुराहो, भीमवेटका, महाबलीपुरम आदि प्रमुख हैं।
भारत में मात्र एक मिश्रित धरोहर स्थल कंचनजंघा राष्ट्रीय पार्क है जो सिक्किम में स्थित है। साथ ही भारत सात प्राकृतिक धरोहर स्थल हैं जिनमें सुंदरवन, नंदा देवी एवं फूलों की बाड़ी राष्ट्रीय उद्यान, काजीरंगा राष्ट्रीय पार्क, केवलादेव राष्ट्रीय पार्क आदि प्रमुख हैं।
इटली, फ्रांस, स्पेन, जर्मनी, चीन के अलावा भारत ही एक ऐसा देश है जहां 40 या उससे अधिक धरोहर स्थल है। 2014 के बाद भारत ने 10 नए स्थलों को जोड़ा है।
अहमदाबाद भारत का पहला हेरिटेज शहर बना है। भारतीय संस्कृति, विरासत, जीवन दर्शन को बढ़ावा देने और वैश्विक पहचान देने में इस स्थलों का मत्वपूर्ण योगदान है।
समय समय पर संग्रहालयों, स्मारकों और धार्मिक स्थलों से सदियों पुरानी कलाकृतियों, मूर्तियों आदि ग़ायब होने की खबर छपती रहती हैं। भारत में ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षण प्रदान करने के लिए पहला कानून 1810 में बंगाल रेगुलेशन-19 पारित हुआ।
इसके बाद 1817 में मद्रास रेगुलेशन-8 पारित हुआ। बाद में ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित रखने के लिए 1958 में प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्व स्थल एवं अवशेष अधिनियम संसद द्वारा पारित किया गया।
1972-73 में पुरातत्व और बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम के माध्यम से तस्करी, निजी स्वामित्व एवं इमारतों और धरोहर को संरक्षण करने का कानून बना था।
संरक्षण और कानून
आज भी देश में इस तरह की तस्करी में सजा अधिकतम तीन साल की कैद और केवल 2,000 रुपये जुर्माना जो इस तरह के अपराध को बढ़ावा ही दे रहे हैं। समय आ गया है कि कानून में बदलाव किए जाये जिससे ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा की जा सके।
विश्वभर में कुल 1052 विरासत स्थल हैं। इनमें 814 सांस्कृतिक ,203 प्राकृतिक और 35 मिश्रित हैं। अभी विश्व में 226 हेरिटेज सिटी हैं। यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज कमिटी ने 44 धरोहरों को असुरक्षित माना है। इनमें प्रमुख अफगानिस्तान की बामियान वैली, इजिप्ट का अबू मैना, येरुशलम शहर, डोमेस्टिक रिपब्लिक ऑफ कांगो की पांच धरोहरें हैं।
अंतर्राष्ट्रीय महत्व के धरोहरों के यथोचित देखभाल के लिए विश्व विरासत कोष वार्षिक चार मिलियन अमेरिकी डॉलर प्रदान करता है। जरूरत और संकटग्रस्त स्थलों को धन आवंटन में प्राथमिकता दी जाती है। यूनेस्को हर साल 25 वैश्विक धरोहरों को विरासत की सूची में शामिल कर रहा है जिससे अधिक से अधिक विरासतों को संरक्षित किया जा सके।
बीते हुए समय को तो वापस नहीं लाया जा सकता लेकिन बीते समय की अनमोल निशानियों को अवश्य ही सदियों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। कोविड-19 महामारी के कारण पिछले दो वर्षों से विरासतों के रखरखाव में कमी आने लगी थी, किन्तु पुनः यूनेस्को से जुड़े विभिन्न संगठन जागरूकता कार्यक्रम चला कर इनके संरक्षण को बढ़ावा दे रहे हैं।
विश्व धरोहर प्रवाल भित्तियों से सम्बंधित आंकड़े चिंताजनक होते जा रहे हैं। यूनेस्को ने विश्व धरोहर - सूचीबद्ध चट्टानों की लचीलापन को बढ़ावा देने के लिए आपातकालीन योजना शुरू की है।
जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदा, खराब नीति जैसी संभावित स्थितियों में विरासत को संरक्षित करने नयी तकनीकों का सहारा लेना जरूरत बन गई है।
इस क्षेत्र में 3डी स्कैनिंग उपकरण एक नई तकनीक है जो न केवल स्थिति को डिजिटलाइज करता है बल्कि प्रतिकृति के लिए एक 3डी आभासी (वर्चुअल) मॉडल भी प्रदान करता है। किसी भी संग्रहालय के कलाकृतियों को भी डिजिटलाइज करने की प्रक्रिया शुरू हुई है। प्रौद्यौगिक प्रगति संरक्षण में लाभकारी ही सिद्ध हो रहा है।
हमारा भारत भी ऐतिहासिक, धार्मिक, प्राकृतिक एवं संस्कृतियों कलाकृतियों, स्मृतियों एवं स्थलों से परिपूर्ण देश है। ये विरासत के स्थल संसार के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। प्रत्येक भारतीय नागरिक को अपने देश की विरासत स्थलियों पर गर्व होना चाहिए तथा उनके संरक्षण के लिए आगे बढ़ना चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।