पर्यावरण के लिए संजीवनी बनकर आया कोरोना, न्यूनतम हुआ प्रदूषण का स्तर
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पर्यावरण मानव जीवन का वह हिस्सा है, जिसके बिना जिंदगी की कल्पना भी मुश्किल है, इसके बावजूद पर्यावरण को लेकर लोग सहज और सजग नहीं है। तेजी से बढ़ती आबादी, कटते जगंल, अंधाधुंध शहरीकरण, खनन, तेज औद्योगीकरण और मशीनीकरण ने हवा, पानी, जमीन, वातावरण, नदी को प्रदूषित कर पर्यावरण संतुलन को बुरी तरह प्रभावित किया है।
उदारीकरण के बाद भौतिक संसाधनों के पीछे भागती दुनिया पर्यावरण को लेकर बहुत गंभीर नहीं है, जिसका परिणाम यह है कि सूरज की पराबैंगनी किरणों और धरती के बीच कवच का काम करने वाली ओजोन की परत तेजी से क्षतिग्रस्त होती जा रही है।
सामाजिक परिभाषा बदल देने और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाला कोरोना वायरस कम से कम पर्यावरण के नजरिये से संजीवनी बनकर आया है। लगभग दो महीने के लॉकडाउन के बीच पर्यावरण को लेकर कई सुकून देने वाली खबरें सामने आई हैं। दिल्ली-एनसीआर समेत तमाम महानगरों में प्रदूषण लेबल कम होने की खबर हो या फिर गंगा नदी के साफ हो जाने की सूचना, कोरोना लॉकडाउन ने वह कर दिखाया है, जिसकी कभी कल्पना करना तक मुश्किल था।
कार्बन, नाइट्रोजन उत्सर्जन में कमी के चलते ओजोन परत के भी रिपेयर होने की खबरें सामने आ रही है। वयस्क हो चुकी एक पीढ़ी लंबे समय बाद अपने महानगरों का साफ और नीला आसमान देख पा रही है और शुद्ध हवा में सांस ले पा रही है।
भारत के नजरिये से देखें तो जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और उतनी ही तेजी से शहरों का अव्यवस्थित विस्तार भी हुआ है। यह आबादी प्राकृतिक संसाधनों पर भी बोझ बढ़ाती जा रही है। भूजल का दोहन कर रही है। कूड़ा कचरा का भंडार खड़ा कर रही है। विकास की चपेट में सबसे ज्यादा प्रकृति आ रही है, जिससे पर्यावरण संतुलन में बड़ा अंतर पैदा हो चुका है।
सड़क बनाने के नाम पर करोड़ों पुराने और आक्सीजन देने वाले पेड़ों के अंधाधुंध कटान, सड़कों पर दौड़ते करोड़ों वाहनों के धुंए तथा कल कारखानों से निकलने वाली ग्रीन गैसों के चलते वायु एवं जल प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है, जो पर्यावरण असंतुलन और जलवायु परिवर्तन में सहायक साबित हो रहा है। वातावरण और समुद्र जल कार्बन जैसी नुकसानदायक गैस की अधिकता से प्रभावित हो रही है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग का खतरा तेजी से बढ़ रहा है।
वातावरण में मौजूद कार्बन डाई आक्साइड पराबैंगनी किरणों को सोखती है तथा उत्सर्जित करती है, जिससे वातावरण में गर्मी पैदा होती है और हवा, पानी, जमीन को भी लगातार गर्म करती है। वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी ग्रीन गैस पृथ्वी के तापमान को बढ़ा रही है।
भारत के लिए अच्छी बात यह है कि कुल जंगल क्षेत्र के हिसाब से टॉप के दस देशों में शामिल है। भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट 2019 के अनुसार देश में 8,07,276 वर्ग किमी क्षेत्र वन और वृक्षों से आच्छादित है, जो देश के भौगोलिक क्षेत्रफल का24.56 फीसदी है। इसमें वनावरण क्षेत्रफल 7,12,249 वर्गकिमी है, जो भौगोलिक क्षेत्रफल का21.67 किमी है, शेष वृक्ष क्षेत्र है।
देश में बीते दो सालों में वनावरण एवं वृक्षों के क्षेत्रफल में5,188 वर्गकिमी की बढ़ोतरी हुई है। पूर्वोत्तर के मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर तथा नागालैंड टॉप के पांच वन आच्छादित राज्य हैं, जहां 75 फीसदी से लेकर 85 फीसदी तक वन क्षेत्र है। वन क्षेत्रफल के लिहाज से देश का सबसे बड़ा राज्य मध्य प्रदेश है, जहां 77,482 वर्ग किमी क्षेत्रफल में वन है। इसके बाद अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ, ओडिसा तथा महाराष्ट्र का नंबर आता है। वनों के कार्बन स्टाक में भी 2017 के मुकाबले 42.06 मिलियन टन की बृद्धि हुई है।
उत्तर प्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल है, जहां वन क्षेत्र दस फीसदी से भी कम है। पिछले पांच सालों में राज्य के वन एवं वृक्षारोपण क्षेत्रफल में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वर्ष 2015 में यूपी में वनाच्छादित क्षेत्र 6.01 फीसदी था, जो अब बढ़कर 6.88 फीसदी हो गया है।
अखिलेश यादव ने एक दिन में छह करोड़ पौधरोपण करके रिकार्ड बनाया, जिसे सत्ता संभालने के बाद पहले 22 करोड़ और अब 25 करोड़ पेड़ लगाकर भाजपा की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पीछे छोड़ दिया है। अखिलेश यादव ने छोटे-छोटे पौधों को वरीयता दी, वहीं योगी आदित्यनाथ की सरकार ने आम, बरगद, पीपल, पाकड़, गूलर जैसे पौधों का रोपण करवा रही है, जो सर्वाधिक आक्सीजन उत्सर्जन करते हैं। इस साल भी 25 करोड़ पेड़ों के रोपे जाने की तैयारी यूपी ने कर रखी है।
यूपी में ग्रांट ट्रक रोड के किनारे करोड़ों की संख्या में मौजूद आम, पीपल, बरगद, पकड़ी, जामुन सड़क विस्तारीकरण की योजना में शहीद हो गये, और इनकी जगह पेड़ लगाने की बजाय पिछली सरकारों ने झाड़ झंखाड़ और सजावटी पौधों को वरीयता दी, जबकि इन पौधों में कार्बन सोखने और आक्सीजन उत्सर्जन करने की क्षमता अत्यंत कम है।
बीते तीन दशक में केंद्र तथा राज्य सरकारों तथा वन विभाग की अज्ञानता के चलते देश के बड़े भूभाग पर वृक्षारोपण के नाम पर यूकेलिप्टस के पेड़ रोप दिये गये, जबकि एक यूकेलिप्टस सालाना दो लाख लीटर तक पानी पी जाता है। सरकारी अज्ञानता के चलते कई इलाकों में भूजल का स्तर भी तेजी से नीचे गया। उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में यूकेलिप्टस का पर्यावरण एवं भूजल पर बुरा प्रभाव डाला है। भारत में 1994 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 6000 घनमीटर थी, जिसके 2025 तक 1600 घनमीटर रह जाने का अनुमान है।
यूपी के 10 बड़े शहर तथा 280 विकास खंड गिरते भूजल के चलते खतरनाक स्तर तक पहुंच चुके हैं। इसमें 9 शहर तथा 82 विकास खंड से अत्यंत क्रिटिकल श्रेणी में शामिल हैं, जहां भूजल स्तर नीचे जा चुका है। पर्यावरण को लेकर पिछले कुछ वर्षों में तमाम राज्य सक्रिय हुए हैं, लेकिन यूपी में इस पर तेजी से ध्यान दिया जा रहा है।
भूजल के दोहन से बचने के लिये बुंदेलखंड में सरफेस वाटर ट्रीटमेंट कर बुंदेलखंड के हजारों गांवों में नल के जरिये पानी पहुंचाने की 9000 करोड़ की योजना चल रही है। तालाबों को जीवन देने के साथ भूजल रीचार्ज के लिये खेत तालाब और कुंओं को पुनर्जीवित करने के प्रयास चल रहे हैं। अब बिना वाटर रिचार्जिंग सिस्टम बनाने बिना बड़े भवनों का नक्शा पास नहीं किया जा रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए की लोग बीते दिनों से सबक लेकर पर्यावरण के प्रति जागरूक होंगे।
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