विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: तेल का विकल्प है लेकिन जलवायु का नहीं, स्वीकार करनी होंगी बढ़ती कीमतें
भारत में कोरोना के बाद लोग पेट्रोल की बढ़ती हुई क़ीमतों से परेशान हैं, पर यह परेशानी केवल भारत में ही नहीं है और न निकट भविष्य में दूर होने वाली है। यदि हम जलवायु परिवर्तन की रोकथाम चाहते हैं, तो हमें तेल की लगातार बढ़ती कीमतें भी स्वीकार करनी पड़ेंगी।
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विस्तार
भारत की जनता कोरोना वायरस की मार से पहले ही अधमरी हो चुकी है। संक्रमणों के कम होते आंकड़ों से इस बीच जो थोड़ी-बहुत राहत मिलती दिख रही थी, वह अब पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती क़ीमतों की बलि चढ़ रही है।
दरअसल, यह दोहरी मार भारत की ही नहीं, उन सभी देशों की जनता को झेलनी पड़ रही है, जो कच्चे तेल के उत्पादक- निर्यातक नहीं हैं। इन सभी देशों के लोगों को ईरान के साथ परमाणु वार्ताओं के अगले दौर पर नज़र रखनी होगी। ऑस्ट्रिया की राजधानी वियेना में होने वाली इन वार्ताओं की कोई तारीख़ अभी तय नहीं हो पाई है।
कीमतों के बढ़ने का कारण?
2015 में जर्मनी तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी सदस्यों, और ईरान के बीच समझौता हुआ था कि ईरान यदि परमाणु अस्त्र बनाने के बदले परमाणु ऊर्जा का केवल शांतिपूर्ण कार्यों के लिए उपयोग करे, तो उसके विरुद्ध लगे प्रतिबंध उठाए जा सकते हैं।
अब पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने 2018 में इस समझौते को ठुकरा दिया, तब ईरान भी अपने वादों की अनदेखी करने लगा। इस कारण उसके तेल के निर्यात सहित उस पर लगे सारे आर्थिक-तकनीकी प्रतिंबंध अब भी अटल हैं।
कैसे कम होंगे दाम?
ईरान के साथ नई वार्ताओं में प्रगति का अर्थ होगा कि वह अपने तेल का उत्पादन बढ़ा और उसका पुनः निर्यात कर सकता है, किंतु ऐसा होते ही उसके प्रतिस्पर्धी देश भी अपने तेल का उत्पादन बढ़ाने में जुट जाएंगे, तब कच्चा तेल सस्ता होने से पेट्रोल-डीज़ल के भाव भी गिरने लगेंगे। लेकिन, भला यही मान कर चलने में है कि कई कारणों से भविष्य में कच्चे तेल का भाव कुल मिलाकर बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं।
दरअसल, पिछले वर्ष कोरोना का प्रकोप शुरू होते ही दुनिया भर में लॉकडाउन के बाद से कच्चे तेल का भाव बढ़ता ही रहा है। 2020 वाले जून के आरंभ में एक बैरल कच्चे तेल का भाव लगभग 38 डॉलर था। उस समय औद्योगिक गतिविधियां जिस तेज़ी से ठंडी पड़ने लगीं, कच्चे तेल का उत्पादन उस तेज़ी से घटाया नहीं जा सका।
इधर, बाज़ार में तेल की बाढ़-सी आ गई। औद्योगिक गतिविधियां इस बीच पुनः इतनी बढ़ चुकी हैं कि कच्चे तेल की बढ़ती हुई मांग ने उसे फिर से मंहगा कर दिया है। तेल के उत्पादक और निर्यातक देशों के संगठन 'ओपेक' का मानना है कि इस चालू वर्ष की दूसरी छमाही में कच्चे तेल की मांग और अधिक बढ़ेगी।
क्या है आने वाले समय में अनुमान?
स्विट्ज़रलैंड के 'यूबीएस' बैंक के विश्लेषकों का अनुमान है कि इस चालू वर्ष का अंत आने तक कच्चे तेल का भाव 75 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ जाएगा। जबकि जर्मनी में आशंका जताई जा रही है कि ईरानी तेल यदि जल्द ही खुले बाज़ार में नहीं आया, तो इस वर्ष की गर्मियों में ही कच्चे तेल का भाव प्रति बैरल 80 डॉलर के पार चला जाएगा।
दूसरी ओर यह संभावना भी प्रबल बताई जा रही है कि वर्षों से चल रहे प्रतिबंधों ने ईरानी अर्थव्यवस्था को जिस तरह जर्जर कर दिया है, उसे देखते हुए ईरानी सरकार परमाणु अस्त्रों पर रोक लगाने वाले मूल समझौते को पुनः प्रभावी करना मान जाएगी। यदि ऐसा होता है और कच्चे तेल का भाव अनाप-शनाप नहीं बढ़ता, तब भी पर्यावरण और जलवायुरक्षा संबंधी 2015 के पेरिस समझौते को ध्यान में रखते हुए विश्वभर की सरकारों को पेट्रोल-डीज़ल का भाव बढ़ाते रहना पड़ेगा। तेल जलाकर चलने वाले वाहन तापमानवर्धक कार्बन डाइऑक्साइड गैस के उत्सर्जन का बहुत बड़ा स्रोत हैं।
इतना बड़ा कि इस उत्सर्जन की मात्रा तेज़ी से घटाने के लिए, 2019 में, नीदरलैंड की सात पर्यावरण संस्थाओं और 17000 आम नागरिकों ने मिलकर, पेरिस समझौते की याद दिलाते हुए, तेल कंपनी 'रॉयल डच शेल' के विरुद्ध हेग में मुकदमा दायर कर दिया। कंपनी का मुख्यालय हेग शहर में ही है। अदालत ने गत् 26 मई को फ़ैसला सुनाया है कि शेल को 2030 तक कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को घटा कर आधा करना होगा।
कार्बन डाइऑक्साइड के विश्वव्यापी उत्सर्जन के पूरे एक प्रतिशत के लिए अकेले वही ज़िम्मेदार है। यह भी कहा कि 2050 तक यह उत्सर्जन इतना घट जाना चाहिए कि जलवायु पर उसका कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। अपने ढंग का विश्व में यह पहला अदालती फ़ैसला है।
अन्य देशों में भी अब ऐसे ही मुकदमे चल सकते हैं; ऐसे ही फ़ैसले हो सकते हैं। यानी, तेल कंपनियों और तेल उत्पादक देशों की समस्याएं तो बढ़ेगी ही, पेट्रोल-डीजल भी लगातार मंहगा होता रहेगा।
जर्मनी में भी एक ऐसे ही मुकदमे पर अपने निर्णय में अदालत ने सरकार से कहा कि कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन घटाने का 2030 तक का उसका लक्ष्य देश की युवा पीढ़ी के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। पेरिस समझौते के प्रकाश में इस लक्ष्य को और अधिक ऊंचा उठाना होगा।
जर्मनी उन देशों से एक है, जहां पेट्रोल-डीज़ल सबसे अधिक मंहगा हैः 10 प्रतिशत इथेनॉल वाला सबसे सस्ता पेट्रोल औसतन डेढ़ यूरो (क़रीब 140 रूपये) प्रतिलीटर और डीज़ल एक यूरो 10 सेन्ट (क़रीब 100 रुपये) प्रतिलीटर। पेट्रोल की असली क़ीमत केवल 30 प्रतिशत के बराबर है। बाक़ी 70 प्रतिशत में जीएसटी, पर्यावरण (CO2 ) टैक्स और तेल के अग्रिम भंडारण का शुल्क शामिल है।
यही अनुपात डीज़ल पर भी लागू होता है। भारत या जर्मनी ही नहीं, सारी दुनिया के सामने यही यक्ष प्रश्न है कि वाहनों के लिए तेल को वरीयता दी जाये या समय रहते जलवायु परिवर्तन की रोकथाम को। तेल का विकल्प हो सकता है, जलवायु का नहीं।
लेखक पिछले 50 वर्षों से जर्मनी में हिंदी भाषी पत्रकार हैं। जर्मन रेडियो-टेलीविज़न डोएचे वैले (DW) के भारतीय विभाग में दो दशकों तक प्रमुख रहें हैं।
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