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विश्व पर्यावरण दिवस 2020: देसी पद्धति और चिंतन के विकास से ही पर्यावरण का संरक्षण संभव

Fri, 05 Jun 2020 06:24 PM IST
Gautam Chaudhary गौतम चौधरी
Updated Fri, 05 Jun 2020 06:24 PM IST
सार

  • दुनिया में मानवीय विकास के लिए जंगलों की सफाई की जाने लगी।
  • विकास के क्रम में अनुपयुक्त मानव की भी बड़े पैमाने पर हत्या की गई।
  • बर्फ की बारिश से लेकर रेगिस्तान तक का प्रबंधन मानवीय सोच का अंग बन गया।
  • आदिवासी चिंतन की सबसे पहली अवधारणा है कम खर्च में अधिक से अधिक खुश रहना।

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विश्व पर्यावरण दिवस 2020 - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

पर्यावरण दिवस पर गंभीर विमर्श की जरूरत है। पूरी दुनिया में इस दिवस को लेकर बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित करने की परिपाटी रही है। चूंकि इस बार कोरोना महामारी का खतरा है इसलिए बड़े-बड़े कार्यक्रम को आयोजित नहीं किए जा रहे हैं लेकिन गंभीर विमर्श तो हो ही रहा है।

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इस दिवस का मोटा मोटी मतलब पर्यावरण का संरक्षण है। पर्यावरण के संरक्षण का मतलब यह है की दुनिया में जो प्राकृतिक विविधता है उसको बचाकर रखना। 

दरअसल, जब मानव का विकास प्रारंभ हुआ तो विकास के धुन में आदमी ने इस पर कभी ध्यान ही नहीं दिया कि वह जिस प्रकार से विकास कर रहा है उससे प्रकृति को भयंकर क्षति पहुंच रही है। विकास की आधुनिक चिंतकों ने प्रकृति पर विजय को ही विकास समझ लिया और यहीं से गड़बड़ी प्रारंभ हो गई।
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पश्चिम के चिंतकों ने प्रकृति को एक स्त्री के रूप में देखा। ऐसी स्त्री के रूप में जिसकी बांह मोड़ने से वह अपने सारे रहस्यों को उगल देगी। इस चिंतन के विकसित होते ही दुनिया भर में प्रकृति पर कब्जे का अभियान प्रारंभ हो गया। नित नए विज्ञान ने प्रकृति के रहस्य को खोजना प्रारंभ किया।
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इस क्रम में प्रकृति पर आक्रमण करना उसको क्षति पहुंचाना और उस पर कब्जा करना यह मानव का पुरुषार्थ गिना जाने लगा।

दुनिया में मानवीय विकास के लिए जंगलों की सफाई की जाने लगी। बड़े पैमाने पर जानवरों की हत्या की गई। बड़े-बड़े पुल बनाए गए। नदियों पर बांध बना दिए गए। यहां तक की विकास के क्रम में अनुपयुक्त मानव की भी बड़े पैमाने पर हत्या की गई।

यानी यह तय किया गया कि मानव जहां चाहेगा वहां पानी होगा, जहां चाहेगा वहां वन होगा, जहां चाहे वहां हवा होगी, जहां चाहे वहां सूर्य की रोशनी पहुंचेगी, जहां चाहे वहां बारिश होगी, जहां चाहे वहां खेती होगी और मनुष्य जहां चाहेगा वह स्थान बंजर हो जाएगा।

बर्फ की बारिश से लेकर रेगिस्तान तक का प्रबंधन मानवीय सोच का अंग बन गया। आखिरी में ऐसा होने लगा कि जीवन जीने के लिए जो तत्व चाहिए उसमें ही कमी आने लगी।

इसके बाद जब मनुष्य को मनुष्यता पर खतरा महसूस होने लगा तो अब यह चिंतन सामने आया है कि मानव को जीवन जीने के लिए और आने वाली पीढ़ी को जीवित सुरक्षित भविष्य प्रदान करने के लिए पर्यावरण का संरक्षण जरूरी है।

इसी विषय को लेकर के विगत् दिनों विकास भारती, बिशनपुर के सचिव और जाने-माने चिंतक पद्मश्री अशोक भगत जी से मेरी बातचीत हो रही थी। उन्होंने सतत् विकास पर अपनी बात रखते हुए बहुत ही गंभीर बातें बताई। 

जो आदिवासी अपने स्थान पर मालिक थे उनको विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों में ....

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आदिवासियों को पशुपालन से अलग किया गया - फोटो : Pixabay

उन्होंने विकास के संदर्भ में बात करते हुए बताया की चक्रीय विकास का मतलब विकास का चक्र है। पश्चिमी सोच के अनुसार विकास रैखिक होता है यानी एक रेखा पर लगातार बढ़ता है लेकिन यह विकास कभी भी सस्टेनेबल नहीं होता है। इसमें कहीं न कहीं ब्रेक लग जाता है और विकास अवरुद्ध हो जाता है।

चक्रीय विकास से विकास की निरंतरता बनी रहती है। परशुराम मिश्रा ने अपने जीवन में कई प्रकार के प्रयोग किए। रांची के पास ओरमांझी में उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों को एकत्रित कर लगभग 400 एकड़ में निजी जंगल का निर्माण करवाया। जंगल के माध्यम से उन्होंने हजार से अधिक ग्रामीणों को लाह की खेती का प्रशिक्षण दिया।

आज ग्रामीण लाह की खेती करके बहुत ही बढ़िया पैसा कमा रहे हैं। जहां मिश्रा ने काम प्रारंभ किया था आज वह स्थान बेहद विकसित हो चुका है। उस इलाके में लाह की खेती करने वाले किसान जो कल तक किसी दूसरे के खेत में जाकर या रांची में जाकर मजदूरी करते थे उनके बच्चे बहुत ही बढ़िया स्कूल और कॉलेज में पढ़ रहे हैं।

परशुराम मिश्रा ने जिस जिस को लाह की खेती का ट्रेनिंग दिया वह सारे के सारे कृषक आज दूसरे को ट्रेनिंग दे रहे हैं। सब के पक्के मकान हैं। सब के पास अपनी चार चक्के की गाड़ी है। यहां सकारात्मक परिवर्तन साफ दिखता है। इस प्रकार का परिवर्तन बड़े पैमाने पर किया जा सकता है। दरअसल, परशुराम मिश्रा मिट्टी जांच पदाधिकारी रहे।

चंडीगढ़ में मिट्टी जांच इंस्टिट्यूट में निदेशक थे। उनके जिम्मे शिवालिग पहाड़ से मिट्टियों के कटाव और सुखना लेक में निक्षेप के जमाव से छुटकारा दिलाने का काम लगाया गया था। उसी क्रम में उन्होंने सुखो माजरी नामक गांव को विकसित किया था।

वहां उन्होंने सतत विकास यानी सस्टेनेबल डेवलपमेंट के कई प्रयोग किए। हालांकि बाद में चलकर स्थानीय लोगों और प्रशासन की उपेक्षा के कारण मिश्रा का प्रयोग अब निष्प्रभावी हो गया है लेकिन लंबे समय तक वह प्रयोग एक मॉडल के रूप में काम करता रहा है। बाद में मिश्रा ने इसी प्रकार के ग्राम विकास के छोटे-छोटे कई प्रयोग झारखंड में किए। वह प्रयोग फलीभूत हो रहा है।

भारतीय आधुनिक शिक्षा पद्धति व्यक्ति को नौकर बनाती है...

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आदिवासी चिंतन की अवधारणा है दुनिया भर के लिए खुशी की कामना करना - फोटो : Pixabay

इस विषय को लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य परिषद के सदस्य उमेश नजीर उक्त दोनों प्रयोग और उसे स्थापित करने वाले दोनों व्यक्तियों के चिंतन से तो सहमत हैं लेकिन बेहद गंभीरता के साथ कहते हैं कि सतत विकास की अवधारणा सचमुच भारतीय अवधारणा है।

उनका यह भी कहना है कि चाहे इस विकास की अवधारणा को लेकर जिन लोगों ने काम किया है या तो वह अशोक भगत हो या परशुराम मिश्रा हो या कोई अन्य हो उस काम की स्वीकार्यता समाज में भी है और हम लोग भी इस बात को लेकर सहमत हैं कि अगर सचमुच में भारत जैसे देश का विकास करना है तो उसका रास्ता यही होना चाहिए लेकिन औपनिवेशिक शोषण जो साम्राज्यवादी सोच का हिस्सा है उसके शोषण में इस देश में सतत्  विकास की अवधारणा को कभी परिपक्व होने ही नहीं दिया गया।

नजीर बताते हैं इस अवधारणा को परिपक्वता तक पहुंचाने की जरूरत है और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में स्थापित करने की आवश्यकता है। नजीर एक नई अवधारणा प्रस्तुत करते हैं।

नजीर कहते हैं कि जिस प्रकार भारत की आजादी के समय सभी चिंतन, सभी पार्टी, संगठन के लोगों ने मिलकर के इस देश को आजाद कराया, उसी प्रकार आज हम ऐसे चौराहे पर आकर खड़े हो गए हैं जहां हम सब को मिलकर विकास की नई और देसी अवधारणा विकसित करनी पड़ेगी।

दुनिया भर में कई प्रयोग हुए हैं। साम्यवादी प्रयोग हुए, पूंजीवादी प्रयोग हुए, साम्राज्यवादी प्रयोग हुए। साम्राज्य का निर्माण हुआ लेकिन विकास की जो अवधारणा होनी चाहिए वह कहीं नहीं दिखता है।सतत विकास पर दुनिया में कहीं काम नहीं हो पाया। इसलिए सच में यदि हमको विकास करना है और मानवीय सभ्यता को बचाना है तो हमें अपने विकास की अवधारणा को बदलना पड़ेगा।

उन्होंने बताया कि भारतीय आधुनिक शिक्षा पद्धति व्यक्ति को नौकर बनाती है। शिक्षा पद्धति जिस माध्यम से जिस चिंतन के लोगों के द्वारा भारत आई है उनके यहां कृषि पशुपालन और हस्तशिल्प जैसी परंपरा खत्म कर दिया। अंग्रेज विकास के उस रथ पर चढ़कर के आए जो शोषण और पराधीनता का द्योतक था।

आज भी हमने उसमें कोई संशोधन नहीं किया। लकीर के फकीर बने रहे। सारी व्यवस्थाएं अंग्रेजों के द्वारा खड़ी की गई है। यह व्यवस्था हमें मुकम्मल इंसान नहीं एक सामाजिक प्राणी बना देता है। यूरोप में प्रकृति पर कब्जा करने और ज्यादा से ज्यादा सुख-सुविधाओं को एकत्रित करने का चिंतन विकसित हुआ जो हमारे भारतीय चिंतन से मेल नहीं खाता है इसलिए यदि साम्राज्यवादी शोषण से मुक्ति प्राप्त करना है तो देसी पद्धति विकसित करनी ही पड़ेगी।

इस विषय पर कई जगह कई ढंग से काम हो रहे हैं। हिंदू चिंतन को मानने वाले अब इस बात को लेकर एकमत हो रहे हैं की विविधता से ही भारत का विकास संभव है। इस बात को लेकर आदिवासी जनजातीय समाज में भी जबरदस्त तरीके से लोग सोचने लगे है।

आदिवासी चिंतन यह कहता है की प्रकृति जिसमें वृक्ष, नदी, तालाब, सूर्य, चंद्रमा, यह जो प्रकृति के प्रत्यक्ष रूप है, जिसके द्वारा हमें भोजन मिलता है, संरक्षण मिलता है, यही हमारा भगवान और इस पर अगर किसी प्रकार का कोई आक्रमण होता है तो हमारी जीवन पद्धति पर, हमारे जीवन जीने की शैली पर आक्रमण होता है।

आदिवासी चिंतन की सबसे पहली अवधारणा है कम खर्च में अधिक से अधिक खुश रहना। दूसरी अवधारणा है प्रकृति के (चर-अचर) के साथ एकात्म भाव विकसित करना। तीसरी अवधारणा, अगली पीढ़ी को बेहतर पृथ्वी प्रदान करना और चौथी अवधारणा है दुनिया भर के लिए खुशी की कामना करना।

यदि सचमुच प्रकृति को और पर्यावरण को बचाना है तो हमें देसी एवं भारतीय चिंतन को आत्मसात करना पड़ेगा। आधुनिकता जरूरी है विज्ञान भी जरूरी है लेकिन प्रकृति पर कब्जा करने का विज्ञान मानवीय सभ्यता को विनाश की ओर ले जाएगा इसलिए कोरोना महामारी ने हमें सतर्क होने के लिए कहा है नहीं सतर्क हुए तो विनाश अवश्यंभावी है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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