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World Day Against Child labour: प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से रूकेगा बालश्रम

Fri, 12 Jun 2020 08:29 PM IST
Avinash chandra अविनाश चंद्र
Updated Fri, 12 Jun 2020 08:29 PM IST
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World Day Against Child labour: To Prevent there s need Quality Education and per capita income of india
क्या यह मान लिया जाए कि हमारे देश में बालश्रम निरोधी कानून कमजोर हैं?

कुछ महीने पूर्व दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के प्रांगण में नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी से एक बार फिर मिलना हुआ। कैलाश जी ने बंधुआ बाल मजदूरों के उत्थान के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया है। मुलाकात के दौरान नन्हें मुन्ने बच्चों को अमानवीय व खतरनाक परिस्थितियों में बंधुआ मजदूरी कराने की कई भयावह और रोंगटे खड़ी कर देने वाली घटनाओं का विवरण उनसे सुन चुका हूं। 

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उन्होंने बंधुआ मजदूरों के रेस्क्यू की कुछ घटनाओं से संबंधित लघु फिल्में भी दिखाई हैं। फैक्ट्री और कारखानों के संचालकों द्वारा बच्चों को तमाम प्रकार की यातनाएं देने की बातें भी अक्सर उनसे और अन्य सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं से जानने सुनने को मिलती रहती है। कई मामलों में यातनाओं को सहते सहते छोटे छोटे बच्चों को जीवन भर के लिए अपंग हो जाना पड़ता हैं तो कइयों की असमय मौत भी हो जाती है। यह जानकर किसी का भी मन विचलित हो सकता है। 
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आखिर किसी सभ्य समाज में कोई ऐसा कैसे हो सकता है? सरकार द्वारा देश में बालश्रम व बंधुआ मजदूरी को रोकने के लिए कानून भी बनाए गए लेकिन इससे बालश्रम कराने वालों की संख्या में कमी आ गई यह कहना वास्तविकता की अनदेखी करने से जैसा ही होगा। बच्चों के साथ कार्यस्थल पर क्रूरता के सभी नए मामले पिछले मामलों से अधिक भयानक होते हैं। 
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बच्चों के साथ घटित होने वाली जब भी ऐसी कोई बड़ी और अमानवीय घटना उजागर होती है बालश्रम रोकने के लिए और कड़े और प्रभावी कानून बनाने की मांग उठने लगती है। प्रत्येक मामले में बच्चों से श्रम कराने वाले दुकानदारों, फैक्टरी और कारखाना मालिकों, ढाबे व रेस्टोरेंट संचालकों के प्रति कड़ी से कड़ी सजा की मांग की जाती है। तो क्या यह मान लिया जाए कि हमारे देश में बालश्रम निरोधी कानून इतने आसान हैं कि किसी उद्यमी और व्यवसायी को इससे डर नहीं लगता और वह बालश्रम कराना जारी रखता है! 

टेक्सास टेक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बेंजामिन पॉवेल के मुताबिक बालश्रम और इसके उन्मूलन का सीधा संबंध विपन्नता और संपन्नता से है। अपनी किताब 'ऑऊट ऑफ पॉवर्टी: स्वीटशॉप्स इन द ग्लोबल इकोनॉमी' में वह बताते हैं कि वर्ष जिन देशों की प्रतिव्यक्ति आय 12 हजार डॉलर से ऊपर है वहां बालश्रम बिल्कुल नहीं होता है। प्रतिव्यक्ति आय 10 हजार डॉलर और इससे कम वाले देशों में बालश्रम थोड़ा बहुत और 600 से 2000 डॉलर प्रतिव्यक्ति आय वाले देशों में बालश्रम बहुतायत में होता है। 

World Day Against Child labour: To Prevent there s need Quality Education and per capita income of india
सिर्फ कड़े कानून बनाने और संवेदनशीलता दिखाने से इस समस्या का समाधान निकलना मुश्किल है
कहने का अभिप्राय ये है कि जबतक अमेरिकी व यूरोपीय देशों में प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि नहीं हुई वहां बालश्रम में कमी नहीं हुई, भले ही कितने ही कड़े कानून बना लिए गये। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ऐसे तमाम लोग जिन्हें बचपन में मजदूरी आदि करनी पड़ी उनके संपन्नता प्राप्त करने के बाद अगली पीढ़ी को बालश्रम करने की जरूरत नहीं पड़ी। 

लेकिन जिन देशों ने अपने यहां प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि करने के यत्न करने की बजाए बालश्रम को रोकने के लिए कड़े कानून बनाए वहां बच्चों के साथ गैरकानूनी ढंग से बालश्रम, बंधुआ बालश्रम आदि कराने के मामले बढ़ते गए। प्रोफेसर पॉवेल के मुताबिक जब अमेरिकी गारमेंट कंपनियों को बांगलादेश की फैक्टरियों में बच्चों के द्वारा प्रति सप्ताह 6 दिन 10 से 12 घंटे मजदूरी करने और बदले में 51 सेंट प्रतिदिन कमाने की बात पता चली तो उन्होंने उन कंपनियों से आयात करना बंद कर दिया। 

मजबूरी में कंपनियों को बच्चों को काम से निकालना पड़ा। हालांकि अधिकांश बच्चे बाद में गैरकानूनी ढंग से अन्य फैक्टरियों में चोरी छिपे काम करने लगें। अधिकांश बच्चियों को वेश्यावृति करने को मजबूर होना पड़ा। स्पष्ट है कि सिर्फ कड़े कानून बनाने और संवेदनशीलता दिखाने से इस समस्या का समाधान निकलना मुश्किल है। 

इसके अलावा भारत जैसे देश में शिक्षा का गुणवत्ताहीन होना भी बालश्रम का बड़ा कारण है। अभिभावक जानते हैं कि सरकारी स्कूलों में जाकर समय व्यतीत करने और बाद में बेरोजगार रहने से अच्छा शुरु से ही काम सीखना और बालिग होने की अवस्था प्राप्त करते करते आय अर्जित करना बेहतर है। सभी को गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान कर भी समस्या को कम किया जा सकता है। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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