फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   world cinema history, sri lanka cinema history and its significance

विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: पड़ोसी देश श्रीलंका का सिने-इतिहास

Fri, 23 Sep 2022 04:10 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Fri, 23 Sep 2022 04:10 PM IST
सार

श्रीलंका फ़िल्म उद्योग के जनक कहे जाने वाले, तमिल तथा सिंहली में फ़िल्म बनाने वाले, एस.एम. नायगम का श्रीलंका के फ़िल्म उद्योग में विशेष योगदान है। 1945 में उन्होंने सिंहली भाषा में फ़िल्म बनाने के लिए मदुरई में ‘चित्रकला मूवीटोन’ की स्थापना की।

विज्ञापन
world cinema history, sri lanka cinema history and its significance
सिनेमा का इतिहास - फोटो : istock

विस्तार

विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया के इस अंक में आज बात करते हैं भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका द्वीप के सिने-इतिहास की। हिन्दु तथा बौद्ध धर्म से प्रभावित हिन्द महासागर का यह द्वीप अपने जंगलों, वनस्पतियों, मसालों तथा रत्नों के लिए जाना जाता है। भारत और श्रीलंका के फ़िल्म जगत में बड़ा गहरा संबंध है, यह संबंध कभी प्रेम का होता है, कभी नफ़रत का। वहां पुरानी पद्धति के सिनेमा थियेटरों में डिजिटल फ़िल्म दिखाने की दिक्कत है।

विज्ञापन


फ़िल्म को 35 एमएम में बदलना खर्चीला और कठिन है। फ़िल्म जगत से जुड़े लोग श्रीलंका की फ़िल्मों के भविष्य को लेकर चिंतित है। श्रीलंका में बॉलीवुड की फ़िल्मों का क्रेज है। साथ ही भारत में बनी तमिल फ़िल्में खूब देखी जाती हैं। सिंहली और तमिल दोनों मूलत: भारतीय हैं। तमिल दक्षिण भारत से जाकर वहां बसे लोग हैं, जबकि सिंहली किसी समय उड़ीसा से ले जा कर बसाए गए लोग हैं।
विज्ञापन


1901 से शुरू हुआ सिनेमा का सफर

श्रीलंका में पहली ऑफ़ीसियल फ़िल्म का प्रदर्शन 1901 में हुआ। जाफ़ना के फ़ोटोग्राफ़र एड्ब्ल्यूए आन्द्री ने सर्वप्रथम स्थानीय फ़िल्म कंपनी ‘कोरिक बाइस्कोप’ की स्थापना की, ऑडिटोरियम का इंतजाम किया और विदेश से फ़िल्में मंगा कर यूरोप की मूक फ़िल्में दिखाने लगे। बीसवीं सदी के प्रारंभ में श्रीलंका में ‘क्वीन विक्टोरिया’, ‘एडवर्ड सप्तम’ जैसी विदेशी फ़िल्में दिखाई जाती थीं। उस समय यह देश ब्रिटिश साम्राज्य का अंग था और ‘सिलोन’ के नाम से जाना जाता था। इन फ़िल्मों के दर्शक या तो ब्रिटिश होते अथवा इंग्लिश जीवन पद्धति अपना चुके श्रीलंका के निवासी।
विज्ञापन
विज्ञापन

 
इंग्लिशमैन वारविक मेजर ने खुले मैदान में फ़िल्में दिखाने का चलन प्रारंभ कर इसे जनता के लिए सुलभ कर दिया। एक समय चार्ली चेप्लिन, ग्रेटा गार्बो, जॉन बेरीमोर की फ़िल्मों का श्रीलंका में क्रेज था। 1903 में वहां पहला मूवीहॉल ‘मदन थियेटर’ बना। श्रीलंका के लिए भारतीय निर्देशकों, अभिनेताओं, तकनीशियन द्वारा फ़िल्में भारत में बनती थीं।

भारत में बनी फ़िल्म ‘बिल्वा मंगल’ ने इंग्लिश फ़िल्मों से बाजी मार ली। श्रीलंका में 1925 में बनने वाली पहली फ़िल्म ‘राजकीय विक्रममाया’ (रॉयल एडवेंचर) थी। इसे भारत और सिंगापुर में दिखाया गया। आग की भेंट चढ़ने के कारण यह अपने देश में प्रदर्शित न हो सकी। आज यह उपलब्ध नहीं है।
 

श्रीलंका फ़िल्म उद्योग के जनक कहे जाने वाले, तमिल तथा सिंहली में फ़िल्म बनाने वाले, एस.एम. नायगम का श्रीलंका के फ़िल्म उद्योग में विशेष योगदान है। 1945 में उन्होंने सिंहली भाषा में फ़िल्म बनाने के लिए मदुरई में ‘चित्रकला मूवीटोन’ की स्थापना की तथा ‘कुमारगुरु’ (तमिल) तथा ‘कडवुनु पोरोन्डुव’ (पहली सिंहली फ़िल्म, ‘ब्रोकेन प्रोमिस’) बनाई। इसके बाद जयमाने ने कोयंबतूर से सिंहली फ़िल्में बनानी शुरू की। कुछ फ़िल्में सेलम में बनीं। इनमें रुक्मणी देवी तथा एड्डी जयमाने जैसे भारतीय अभिनेता अभिनय करते थे। इस समय ‘उमातु विश्वेसाया’, ‘दैव विपकाया’, ‘मगल पोरुवा’ आदि फ़िल्में लोकप्रिय हुई। 


श्रीलंका की स्वतंत्रता के आस-पास एस.एम. नायगम श्रीलंका आ गए, उन्होंने ‘श्री मुरुगम नवकला स्टूडियो’ की स्थापना की और ‘अहंकार स्त्री’, ‘प्रेम तरंगाया’ आदि कई सफ़ल फ़िल्में बनाई। पचास और साठ के दशक श्रीसेन विमलवीर तथा के. गुणरत्नम ने श्रीलंका के इतिहास पर ‘अशोक’, ‘सुजाता’ जैसी ऐतिहासिक फ़िल्में बनाई। 1956 में लेस्टर जेम्स पेरीज, विलियम ब्लेक तथा टीटस टोटवाटे ने ‘रेकवा’ के स्टूडियो के बाहर  शूटिंग कर बनाई।

यह फ़िल्म सिंहली ग्रामीण जीवन, उनके रीति-रिवाज और विश्वासों पर केंद्रित कुछ-कुछ डॉक्यूमेंट्री की शक्ल में है। मुख्य किरदार सेना एक चमत्कारी युवा है, कहा जाता है कि उसने अपने दोस्त अनुला को अंधा ठीक कर दिया। अंतरराष्ट्रीय समीक्षकों के बीच सराही गई यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर असफ़ल रही। लेस्टर जेम्स पेरीज ने कई अन्य फ़िल्में बनाई, उनकी प्रयोगधर्मी फ़िल्म ‘गेम्पेरालिया’ में कोई गाना नहीं है, इसे राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय कई पुरस्कार प्राप्त हुए। इसी तरह श्री गुणसिंघे की फ़िल्म ‘सात समुद्र’ भी एक कलात्मक फ़िल्म है। 

world cinema history, sri lanka cinema history and its significance
श्रीलंका में सिंहली तथा तमिल भाषा में फ़िल्में बनती हैं। - फोटो : Instagram

सत्तर के दशक का सिनेमा

निर्देशक, सिनेमेटोग्राफ़र तथा एडीटर डॉ. डी.बी. निहालसिंघ तथा धरमसेन प्रतिराजा, वसंत ओबेशेखर, प्राज्ञसोम हैट्टिआरची सत्तर के दशक के प्रमुख निर्देशक थे। ‘वेलकटारा’, ‘वेस गाटो’, ‘पलनगेटियो’, ‘बम्बारु अविथ’, ‘अहास गौवा’, ‘तुम मन हन्दिया’ आदि सत्तर के दशक की प्रसिद्ध फ़िल्में हैं। सुमित्रा पेरीज ने भी स्त्री विषयक ‘गेहनू लमाई’ तथा ‘गंगा एधारा’ फ़िल्में बनाई। हैट्टिआरची की फ़िल्म ‘मेकर्स, मिटीरियल एंड मोटिफ़्स’ को वेनिस अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह 1952 में गोल्ड मेडल मिला, 1972 में भी यही पुरस्कार फ़िल्म ‘सेंटनरी ऑफ़ सीलोन टी’ के लिए प्राप्त हुआ। 

श्रीलंका में सिंहली तथा तमिल भाषा में फ़िल्में बनती हैं। जब भारत-श्रीलंका में तनाव चल रहा था, प्रसिद्ध सिंहली निर्देशक पाथीराज ने अच्छी तमिल फ़िल्म ‘पोन्मणी’ बनाई, उसे देखने तमिल दर्शक नहीं गए। यहाँ सरकारी नीतियों तथा सेंसर से भी फ़िल्म निर्माण में ऊँच-नीच होती रहती है। गृहयुद्ध पर बनी कोई भी फ़िल्म सेंसर से पास होना कठिन है।

फ़िल्म निर्देशक अशोक हैंडगामा ने इस विषय पर फ़िल्में बनाई और आलोचना झेली है। बॉलीवुड की ‘मद्रास कैफ़े’ को श्रीलंका में काफ़ी आलोचना झेलनी पड़ी। वैसे ‘मद्रास कैफ़े’ चमक-दमक वाली, वास्तविकता से दूर एक मसाला मूवी है।
 

श्रीलंका के प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक प्रसन्ना वीतनागे ने 1992 में अपनी पहली फ़िल्म ‘सिसिला गिनी गानी’ (आइस ऑफ़ फ़ायर) बनाई जिसे काफ़ी अच्छी समीक्षाएं मिलीं तथा बेस्ट डॉयरेक्टर, बेस्ट एक्टर, बेस्ट एक्ट्रेस श्रीलंका का पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1996 में बनी ‘अनंत रात्रि’ (डार्क नाइट ऑफ़ द सोल) उनकी दूसरी फ़िल्म है।


प्सन्ना वीतनागे की डिजिटल मोड की फ़िल्म ‘विथ यू, विथाउट यू’ 2013 में फ़्रांस में रिलीज हुई। प्रसन्ना वीतनागे की तीसरी फ़िल्म ‘पावुरु वालालू’ (वॉल्स विदइन) की नायिका नीता फ़ेरनांडो को 1998 में सिंगापुर इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टीवल में सर्वोत्तम नायिका का सम्मान प्राप्त हुआ। कुल मिलाकर इसे दस पुरस्कार हासिल हुए। चौथी फ़िल्म ‘पुराहांडा कालुवारा’ (डेथ ऑन ए फ़ुल मून डे) के पुरस्कारों की कहानी भी कुछ ऐसी ही रही। इसे एमिन्स फ़िल्म फ़ेस्टीवल में ग्रैंडपी प्राप्त हुआ, कई अन्य सम्मान भी मिले।

उनकी  इस फ़िल्म ‘पुराहांडा कलुवारा’ की कहानी श्रीलंका के गृहयुद्ध से प्रभावित सैनिकों के परिवार का अध्ययन करती है। उनकी ‘आकाश कुसुम’ कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में प्रदर्शित हुई और सराही गई। जयसुंदर की फ़िल्म ‘सुलग्न एनु पिनिसा’ को सर्वोत्तम फ़िल्म के लिए कैमरा डी’ओर का सम्मान मिला।

‘पाण्डुअभय’, ‘श्री सिद्धार्थ गौतम’, ‘सिरी पराकम’, ‘इरा मदियामा’ (अगस्त सन), ‘आकाश कुसुम’ ‘ओबा नाथुवा ओबा एक्का’ (विथ यू, विथआउट यू) आदि श्रीलंका की कुछ अन्य प्रसिद्ध फ़िल्में हैं। आज प्रसन्ना वीतनागे, अशोक हैंडगामा और जयसुंदर की गिनती श्रीलंका के प्रसिद्ध कला-फ़िल्म निर्देशकों में होती है। 



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed