विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: चीन का सिने-इतिहास
1933-37 को चीनी सिने-इतिहास में प्रथम स्वर्ण युग के नाम से जाना जाता है। इस काल में ‘स्ट्रीट एन्जेल’, ‘द पीच गर्ल’, ‘गोडेस’ जैसी फिल्में बनीं जो यथार्थ पर आधारित थीं और जिनके केंद्र में स्त्री जीवन था।
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पश्चिम में प्रारंभ से चीन फ़ंतासी के रूप में परदे पर रहा है, एक ऐसा स्थान जहां दिवा-स्वपन देखे जा सकते हैं अथवा यौन संतुष्टि की जा सकती है। बाहर की फ़िल्मों में चीनी चरित्र मजाक का बायस होता है। जब यह सब हद पार कर गया तो चीन की सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा। चीन में भले ही सिनेमा का अन्वेषण न हुआ हो मगर 1896 में चीन सिनेमा से परिचित हो गया था। जल्द ही वहां फिल्में बननीं प्रारंभ हुईं और 1905 में उसकी पहली फ़िल्म ‘डिन्गजुन माउंटेन’ बन कर तैयार थी। शुरू में चीन की फ़िल्मों का मुख्य कथानक ‘एक्शन’ हुआ करता था।
तीसरे दशक तक अमेरिका के फ़िल्म तकनीशियन चीन के सिने-तकनीशियन को प्रशिक्षित कर रहे थे। अत: चीन की फिल्मों पर अमेरिकी प्रभाव था। उस समय चीन का शांघाई फ़िल्म निर्माण का केंद्र था।
सिने-इतिहास में प्रथम स्वर्ण युग
1933-37 को चीन सिने-इतिहास में प्रथम स्वर्ण युग के नाम से जाना जाता है। इस काल में ‘स्ट्रीट एन्जेल’, ‘द पीच गर्ल’, ‘गोडेस’ जैसी फ़िल्में बनीं जो यथार्थ पर आधारित थीं और जिनके केंद्र में स्त्री जीवन था। अन्य देशों की भांति चीन में भी स्त्री जीवन आसान न था। ‘द पीच गर्ल’, ‘गोडेस’ की बेहतरीन नायिका रुआन लिन्ग्यु ने मात्र 25 साल की उम्र में आत्महत्या की थी, हालांकि वह इतनी लोकप्रिय थी कि न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार अंतिम यात्रा का जलूस तीन मील लंबा था।
इस दौरान सिया यान की ‘टोरेंट्स’ (1933), युआम मुझी की ‘स्ट्रीट एन्जेल’ (1937), शी शिलिंग की ‘क्रॉसरोड’ (1937) आदि कई नामचीन फ़िल्में बनी। लेकिन इसके साथ ही कई ‘ब्लू’ फ़िल्म तथा हॉरर फ़िल्में भी बनीं।
सिने-इतिहास का दूसरा स्वर्ण युग
चीन के सिने-इतिहास का दूसरा स्वर्ण युग 1947 से 1949 तक माना जाता है। इस दौरान ‘द स्प्रिंग रिवर फ़्लोज ईस्ट’ (काई चुशेन्ग) ‘स्प्रिंग इन ए स्मॉल टाउन’ (फ़ेइ मु), ‘क्रोज एंड स्पैरोज’ (झेन्ग जुन्ली) जैसी फिल्में बनीं। ‘स्प्रिंग इन ए स्मॉल टाउन’ को चीन की सब कालों की श्रेष्ठ कहा जाता है। 1948 में निर्देशक शी यु ने ‘लाइट ऑफ़ ए मिलियन होप्स’ एक क्लासिक फ़िल्म बनाई है। 1949 में कम्युनिस्ट जीत गए और नेशनलिस्ट ताइवान टापू की ओर चले गए। कम्युनिस्ट, नेशनलिस्ट तथा हॉन्ग कॉन्ग, अब चीन के तीन फ़िल्म उद्योग केंद्र थे।
1949 के बाद चीन में सिनेमा में संख्यात्मक और तकनीक विकास हुआ। 1955 में ‘कॉमेडी रिसर्च युनिट’ की स्थापना हुई इसके एक साल बाद बेजिंग फ़िल्म अकादमी बनी। 1964 में चीन में पहली एनीमेशन फ़ीचर फ़िल्म ‘अपरोर इन हैवन’ बनी। 1965 में निर्देशक सिय जिन की ‘स्टेज सिस्टर्स’ को मास्टरपीस का दर्जा हासिल है, जबकि फ़िल्म का उत्तरार्ध अत्यंत आदर्शवाद से ग्रसित है।
1960 के मध्य से 1970 के मध्य तक करीब दस साल सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर चीन में फ़िल्म निर्माण तकरीबन ठप्प रहा। क्लचरल रिवोल्युशन काल में बेजिंग फिल्म अकादमी बंद रही, लेकिन 1982 में बनी ‘यलो अर्थ’ (निर्देशक: चेन कैग), ‘वन एंड एट’ (निर्देशक: ज़ांग युन्ज़ाओ), ‘बेजिंग बास्टर्ड्स’ (1993, निर्देशक: ज़ांग युआन) फ़िल्मों को विश्व में खूब प्रसिद्धि मिली।
चीन की कुछ फ़िल्में जैसे ‘स्प्रिंग रिवर फ़्लो ईस्ट’, ‘क्रोज एंड स्पैरोज’, निर्देशक कैग चेन की ‘फ़ेरवल माई कॉन्क्यूबाइन’ एवं ‘एम्परर एंड दि असासिन’, ‘रेज द रेड लैन्टर्न’ (झांग यि-मो), ‘स्प्रिंग इन ए स्मॉल टाउन’, ‘सिटी ऑफ़ लाइफ़ एंड डेथ’ (चुआन लु), ‘रेड सोगम’ (झांग यिमो) आदि फ़िल्में सिने-प्रेमियों के बीच खूब लोकप्रिय हुई, उन्हीं में से कुछ फ़िल्मों पर बात करते हैं।
लेकिन उसके पहले यह जानना रुचिकर होगा कि जिन कई फ़िल्मों को हम चीन की फ़िल्म के नाम से जानते हैं, वे असल में चीन की फ़िल्म नहीं हैं। ‘क्राउचिंग टाइगर हिडन ड्रैगन’ चीन की नहीं ताइवान की फ़िल्म है, इसे बनाया भी ताइवान के सिने-निर्देशक ऑन्ग ली ने है। उन्होंने ही ‘लाइफ़ ऑफ़ पी’ तथा ‘हल्क’ जैसी फ़िल्में भी बनाई है। इसी तरह ‘इन द मूड फ़ॉर लव’ (कार-वाई वोन्ग), ‘फ़िस्ट ऑफ़ फ़्यूरी’ (वेइ लो), ‘दि वन-आर्म्ड सोर्ड्समैन’ (चे चान्ग) फिल्में चीन में नहीं हॉन्ग कॉन्ग में बनी हैं।
‘स्प्रिंग रिवर फ़्लो ईस्ट’ प्रेम, वासना, बहादुरी और बेवफ़ाई की गाथा है, जिसे ‘गॉन विथ द विन्ड’ से जोड़ा जाता है। 171 मिनट की ड्रामा फ़िल्म ‘फेरवल माई कॉन्क्यूबाइन’ दो लड़कों की 70 साल लंबी चली दोस्ती की कहानी है। 1993 की इस फ़िल्म में लेस्ली चेउन्ग, फ़ेन्जी झांग, गॉन्ग ली आदि ने अभिनय किया है।
1948 की फ़िल्म ‘स्प्रिंग इन ए स्मॉल टाउन’ भी ड्रामा-रोमांस की श्रेणी में आती है। एक अकेली स्त्री अपने जीवन को बहुत नीरस पाती है, लेकिन जब उसका बचपन का दोस्त लौटता है तो उसका जीवन बदल जाता है। ‘दि एम्परर एंड दि एसासिन’ राजसी षडयंत्र, क्रूरता से जुड़ी फ़िल्म है। 1998 में बनी इस 162 मिनट की फ़िल्म में गॉन्ग ली, झाउ सन, फ़ेन्गी झांग ने भूमिकाएं की हैं।
रेज द रेड लैन्टर्न
1991 की फ़िल्म है, ‘रेज द रेड लैन्टर्न’ जिसे देखते हुए ऋतुपर्ण घोष की फ़िल्म ‘अंतरमहल’ की याद कौंध जाती है, हालांकि दोनों के कथानक एवं ट्रीटमेंट में जमीन-आसमान का फ़र्क है। चीन की यह चटकीले रंगों, खूबसूरत चेहरों तथा तनाव वाली फ़िल्म धूसर जिंदगी की कहानी कहती है। फ़िल्म नी झेन के उपन्यास ‘वाइव्स एंड कॉन्क्यूबाइन्स’ पर आधारित है।
2 घंटे से ऊपर की इस फ़िल्म की नायिका सॉन्गलिआन (अभिनेत्री गॉन्ग ली) एक धनी व्यक्ति की चौथी पत्नी है। घर के भीतर पत्नियों को सारी सुविधाएं– खाना-कपड़ा, गहना, नौकर-चाकर सब प्राप्त हैं। घर के कुछ नियम हैं, एक नियम है जिस रात पति जिस पत्नी के पास जाएगा उस शाम उसके घर के सामने ऊपर लाल रंग की लालटेन लटकाई जाएगी। सॉन्गलिआन को उसके घर वालों ने बेचा है।
निर्देशक झांग यि-मो की इस फ़िल्म को स्त्री के दमन-शोषण, जमींदारी प्रथा पर आक्रमण के रूप में भी देखा जा सकता है। झांग यि-मो ने ही इसके पहले 1987 में नोबेल पुरस्कृत उपन्यासकार मो यान के उपन्यास ‘रेड सोगम’ पर इसी नाम से 91 मिनट की फ़िल्म बनाई थी। वे स्त्री केंद्रित फ़िल्म सफ़लतापूर्वक बनाते हैं। एक सुंदर युवती नपुंसक, कोढ़ी अंगूर के खेतों के मालिक को बेच दी गई है।
यहां भी नायिका के रूप में अभिनेत्री गॉन्ग ली है। यह फ़िल्म भी अपनी खूबसूरती, अत्याचार के लिए देखी जानी चाहिए। सिनेमास्कोप में बनी यह रंगीन फ़िल्म सरलता से अपनी कहानी कहती है। जल्द ही कोढ़ी पति मर जाता है और युवा पत्नी को कई मोर्चों पर लड़ना होता है।
एक ओर डाकुओं से बचना है, दूसरी ओर पियक्कड़ प्रेमी है और तीसरी ओर से जापानी सेना चढ़ी चली आ रही है। फ़िल्म का काल पिछली सदी का तीस का दशक है। ‘रेड सोगम’ को कई पुरस्कार प्राप्त हुए। चीन की फिल्में तो कई और हैं जिन पर फिर कभी।
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