आखिर कब पास होगा महिला आरक्षण बिल?
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अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस जा चुका है और हर साल की तरह जिस तरह महिला शक्ति का महिमा मण्डन और सम्मान उमड़ा उसे देख कर तो लगता है कि राम से पहले सीता का नाम लेने और पार्वती को शिव की शक्ति का प्रतीक मानने वालों के इस देश में सचमुच ’’यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमते तत्र देवता’’ की हमारी पौराणिक धारणा सचमुच साकार ही रही है। लेकिन व्यवहार में देखा जाए तो कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर है।
घरेलू हिंसा, दुष्कर्म, दहेज हत्या, कार्यस्थल में उत्पीड़न जैसी बुराइयां समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए तो हैं ही, मगर राजनीति क्षेत्र में भी देखें तो महिलाओं को विधानसभाओं और संसद में एक तिहाई आरक्षण विधेयक 2010 से लटका पड़ा है मगर उसे पास कराने की चिंता किसी को नहीं है जबकि राज्यसभा में बहुमत न होने के बावजूद ऐसे संविधान संशोधन पास हो गए जिनके कारण आज देश में अशांति मची हुई है और दुनिया हमारी धर्मनिरपेक्ष छवि पर ऊंगली उठा रही है।
राजनीतिक अधिकारों के लिए शुरू हुआ महिला दिवस
महिला दिवस को जब सबसे पहले वर्ष 1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन सम्मेलन में अन्तर्राष्ट्रीय दर्जा दिया गया तो उस समय इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिलवाना ही था, क्योंकि उस समय अधिकतर देशों में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था।
यद्यपि समाजवादी देश तब से ही 8 मार्च को महिलाओं के अधिकारों और समानता की आवाज के रूप में इस दिवस का मनाते रहे हैं, लेकिन 1977 में संयुक्त राष्ट्र ने भी इसे अंगीकार किया तो भारत में भी इस अवसर पर हर साल जलसे होने लगे। लेकिन महिलाओं को राजनीति में समान अधिकार देने की मूल भावना अब भी नदारद है। जबकि इसी भारत ने दुनिया की दूसरी महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी दी थी जिसने दुनिया का राजनीतिक भूगोल ही बदल डाला और अमेरिका जैसे महाबली की धमकियों की परवाह न कर पाकिस्तान को तोड़ कर एक नया देश ही बना डाला।
यही नहीं भारत प्रतिभा पाटिल जैसी एक महिला राष्ट्रपति बन गई, सुमित्रा महाजन लोकसभा की स्पीकर बन गई, मायावती और जयललिता जैसी महिलाएं राज्यों की सफल मुख्यमंत्री बनीं। भारत में एक महिला सीतारमन रक्षा मंत्रालय का नेतृत्व भी कर चुकी हैं। मगर हमारा पुरुष प्रधान राजनीतिक तंत्र अब भी महिलाओं को देश का भविष्य तय करने के लिए विधायिकाओं में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए महिला आरक्षण बिल पास कराने को तैयार नहीं है।
संसद में आधी आबादी का 14 प्रतिशत प्रतिनिधित्व
वर्ष 2019 में 17वीं लोकसभा के लिए हुए चुनावों में जीतने वाली महिलाओं की संख्या अब तक की सबसे अधिक संख्या 78 रही। जो कि कुल सांसदों का मात्र 14.58 प्रतिशत है। इसकी तुलना में 2014 में हुए लोकसभा चुनाव 11.23 प्रतिशत महिलाएं जीती थीं। 2014 में 8,251 प्रत्याशियों में से 668 महिलाएं थीं जिनमें से 62 चुनाव जीतीं थीं। जबकि 2019 के चुनावों में 8,049 प्रत्याशियों में से 716 महिलाएं थीं। इनमें से भाजपा की प्रज्ञा ठाकुर आदि 46 महिलाएं पहली बार लोकसभा का चुनाव जीतने में सफल रहीं।
इस चुनाव में 222 महिलाएं निर्दलीय या स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में भी चुनाव लड़ीं। इनके अलावा 4 किन्नरों ने भी चुनाव में भाग्य आजमाया था जिनमें एक प्रत्याशी आम आदमी पार्टी का भी था। लेकिन उनमें से कोई भी चुनाव नहीं जीत सका।
गत् लोकसभा चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा ने कुल 53 महिला प्रत्याशी मैदान में उतारी थीं, जिनमें से 34 जीत दर्ज कर लोकसभा में पहुंची हैं। इसकी तुलना में, ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ने 41 प्रतिशत और बीजू जनता दल ने 33 प्रतिशत महिलाओं को चुनाव मैदान में उतारा था। चुनाव जीतने वाली प्रमुख महिलाओं में सोनिया गांधी, हेमा मालिनी, मानेका गांधी, स्मृति ईरानी, नुशरत जहां, किरन खेर एवं मिमी चक्रवर्ती आदि हैं।
देश की सर्वोच्च पंचायत संसद में देश के भविष्य पर चिंतन करने तथा उसे संवारने की व्यवस्था करने के लिए पहली बार लोकसभा में महिलाओं का हिस्सा 14.58 प्रतिशत तक बढ़ना खुशी की बात तो है मगर सन्तोषनक बात नहीं है, क्योंकि पिछले एक दशक से भी अधिक समय से देश की इस आधा आबादी के लिए कम से कम एक तिहाई सीटों के आरक्षण पर चर्चा चल रही है।
2010 से लटका हुआ है महिला आरक्षण बिल
महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन 108वां विधेयक 2008 में मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में 2008 में पेश हुआ था जो कि 9 मार्च को विधेयक 2010 में राज्यसभा में पारित हुआ मगर लोकसभा में पारित नहीं हो पाया। उसके बाद 2014 में लोकसभा भंग हो गई। चूंकि राज्यसभा स्थायी सदन है, इसलिए यह बिल अभी जिंदा माना जा सकता है।
स्पष्ट बहुमत वाली मोदी सरकार अब लोकसभा में इसे पारित करा दे, तो राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन सकता है। लेकिन नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने धारा 370 जैसे बेहद जटिल और लगभग नामुमकिन लगने वाले संविधान संशोधन को तो पारित करा दिया मगर यह सरकर महिला आरक्षण संबंधी बिल पास कराने की इच्छा पैदा नहीं कर पा रही है। जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने का वायदा किया था। चूंकि 2019 के चुनाव में भाजपा के घोषणापत्र में इस मुद्दे को स्थान नहीं मिल सका।
यूपीए सरकार ने राज्यसभा में कराया था बिल पारित
अपनी सरकार रहते हुए कांग्रेस इसे राज्यसभा में पारित भी करा चुकी है। इसके अलावा कांग्रेस की सरकार 1993 में ही पंचायतों में महिला आरक्षण लागू कर चुकी है, जो पंचायतों में सफलतापूर्वक चल रही है।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर संसद के 18 जुलाई से 10 अगस्त 2018 तक चले मॉनसून सत्र में विधेयक पारित करने के लिए और उससे पहले कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर बिल पास कराने का अनुरोध किया था।
पहली बार इस विधेयक को देवगौड़ा के नेतृत्व वाली लोकसभा में 1996 में पेश किया गया था तब भी सत्तारूढ़ पक्ष में एक राय नहीं बन सकी थी। 1998 में जब इस विधेयक को पेश करने के लिए तत्कालीन कानून मंत्री थंबी दुरै खड़े हुए थे तब संसद में इतना हंगामा हुआ और हाथापाई भी हुई उसके बाद उनके हाथ से विधेयक की प्रति को लेकर लोकसभा में ही फाड़ दिया गया था।
धारा 370 तक हटा दी मगर महिला आरक्षण के लिए दम नहीं
मोदी सरकार अपने साहसिक और बेहद जटिल फैसले लेने के लिए जानी जाती रही है। तीन तलाक को गैर कानूनी करार देने और अनारक्षित वर्ग के निर्धनों को भी सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत जैसे साहसिक फैसले लेने के कारण ही देश की जनता ने मोदी सरकार से ऐसी ही अपेक्षाओं के साथ उसे दुबारा सत्ता सौंपने के लिए पहली बार 2019 के लोकसभा चुनाव में किसी गैर कांग्रेस दल को सरकार बनाने के लिए 303 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत दिया था।
इससे प्रधानमंत्री मोदी की हिम्मत और बढ़ी और उनके वरदहस्त से गृहमंत्री अमित शाह ने सत्ता में आने के 6 महीनों के अन्दर ही जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली संविधान की धारा 370 एवं 35ए को समाप्त करने के लिए जम्मू और कश्मीर (पुनर्गठन) अधिनियम, 2019; जम्मू और कश्मीर आरक्षण (संशोधन) अधिनियम 2019 पारित करा दिया।
यही नहीं विपक्ष और दुनिया की परवाह किए बिना मोदी सरकार ने राज्यसभा में भाजपा का बहुमत न होते हुए भी धारा 370 को हटाने की तरह ही नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 को भी पारित करा दिया मगर ‘‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’’ तथा ’’यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमते तत्र देवता’’ का पाठ पढ़ाने वाली मोदी सरकार महिला आरक्षण बिल पास कराने का साहस नहीं जुटा पाई।
राजनीति में महिला आरक्षण की शुरुआत 1993 से
महिलाओं को राजनीति में समुचित हिस्सेदारी देने और देश के विकास में उनके योगदान को सुनिश्चित करने की पहल 1993 में संसद द्वारा 73वें एवं 74वें संविधान संशोधन से हो गई थी। भले ही यह सपना राजीव गांधी का था और उन्होंने ही पंचायतीराज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देकर उन्हें सशक्त करने एवं महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए नवीन पंचायतीराज का विधेयक तैयार कराया था, जिसे 1993 में नरसिम्हाराव के कार्यकाल में संसद ने संविधान में भाग 9 जोड़कर अनुच्छेद 243 डी में महिला आरक्षण की व्यवस्था की थी।
आज देश की इन पंचायतीराज संस्थाओं में 13.45 लाख महिला प्रतिनिधि (कुल निर्वाचित प्रतिनिधियों में 46.14 प्रतिशत) लोकतंत्र की बुनियादी इकाई में सक्रिय रहते हुए क्षेत्रीय विकास में योगदान दे रही है। लेकिन उसके बाद जब विधानसभा और लोकसभा में भी एक तिहाई महिला आरक्षण की बात आई तो राजनीतिक दलों की करनी और कथनी का अंतर आड़े आ गया।
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