जो खेलेगा वही खिलेगा: खेलों में भारतीय महिलाओं का परचम
ओलंपिक में पहली बार तलवारबाजी में क्वालीफाई करने वाली, ओलंपियन सीए भवानी देवी ने एशियाई तलवारबाजी चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है।
विस्तार
विज्ञापनस्पोर्ट्स से खेल भावना पैदा होती है जो मैदान पर और मैदान के बाहर, दोनों ही जगह महत्वपूर्ण है और यही कारण है कि मैं अकसर कहता हूं- जो खेले, वो खिले।
-प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी
निश्चित तौर पर आज जो खेलेगा वो खिलेगा! एक खिलाड़ी को खिलने के लिए तपन, बारिश और जाडे़ में भी जलना पड़ता है। देश के लिए मेडल लाने का सपना साकार करने के लिए अक्सर खिलाड़ियों को अपने बचपन से समझौता करना पड़ता है। बचपन में खेल और खेल में मेडल का सपना लेकर जवानी की सीढ़ियां कब चढ़ जाते हैं खिलाड़ी, उनको स्वयं को पता नहीं चलता।विज्ञापन
खिलाड़ी महिला हों या पुरुष खेल को अपना जीवन बनाने के लिए उन्हें जीवन की बेहतरीन खुशियों से समझौता करना ही होता है। ’खेल’ नसों में जनून और ’मेडल’ आंखों में सपना बनकर जब रातों को जगाते हैं तब कहीं जाकर हाथों में फूलों सा और गले में गर्व का गहना बनते हैं ’’मेडल’’।विज्ञापन विज्ञापनआशाओं और उम्मीदों का मेडल
देश के लिए जीते गए मेडल सिर्फ सोने, सिल्वर या कांसें के नहीं होते। ये आशाओं और उम्मीदों से भी बने होते हैं। यह एक खिलाड़ी की जीवन भर की तपस्या का परिणाम होता है। जिन्हें वह बन्द कमरे, आंगन या दूर किसी एकान्त में पूरा करता है। हम तो केवल एक दिन का परिणाम देख पाते हैं लेकिन यह उनकी, उनके माता-पिता, परिवार साथियों की अनगिनत कोशिशों में सिमटी सफलता और असफलता का परिणाम होते हैं।
तपस्या हर खिलाड़ी को करना होती है लेकिन महिलाओं को अपने भविष्य निर्माण के लिए खेल का रास्ता चुनना पुरुषों के अपेक्षा अधिक जटिल जान पड़ता है। उन्हें समाज से परिवार तक लोहा लेना पड़ता है। निःसंदेह महिलाओं को सहनशीलता और लगन अधिक दी है कुदरत ने, लेकिन हर महिला अपने सपनों के लिए समाज से लड़ नहीं पाती। अपनी क्षमता का पता उसे भले ही हो लेकिन खेल की दुनिया में मिलने वाले थपेड़ों को वह अकेले सहन नहीं कर पाती।
ऐसी संख्या लाखों से भी अधिक होगी जहां लड़कियां खेल में भविष्य तराशना चाहती हैं। वो बेहतरीन प्रर्दशन करती हैं, लेकिन एक समय के बाद उन्हें परिवार का सहयोग हासिल न होने के कारण देश सेवा का मौका नहीं मिल पाता।
जिन लड़कियों को उनके परिवार और समाज का थोड़ा भी सहयोग रहता है, वो एक दिन निश्चित तौर पर अपने परिवार और राष्ट्र का नाम रोशन करती हैं। आज भारत की होनहार बेटियां भारत के तिरंगे को ओलम्पिक के मैदान में आंखों से चूमतीं हैं। भारत के राष्ट्रगान की ध्वनि में सराबोर पूरे वातावरण को झूमने के लिए मजबूर कर देती हैं। तब हर भारतीय का सीना गर्व से भर जाता है।
उन बेटियों के संघर्ष की जीवनी किसी दिन दंगल जैसी फिल्म के रूप में हमारे सामने आकर महिला खिलाड़ियों के त्याग और परिश्रम की झलक दिखा जाती है। हालांकि फिल्म कितनी भी बेहतरीन क्यों न हो, तीन घण्टे में पूरे जीवन की तड़प और संद्यर्ष को समेट ही नहीं सकती।
फिल्म तो केवल सफल किरदार पर बनती है ऐसी कितनी ही कहानियां होती हैं, जिन्हें अपने संद्यर्ष के समय सहयोग की कमी के कारण मंजिल के नजदीक पहुंच, दिशा बदलने पर मजबूर होना पड़ता है। भारत में अब तक के खेलों में जितने भी मेडल महिलाओं ने जीते हैं उससे कहीं ज्यादा जीतने का दम भारत की बेटियां रखती हैं।
भारत एक भूमि तपोवन है यहां की महिलाएं किसी क्षेत्र में कमतर नहीं हैं। यदि उन्हें सही दिशा और उचित मार्गदर्शन एवं परिवार का सहयोग मिले तो वह दिन दूर नहीं जब भारत के बेटियां विश्व में मेडल लाने की फेहररिस्त में सबसे आगे खड़ी होंगी।
खेलों में बढ़ रहा है महिलाओं का प्रतिनिधित्व
वर्तमान में खेलों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व पहले की अपेक्षा बहुत बढ़ा है। कुछ परिवार बेटियों को खेल में करियर बनाने के लिए बढ़-चढ़ कर हिस्सा भी ले रहें हैं। लेकिन ऐसा प्रतिशत गांवों की अपेक्षा शहरों में अधिक है। हालांकि भारत सरकार की समय-समय पर विभिन्न योजनाओं के माध्यम से महिलाओं को दिया जाने वाला प्रोत्साहन सराहनीय है।
खेलो इण्डिया गेमों के माध्यम से दिया जाने वाला सहयोग निश्चित तौर पर आने वाले समय में खेलों में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाने वाला है। लेकिन फिर भी मंजिल अभी दूर है और हमें महिलाओं के कैरियर चुनाव के प्रति और सरल बनना होगा। बहुत सी महिलाएं हैं जिन्होंने खेल के द्वारा अपने गांव, समाज और परिवार का नाम जगमगाया है उनकी मशाल को समाज में तेजी से फैलाना होगा। उनके संद्यर्ष को समाज का साहस बनाना होगा।
भारत की संद्यर्षशील बेटियों में एक तारा, ध्रुव तारा बनकर उभरी है। जिसके द्वारा जीते गए मेडल ने भारत को तलवार बाजी में ऊंची उड़ान का न्योता दिया है। ओलंपिक में पहली बार तलवारबाजी में क्वालीफाई करने वाली, ओलंपियन सीए भवानी देवी ने एशियाई तलवारबाजी चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीत कर देश का नाम रोशन किया है।
एशियाई तलवारबाजी चैंपियनशिप का अयोजन सन 1973 से हो रहा है परन्तु अब तक कोई भी (महिला या पुरुष) एशियाई तलवारबाजी चैंपियनशिप का किला फतह नहीं कर पाया है। 29 वर्षीय भवानी ने वो कर दिखाया जो अब तक के इतिहास में किसी ने नहीं किया। उन्होंने इस किले को फतह कर कांस्य पदक जीत कर दंगल मूवी के इस डायलॉग को अनेकों को याद दिला दिया होगा - 'मैं हमेशा ये सोच के रोता रहा कि छोरा होता तो देश के लिए गोल्ड लाता। ये बात मेरे समझ में न आई कि गोल्ड तो गोल्ड होता है, छोरा लावे या छोरी।''
यकीनन जो खेलेगा वही खिलेगा। भारत की बेटियों के लिए खेलों के प्रति सकारात्मक सोच वाले समाज और बेहतर समझ वाले परिवार का निर्माण हमें मिलकर करना होगा। बेटियां वो सब कर सकती हैं जो बेटे कर सकते हैं। समाज और सरकार को उनके बेहतर भविष्य के निर्माण के लिए पहले से भी अधिक सकारात्मक सोच पैदा करनी होगी तभी वैश्विक स्तर पर खेलों में महिलाओं का परचम लहराएगा।
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