समाज : जब बेटियां नहीं होंगी तो वधू कहां से आएगी?
राजस्थान की एक खबर इन दिनों देशभर में सुर्खियां बटोर रही है। दौसा जिले के 40 वर्षीय कैलाश उर्फ कल्लू महावर ने सरकार को पत्नी उपलब्ध कराने के लिए पत्र लिख दिया। कल्लू की यह विचित्र मांग सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। कल्लू ने कैसी पत्नी चाहिए?
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राजस्थान की एक खबर इन दिनों देशभर में सुर्खियां बटोर रही है। दौसा जिले के 40 वर्षीय कैलाश उर्फ कल्लू महावर ने सरकार को पत्नी उपलब्ध कराने के लिए पत्र लिख दिया। कल्लू की यह विचित्र मांग सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। कल्लू ने कैसी पत्नी चाहिए?
इसका उल्लेख भी पत्र में किया। कल्लू को 30-40 वर्ष की गोरी, पतली और सभी कार्यों में अग्रणी महिला से शादी करनी है। शुरुआत में तो तहसीलदार ने पंचायत सचिव, पटवारी और सरपंच की कमेटी बनाकर कल्लू के लिए पत्नी खोजने के आदेश दे डाले, लेकिन जब मामला थोड़ा ज्यादा चर्चा में आया तो तहसीलदार ने हाथ खींच लिए। कल्लू की मांग खारिज कर दी गई।
वधू न मिलने की यह समस्या केवल एक कल्लू महावर की नहीं है। आज देश में बड़ी संख्या में युवा शादी से वंचित हो रहे हैं और इसका एक बड़ा कारण देश में लिंगानुपात में अंतर और मुक्त होते समाज में आ रहे बदलाव भी हैं।
भारत एक पुरुष प्रधान समाज वाला देश है। यहां बेटियों से ज्यादा बेटों की चाह रहती है। यही कारण है कि देश में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या कम है। वूमेन एंड मेन इन इंडिया-2022 की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2011 में हजार पुरुषों पर 943 स्त्री थीं। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2036 में यह आंकड़ा थोड़ा सुधर कर हजार पुरुषों पर 952 स्त्रियां हो सकता है। लिंगानुपात में बड़े अंतर के कारण बड़ी संख्या में पुरुषों को शादी के लिए वधू नहीं मिल पाती हैं और वह कुंवारे रह जाते।
एक बड़ा कारण शहरी और ग्रामीण क्षेत्र की बदलती परिस्थितियों को भी माना जा सकता है। पिछले कुछ दशकों में देश में शहर तेजी से बढ़े हैं और बड़ी संख्या में गांव से शहरों की ओर पलायन हुआ है। समाज में आज एक स्थिति यह भी उत्पन्न हो गई है कि गांवों में लड़कियां जल्दी से विवाह के लिए तैयार नहीं हो रही हैं।
खासकर शहरी लड़कियां गांव में जाने से बचती हैं। कुछ-कुछ यही स्थिति कस्बों की भी है। बड़े शहरों की लड़कियां कस्बों में भी शादी करना पसंद नहीं कर रही हैं। हर किसी को बड़े शहर में रहना है। सभी को सुख-सुविधाएं पसंद हैं। इससे भी ग्रामीण युवाओं में विवाह न होने की एक समस्या धीरे-धीरे बढ़ रही है।
संयुक्त से एकल परिवार की ओर बढ़ चले देश में परिवारों को सीमित करना अस्सी के दशक से ही शुरू हो गया था। यदि आज हम अपने आसपास देखते हैं तो पाते हैं कि एकल परिवारों में यदि बड़ी संतान पुत्र है तो फिर दंपती दूसरा बच्चा नहीं कर रहे हैं। इस चलन के कारण बड़ी संख्या में ऐसे परिवार बढ़ रहे हैं, जिनके घर में एक ही बच्चा है।
यदि किसी घर में बड़ी संतान पुत्री है तो वह दूसरा बच्चा करने की सोचता है। ऐसे में लिंगानुपात लगातार गड़बड़ा रहा है। कुछ लोग यह कहकर इस बात का बचाव करते हैं कि महंगाई में एक बच्चा पालना भी बड़ा मुश्किल होता है, लेकिन इस सोच ने रिश्तों को समेट दिया है। आज चाचा, ताऊ, मामा, मौसी, बुआ जैसे रिश्ते परिवार से लुप्त होते जा रहे हैं।
देश में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, दिल्ली, बिहार में तो स्थिति बेहद गंभीर है। पंजाब में हजार पुरुषों पर 893, राजस्थान में 928, हरियाणा में 897, दिल्ली में 866, उत्तर प्रदेश में 908 और बिहार में 916 स्त्रियां हैं। हालांकि, दक्षिणी राज्य केरल में 1000 पुरुषों टर 1084, पुडुचेरी में 1038, तमिलनाडु में 995 और आंध्रप्रदेश में 992 स्त्रियां हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो इन आंकड़ों को नेशनल शेम (राष्ट्रीय शर्म) तक कह चुके हैं। उन्होंने भारत में लड़कियों को बचाने के लिए धर्म युद्ध का आह्वान किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेटियों को कोख में मारना बंद करें, की अपील कर चुके हैं और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ पर जोर देते हैं।
वहीं, पिछले कुछ दशकों से देश में रिश्ते तलाशने का व्यापार तेजी से बढ़ा है। आज अखबारों में वैवाहिक विज्ञापन छपवाकर लड़का या लड़की ढूंढी जाती हैं। ढेरों ऑनलाइन मैट्रिमोनियल वेबसाइट्स चल रही हैं, जिन पर लाखों बायोडाटा लोड हो रहे हैं। आज अच्छा वर और वधू मिलना भी बेहद कठिन काम हो गया है। शादी के बाद रिश्ता कब तक टिका रहेगा, यह सवाल तेजी से चर्चा में आ रहा है। वैसे तो भारत में तलाक की दर 1.1% है, लेकिन शहरीकरण और अधिकारों के प्रति जागरुकता ने तलाक के केसों को तेजी से बढ़ाया है।
आज महिला सशक्तीकरण ने शहरी क्षेत्रों में विवाह विच्छेद की शुरुआत की है, क्योंकि आर्थिक रूप से शिक्षित महिलाएं जीवन भर चुपचाप सहने के बजाय रिश्ता खत्म करने के विकल्प के लिए खुले दिल से सोच रही हैं। सोशल मीडिया के प्रसार ने भी सामाजिक ढांचे को बदला है। आज जरूरत यह है कि समाज इस दिशा में तेजी और गंभीरता से विचार करे कि हमारे यहां लिंगानुपात के अंतर को कैसे खत्म किया जाए? रिश्ते कैसे मजबूत बनें? जिससे किसी कल्लू महावर को सरकार को पत्र लिखकर पत्नी न मांगनी पड़े।
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