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पक्षियों की अनोखी दुनिया: पांग, प्रवासी पक्षियों का घर

Sat, 12 Nov 2022 03:01 PM IST
Himanshu Gupta हिमांशु गुप्ता
Updated Sat, 12 Nov 2022 03:01 PM IST
सार

अक्तूबर आते ही प्रवासी पक्षियों का आगमन भी हो जाता है और नवंबर तक सभी मुख्य प्रजातियां यहां पहुंच जाती हैं। मगर सर्दियों में होने वाले कोहरे की वजह से ये पंछी कम दिखाई देते हैं।

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Winter Migration of Birds at Pong Dam in Himachal Pradesh in Hindi
प्रवासी पक्षी - फोटो : Himanshu Gupta

विस्तार

भारत और पक्षियों का हमेशा ही एक अनूठा संबंध रहा है। हर ऋतु में तरह-तरह के पंछी विभिन्न इलाकों में देखने को मिलते हैं। भारतीय पक्षियों की सूची में प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में शामिल हैं। शीत ऋतु आरंभ होते ही हर साल लाखों की तादात में प्रवासी पक्षी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से उड़ कर भारत आते हैं। ठंडे खून वाले पंछी होने की वजह से और सर्दियों में खाने की कमी होते ही यह पक्षी अपने प्रजनन भूमि को छोड़ कर हमारे देश के अलग-अलग राज्यों में स्थित झील,नदी, नहर इत्यादि के पास पनाह ले लेते हैं, वसंत ऋतु के दौरान वापस अपने घर की और चल पड़ते हैं।

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लगभग 400 से भी अधिक प्रवासी प्रजातियां भारत में सर्दियों में दिखाई दे चुकीं हैं। इनमें से बड़ी संख्या हिमाचल प्रदेश में स्थित पांग बांध या महाराणा प्रताप सागर को अपना घर बना लेती हैं।

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वन्यजीव जगत में लोकप्रिय है पांग

पांग, हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित है, यह बांध वर्षों से ही वन्यजीव जगत में लोकप्रिय रहा है। ब्यास नदी पर बना यह बांध एक बहुत बड़े जलाशय का आकार लेता है। यह जलाशय इतना बड़ा है कि कई बार एक छोर से दूसरा छोर दिखाई भी नहीं देता। यह जलाशय और आस-पास के क्षेत्र मिल कर पांग वन्य जीव अभ्यारण्य का निर्माण करते हैं।

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पांग न केवल निवासी पशु-पक्षियों को जीवन प्रदान करता है, बल्कि हर साल लाखों प्रवासी पक्षियों को भी शरण देता है। प्रतिवर्ष यहां 100 से भी अधिक प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां आती हैं। इनमें से कुछ प्रजातियां यहां विश्राम करने के बाद फिर आगे रवाना हो जाती हैं और बाकी यहीं पर शीत ऋतु बिताते हैं।
 

प्रवासी पक्षियों में मुख्य रूप से 3 प्रकार के पक्षी पांग में आते हैं। पानी के पक्षी जैसे की यूरेशियन कूट या दसारी, ग्रेलैग गूज़ या काज, उत्तरी सींखपर, छोटी मुर्गाबी, तिदारी इत्यादि एक बड़ी संख्या में दिखाई दे सकते हैं। प्रवास करने वाले सभी पक्षियों में सबसे ऊंचा उड़ने वाले पक्षी का स्थान लेने वाले बार-हेडेड गीज़ या बिर्वा, प्रवासी पक्षियों में सबसे अधिक तादात में आते हैं। 2022 में इनकी संख्या 47598 पाई गई हैं।


इनके अलावा वेडर्ज़ यानी तटपक्षी भी यहां भरी मात्रा में हर वर्ष आते हैं। कई प्रकार के प्लोवर, स्टिंट, गोडविट, स्नाइप, टिटहरी इत्यादि भी यहां पर दिखाई दे सकते हैं। छोटे पक्षियों में भी विभिन्न प्रजातियां यहां आ कर शीत ऋतु का आनंद लेती हैं। पिपेट और लार्क, भूरे रंग के ये पक्षी अपने छोटे आकार और रंग की वजह से आसानी से छलावरण हो जाते हैं, जिसकी वजह से उनकी आवाज तो दूर से भी सुनाई देती है मगर देखना कभी-कभी काफी मुश्किल हो जाता है।

इनके अलावा व्हीटियर भी जमीन के पास और रेड्स्टार्ट अक्सर पेड़ों व झाड़ियों में दिख जाते हैं। कई दुर्लभ प्रजातियां जैसे ग्रेटर-व्हाइट फ्रंटेड गूज, उत्तरी लैपविंग, यूरेशियन ओएस्टरकैचर, ग्रेटर वाइटथ्रोट, गिद्ध, छुटकन्ना उल्लू इत्यादि भी यहां अपना नाम अंकित करवा चुकी हैं।

Winter Migration of Birds at Pong Dam in Himachal Pradesh in Hindi
प्रवासी पक्षी - फोटो : Himanshu Gupta

इस साल प्रवासी पक्षियों की संख्या एक लाख के पार

2022 में की गई गणना के अनुसार, 1,10,309 प्रवासी पक्षी इस साल में दर्ज किए गए हैं। पिछले कुछ सालों से ना केवल प्रवासी पक्षियों की संख्या में बढ़ोतरी पाई गई है, बल्कि कई नई प्रजातियां हर साल इस सूची में शामिल हो रही हैं। इनकी खुराक भी इनके अलग-अलग रहने के तरीकों की वजह से अलग अलग होती है, मगर पांग हर एक पक्षी का ख्याल रखना जनता है।

जहां पानी वाले पंछियों के लिए ताज़े पानी की मछलियां जैसे मशीर, कतला और सिंघारा, पानी के पौधे मुख्य ख़ुराक बन जाती हैं तो वहीं छोटे पंछी अन्य छोटे कीड़े-मकोड़े और जानवर खाते हैं। कई बड़े पक्षी छोटे पंछियों को भी खा कर अपना पेट भरते हैं। ताजे पानी का स्रोत होने की वजह से पांग के आस-पास के इलाके खेती के लिए भी अनुकूल हैं और अक्सर कई तरह के पक्षी इन खेतों में वनस्पति का आनंद लेते हुए दिख जाते हैं।
 

अक्तूबर आते ही प्रवासी पक्षियों का आगमन भी हो जाता है और नवंबर तक सभी मुख्य प्रजातियां यहां पहुंच जाती हैं। मगर सर्दियों में होने वाले कोहरे की वजह से ये पंछी कम दिखाई देते हैं। जनवरी और फरवरी के महीने इनको देखने के लिए सबसे उपयुक्त हैं क्योंकि इस समय इन पंछियों की संख्या सबसे अधिक होती है। फरवरी के समाप्त होने के साथ साथ ये पंछी भी वापस रवाना होना शुरू कर देते हैं और मार्च तक काफी प्रजातियां अपने घर की और प्रस्थान कर लेती हैं। मगर कभी कभी कुछ-एक पक्षी काफी देर तक भी यहां देखने को मिल जाते हैं।


इस सबकी जानकारी, वन्यजीवन की गणना, निगरानी व सुरक्षा के लिए वन-विभाग द्वारा कई प्रबंध किए गए हैं। वन-रक्षक या फारेस्ट गॉर्ड यहां हर वक़्त तैनात रहते हैं जिससे हानिकारक तत्वों से होने वाले नुक्सान जैसे अवैध शिकार, खतरनाक कीटनाशक का इस्तेमाल, कूड़ा-करकट इत्यादि को रोका जा सके। इसके अलावा एक और अहम कार्य 'टैगिंग या बर्ड-टैगिंग' भी वन-विभाग द्वारा किया जाता है।

पांग में टैग किए जा चुके पंछी कई बार वापिस अगले वर्षों में फिर से दिखाई दिए हैं। इनके अलावा अन्य जगह पर टैग किए जा चुके पंछी भी यहां दिखाई देते रहते हैं।  

पांग प्रवासी पक्षियों के लिए हमेशा ही प्रसिद्ध रहा है। इसकी भौगोलिक स्थिति, ब्यास के ताजे पानी और बेइन्तेहां खाने के स्रोत इसे सभी पशु-पक्षियों के रहने के लिए अनुकूल बनता है। पंछी-प्रेमी, नेचर-लवर्स और सार्वजनिक पर्यटक भी यहां इसकी खूबसूरती को देखने के लिए हर साल आते हैं।

पश्चिम में शाम के वक्त डूबते हुए सूरज का नज़ारा और पीछे हर वक़्त अपने विशाल रूप में अटल खड़े हुए धौलाधार नामक हिमालय की श्रृंखला यहां की ख़ूबसूरती को और भी बढ़ा देते हैं। आप भी अगली बार अगर हिमाचल जाए तो इस जगह पर घूमना न भूलें।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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