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विकास और विनाश के बीच पिसते बेजुबान : शहरों की ओर आने को मजबूर हैं जंगली जानवर

Tue, 01 Oct 2024 02:49 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Tue, 01 Oct 2024 02:49 PM IST
सार

राजस्थान का उदयपुर हो या उत्तर प्रदेश का बहराइच और लखीमपुर खीरी, इंसान बाघ, तेंदुओं और भेड़ियों से भयभीत है। आखिर क्या कारण है, जो वन्यजीव इंसानी खून के प्यासे हो गए हैं और मानव का शिकार करने निकल पड़े हैं? 

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Why Wild Animals Are Becoming Man Eaters These Days
जंगली जानवरों के आदमखोर बनने के पीछे कई वजह हैं। मुख्य रूप से जंगलों का सिकुड़ना और शिकार की उपलब्धता कम होना एक मुख्य कारण है। - फोटो : freepik

विस्तार

प्रसिद्ध शिकारी एडवर्ड जेम्स 'जिम' कॉर्बेट का नाम आपने सुना होगा, जिनके नाम पर उत्तराखंड में नेशनल पार्क है। जिम कॉर्बेट शिकारी थे और वो इसलिए प्रसिद्ध हुए, क्योंकि उन्होंने 33 नरभक्षी बाघ और तेंदुओं को मारकर उत्तराखंड (तब यूनाइटेड प्रोविंस) के लोगों को आदमखोर जानवरों से निजात दिलाई थी। इन दिनों भी देश के अलग-अलग राज्यों में कई जानवर आदमखोर हो गए हैं। राजस्थान का उदयपुर हो या उत्तर प्रदेश का बहराइच और लखीमपुर खीरी, इंसान बाघ, तेंदुओं और भेड़ियों से भयभीत है। आखिर क्या कारण है, जो वन्यजीव इंसानी खून के प्यासे हो गए हैं और मानव का शिकार करने निकल पड़े हैं? 

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शहरों की ओर क्यों रुख कर रहे हैं जानवर? 

उदयपुर में इन दिनों तेंदुए ने आतंक मचाया हुआ है। वो अब तक सात लोगों की जान ले चुका है। वन्य विभाग इस आदमखोर तेंदुए को पकड़ने में नाकाम रहा है, क्योंकि अब तक उसने जो तेंदुए पकड़े गए हैं, वो संभवतः आदमखोर नहीं थे, क्योंकि उनके पकड़े जाने के बाद भी इंसानों का मरना जारी है। उदयपुर जैसी ही कहानी उत्तर प्रदेश के बहराइच की भी है, जहां आदमखोर बन चुके भेड़िए आए दिन शिकार कर रहे हैं। उन्होंने कई बच्चों को अपना निशाना बनाया है। दर्जनों लोग उनके हमले में घायल हो चुके हैं। वन विभाग ने कई भेड़िए पकड़े हैं, लेकिन आतंक रुकने का नाम नहीं ले रहा। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में एक बाघ का आतंक लगातार बढ़ रहा है। 

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जंगली जानवरों के आदमखोर बनने के पीछे कई वजह हैं। मुख्य रूप से जंगलों का सिकुड़ना और शिकार की उपलब्धता कम होना एक मुख्य कारण है। जंगलों के आसपास या जंगलों के भीतर तक इंसान ने अपनी बस्तियां बसा रखी हैं। इंसान की गतिविधियां जंगल में बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। जब जंगली जानवर को वनक्षेत्र में पर्याप्त शिकार नहीं मिलता है तो वो इंसानी बस्तियों की ओर रुख करता है और इंसान को अपना शिकार बना लेता है। कुछ वृद्ध जानवर भी इंसानों का शिकार करते हैं। 
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इंसान ने अपने लिए कानून बनाए हैं, लेकिन जंगल का अपना कानून होता है। जंगली जानवर को अपने क्षेत्र में हस्तक्षेप निश्चित रूप से बर्दाश्त नहीं होता। हालांकि, जब कोई जंगली जानवर आदमखोर हो जाता है तो इंसान या तो उसे पकड़कर पिंजरों में डाल देता है या उसे मार डालता है। आदमखोर जानवरों को मारने के लिए कानून भी है, जिसके तहत किसी जानवर को आदमखोर घोषित किया जा सकता है।
 

वाइल्ड लाइफ एक्ट 1972 के सेक्शन 11 के अनुसार ऐसा जानवर जो इंसानों के जीवन के लिए खतरा हो गया है, उसे आदमखोर बताकर मारा जा सकता है। 


देश की आबादी लगातार बढ़ रही है। विकास की अंधाधुंध दौड़ में इंसान जंगलों को लगभग काट चुका है। आखिर जानवर जाएं तो जाएं कहां? कभी भारत में जंगल ही जंगल थे, लेकिन आज देश में जानवरों के लिए चंद नेशनल पार्क बनाकर छोड़ दिए गए हैं, लेकिन इनमें भी इंसान ने अतिक्रमण कर रखा है। सरकारें ऐसे अतिक्रमणों पर अब तक कोई भी ठोस कदम नहीं उठा सकी हैं। जब भी आदमखोर जानवरों द्वारा कोई घटना होती है तो वन विभाग चंद दिनों के लिए पिंजरे लगाकर जानवरों को पकड़ या मारकर अपने काम से इतिश्री कर लेता है।

जंगल का भी अपना एक नियम है, जिसे समझने में इंसान अब तक असफल ही रहा है। आखिर जानवरों को भी पृथ्वी पर रहने का उतना ही अधिकार है, जितना इंसानों को है। यदि जानवर नहीं रहेंगे तो पृथ्वी का संतुलन बिगड़ जाएगा। पहले ही बड़ी संख्या में वन्यजीव विलुप्त हो चुके हैं और कई विलुप्त होने की कगार पर हैं। 



सरकारों को केवल कानून बनाकर अपने काम की इतिश्री नहीं करनी चाहिए। कानूनों की सख्ती से पालना और मॉनिटरिंग की आवश्यकता है। ईमानदारी से जानवरों को उनका इलाका सौंपने की जरूरत है। यदि ऐसा न हुआ और विकास की अंधी दौड़ चलती रही तो वन्यजीवों का आदमखोर बनना जारी रहेगा। इंसान और जानवरों की लड़ाई यूं ही चलती रहेगी।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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