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नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध क्यों, इन सवालों के जवाब कौन देगा?

Wed, 11 Dec 2019 10:36 PM IST
Mohit Mudgal रवींद्र प्रकाश 
रवींद्र प्रकाश  Published by: Mohit Mudgal Updated Wed, 11 Dec 2019 10:36 PM IST
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Why is the citizenship amendment bill being opposed, protest against citizenship amendment
नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन करते लोग (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

राज्यसभा में पारित होने के साथ ही नागरिकता संशोधन विधेयक एक कानून बन गया। लोकसभा और राज्यसभा में तो विपक्षी दलों ने इस विधेयक की तीखी आलोचना की ही है लेकिन संसद के बाहर भी इस विधेयक को भाजपा के हिंदुत्व एजेंडा की कड़ी मानने वालो की कमी नहीं रही। अनेक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष माने जाने वाले दलों और उनके नेताओं को इसमें साम्प्रदायिकता की बू आई और उन्होंने बिना तार्किक आधार के इस विधेयक को नकार दिया। क्या वास्तव में यह विधेयक धर्म के आधार पर भेदभाव करता है और इसके पारित हो जाने से हमारे सामाजिक ताने-बाने के छिन्न-भिन्न हो जाने का खतरा है, यह एक विचार करने योग्य सवाल है?

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भारत स्वतंत्रता के साथ ही एक धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में उदय हुआ था। उसका बहुलतावादी चरित्र संविधान में उसके धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में घोषित किए जाने के पूर्व भी था और बाद में भी बना रहा है, जबकि पाकिस्तान का जन्म ही धर्म के आधार पर हुआ। मोहम्मद अली जिन्ना के द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत ने इस प्रायद्वीप को दो भागों में जरूर विभाजित कर दिया, परंतु भारत ने इसे कभी भी नहीं अपनाया। स्वतंत्रता के पूर्व भी हिंदुओं की एक छोटी सी जमात हिंदू महासभा ने धार्मिक आधार पर बंटवारे का समर्थन करते हुए हिंदू राष्ट्र की वकालत की थी, लेकिन इसको हिंदुओं की बहुसंख्या का समर्थन नहीं था। जवाहर लाल नेहरू, महात्मा गांधी, अंबेडकर और पटेल जैसे नेताओं ने देश के बंटवारे को तो स्वीकार कर लिया था, लेकिन भारत के लिए धर्मनिरपेक्षता पर कोई समझौता नहीं किया। आजादी के सत्तर साल बीत जाने के बाद यह सवाल फिर से खड़ा हो रहा है कि क्या इस विधेयक से हमारे बहुलतावादी चरित्र पर कोई सवालिया निशान लग रहा है और अल्पसंख्यक इस देश में इस विधेयक से असुरक्षित हो रहे हैं?
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इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें अपने पड़ोसी देशों के चरित्र को भी समझना पडे़गा। पाकिस्तान तो जन्म से ही इस्लामी देश है और मुजीबुर्रहमान के बाद बांग्लादेश ने भी इस्लाम धर्म अपना लिया, जबकि 1971 में बांगला देश की स्वतंत्रता की लड़ाई वहां के हिंदू और मुस्लिम समुदाय ने मिलकर लड़ी थी। पाकिस्तान और बांग्लादेश में बहुसंख्यक मुस्लिमों के द्वारा अल्पसंख्यकों विशेषकर हिंदुओं और सिखों पर अत्याचार कोई ढकी-छुपी बात नहीं है, इसीलिए बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक इन देशों से भारत में पलायन करते आए हैं या धर्म परिवर्तित करके इस्लाम को कबूल करते रहे हैं। अनेक हिंदुओं, सिखों और अन्य अल्पसंख्यकों को मार दिया गया और उनकी बहू- बेटियों से बलात्कार किए गए और उनका अपहरण करके धर्म परिवर्तित करवा दिया गया। यह आश्चर्य की बात है कि भारत ने कभी भी इन अत्याचारों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रभावी रूप से आवाज नहीं उठाई अन्यथा कुछ न कुछ इन अत्याचारों में कमी आ सकती थी। ये सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि आजादी के बाद इतनी बड़ी हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, पारसी और बौद्ध आबादी को क्यों इन धर्मांध देशों के हवाले बिना किसी सुरक्षा के छोड़ा गया था? 
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1950 में नेहरू-लियाकत समझौता हुआ था जिसमें इन अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का प्रावधान था, लेकिन पाकिस्तान ने कभी भी इसके प्रावधानों को लागू नही किया और वहां पर अल्पसंख्यकों पर जुल्म होते रहे हैं। इस्लामी देश बांग्लादेश भी इन अल्पसंख्यकों पर जुल्म करने में पीछे नहीं रहा। बांग्ला लेखिका तस्लीमा नसरीन ने अपने उपन्यास ‘लज्जा’ में जब इन जुल्मों का रोंगटे खड़े कर देने वाला वर्णन किया तो बांग्लादेश ने उन्हें ही देश निकाला दे दिया। तस्लीमा नसरीन आजकल दिल्ली में रह रही हैं। इन्हीं उत्पीड़नों के कारण इन दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की आबादी जो स्वतंत्रता के समय 20 से 23 प्रतिशत थी, आज घटकर मात्र 3 से 7 प्रतिशत रह गई है। वो दिन भी दूर नहीं जब ये अल्पसंख्यक नाममात्र के लिए इन देशों में रह जाएंगे। नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध करने वाले तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगों को इनके दुख-दर्दों का भी आकलन करना चाहिए।

इसी प्रकार अफगानिस्तान में जब से तालिबान का दमनकारी शासन हुआ है, अल्पसंख्यकों की स्थिति बहुत खराब है। इस दमनकारी शासन ने तो हिंदुओं और सिखों का इस देश में नामोंनिशान ही मिटा दिया है। तालिबानी शासन से तो ज्यादा आशा नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि उनका धार्मिक आधार ही कट्टरता पर निर्भर है। अनेक हिंदू और सिख इस दमनकारी शासन के बाद भारत में शरणार्थी बन कर आए हैं।

नागरिकता संशोधन विधेयक हमारे पड़ोसी देशों के इन सभी अल्पसंख्यक लोगों को जो उत्पीड़न के कारण इन देशों से पलायन करके आए हैं, नागरिकता प्रदान करता है। इसके विरोध में सबसे ज्यादा तर्क ये दिया जाता है कि इसमें मुस्लिम आबादी को क्यों शामिल नहीं किया गया है। आखिर वो भी तो उत्पीड़न का शिकार हो सकते हैं। ऐसा तर्क देने वाले पाकिस्तान में अहमदी और शिया समुदाय का जिक्र करते हैं। पाकिस्तान के कट्टरपंथी मुस्लिम इनको मुस्लिम नहीं मानते और प्रताड़ित करते हैं। लेकिन ये मुस्लिम ही हैं। ये कुरान को मानते हैं, पांचों वक्त की नमाड पढ़ते हैं और इस्लाम के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं।

अगर इस्लामी देश पाकिस्तान अपने ही लोगों का उत्पीड़न करता है तो यह उसका अंदरूनी मामला है। इसके बावजूद भी अगर ये मुस्लिम भारत में शरण मांगते हैं तो ऐसा कुछ भी नहीं है कि नागरिकता संशोधन विधेयक इसका विरोध नहीं करता। 2014 से लगभग 566 लोगों को इस आधार पर भारत में रहने की आज़ादी दी गई है। म्यांमार के रोहिंग्या और हिंदू, श्रीलंका के हिंदू और ईसाई तमिल जो अत्याचार सह रहे हैं, इस प्रायद्वीप में आजादी के बाद के उत्पीड़ित नहीं है। इसके बाद भी श्रीलंका गृहयुद्ध के समय और बाद अनेक बार तमिल शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान की गई थी।   

दूसरा तर्क है कि ये विधेयक भेदभाव करता है और भारत के साम्प्रदायिक सौहार्द को नष्ट कर देगा। इस विधेयक में तो ऐसा कुछ भी नहीं है जो भारत के अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर कोई पाबंदी लगाए। भारत में अल्पसंख्यक पहले ही की भांति संविधान मे मिले अधिकारों का उपयोग कर पाएंगे। इस विधेयक से किसी की नागरिकता छिनी नहीं जा रही बल्कि ये उन धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करता है जो पहले ही भारत में आए हुए हैं। ये विधेयक तो इस प्रायद्वीप में धार्मिक आधार पर बने देशों में उन देशों के अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों पर मलहम की भांति है। ये तो इन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं के वोटबैंक के हित हैं, जो इसे धार्मिक चश्मे से देखने और दिखलाने का प्रयत्न किया जा रहा है। महात्मा गांधी का नाम ले-लेकर इसका विरोध करने वाले यह भूल रहे हैं कि गांधी जी ने तो अपने पूरे जीवन में उत्पीड़न सहने वालों का ही समर्थन किया था।    

 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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