ये पीएम मोदी और अमित शाह की हार है? राष्ट्रीय मुद्दों से राज्य गवां बैठी भाजपा
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अभी हाल ही में संपन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का परिणाम आ गया है। हिन्दी प्रदेश, जो भाजपा की प्रयोग भूमि रही है-मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ से भाजपा चुनाव हार गई है। हालांकि तेलंगाना और मिजोरम ने कांग्रेस को भी झटका दिया, लेकिन कांग्रेस की इस हार को ज्यादा महत्व नहीं दिया जा रहा है। यह स्वाभाविक भी है।
कांग्रेस की यह जीत सचमुच में बड़ी जीत है। आपको बता दें कि कि इन तीन राज्यों में भाजपा का संगठन कांग्रेस की तुलना कई गुना मजबूत है, साथ ही भारतीय जनता पार्टी को सहयोग करने वाले संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्, भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, इसके अलावे भाजपा और आरएसएस के कार्यकत्र्ताओं के द्वारा खड़े किए गए हजारों संगठन भाजपा की जमीन तैयार करने में लगे हुए हैं।
यही नहीं भाजपा ने जमकर पैसे का भी यहां उपयोग किया है। इधर कांग्रेस के पास अब संगठन के नाम पर कुछ भी नहीं बचा हुआ है। जमीन पर कांग्रेस का काम खत्म हो चुका है। सत्ता से बेदखल कांग्रेस पैसे खर्च करने के मामले में भी कमजोर पड़ रही थी, बावजूद इसके कांग्रेस ने भाजपा सत्ता छीन ली। भाजपा की इस हार को हल्के में नहीं लिया जा सकता है।
आखिर क्यों हारी भाजपा
हालांकि मैं इस बार चुनाव के समय कहीं नहीं गया, लेकिन जो पत्रकार मित्र मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान की रिपोर्टिंग में गए थे उनका आकलन था कि इन तीनों हिन्दी राज्यों में भाजपा बुरी तरह हारेगी। जनता का आक्रोश साफ दिख रहा था। ग्रामीण क्षेत्रों के किसान तसल्ली से कांग्रेस शासन आने का इंतजार कर रहे थे। मध्य प्रदेश में तो किसान दो साल से अपना अन्न जमा करके रखे हुए हैं कि कांग्रेस की सरकार आएगी तब वे अन्न बेचेंगे। उन्हें उम्मीद है कि कांग्रेस के शासन में किसानों का कर्ज माफ होगा और फसल की पूरी किमत उनके खाते में जाएगी।
मेरे पास एक दूसरा उदाहरण भी है। जब मैं गुजरात चुनाव के दौरान अहमदाबाद गया था, तो वहां इंदौर के एक कपड़ा व्यापारी मिले थे। वे गुजरात में भाजपा के खिलाफ प्रचार करने आए थे। उनका कहना था कि भारतीय जनता पार्टी ने देश के 8 करोड़ खुदरा व्यापारियों को जबरदस्ती व्यापार करने से रोकने की योजना बना दी है। ये दो उदाहरण ऐसे हैं जो कांग्रेस की ताकत बन गई और भाजपा के संगठन की ताकत उसके सामने कमजोर पड़ गई।
किसान और व्यापारी रहे बड़ा कारण
मेरी व्यक्तिगत राय है कि भाजपा की इस हार के लिए किसानों की नाराजगी के साथ ही साथ व्यापारियों की नाराजगी जिम्मेवार है। जानकारों से मिली जानकारी के अनुसार मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चैहान के प्रति लोगों का गुस्सा नहीं के बाराबर था, लेकिन शिवराज की हार के लिए नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार की नीतियों को जिम्मेवार बताया गया।
सरकार लगातार दावा कर रही है कि उसने किसानों के लिए बहुत कुछ किया। सरकार फसल बीमा लागू करने और समर्थन मूल्य डेढ़ गुणा करने का दावा भी करती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि इससे किसानों को बिल्कुल फायदा नहीं हुआ। उलटा घाटा हो गया। फसल बीमा से बीमा कंपनियों को फायदा हुआ, जबकि डेढ़ गुणा समर्थन मूल्य का फायदा उर्वरक, बीज, कीटनाश बनाने वाली कंपनियां उठा ले गई।
सरकार ने जैसे ही समर्थन मूल्य डेढ़ गुणा बढ़ाने की घोषणा की, दो दिनों के अंदर उर्वरक कंपनियों ने उर्वरक उत्पाद पर डेढ़ गुणा कीमत बढ़ा दी। इसका खामियाजा भी किसान भुगत रहे हैं। ग्रामीण मतदाता इसके कारण भाजपा से दूर चले गए।
शहरी मतदाताओं का मूड
इधर शहरी मतदाता जो भाजपा के आधार मतदाता कहे जाते थे वे नोटबंदी और जीएसटी के कारण भाजपा के प्रति आक्रामक हो गए। जिस समय नोटबंदी की घोषणा हुई थी उस समय, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली के आरएसएस से संबंधित व्यापारियों की मैंने एक रिपोर्ट तैयार की थी। उसमें उन व्यापारियों ने साफ-साफ कहा था कि यह भाजपा और संघ दोनों के लिए घातक साबित होगा। संगठन की सुदृढ़ता के कारण भाजपा उसके बाद कई चुनाव जीत गई, लेकिन अब उसका प्रतिफल दिखने लगा है।
भाजपा सरकार ने एक और गलत काम किया, जो व्यापारियों में डर पैदा कर रहा है। नोटबंदी और जीएसटी के बाद भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सरकार ने खुदरा बाजार में 100 प्रतिशत का पूंजीनिवेश लागू कर दिया। हमारे देश में लगभग 8 करोड़ खुदरा व्यापारी हैं। इन व्यापारियों के यहां कम से तीन से चार लोग नौकरी करते हैं।
इन व्यापारियों और उनके यहां नौकरी करने वालों में यह संदेश गया कि सरकार उनके धंधे को छीनकर विदेशी कॉरपारेट कंपनियों के हवाले करने जा रही है। शहरी मतदाता इस बात से कफी डरे हुए हैं और मोदी सरकार के खिलाफ भी हैं। इसके साथ ही भाजपा और सहयोगी संगठन कई स्थानों पर दंगों के मामले में भी एक्सपोज हो चुके हैं। शहरी मतदाताओं को इस बात का भी डर सता रहा है।
मुद्दे जिन पर पार्टी रही पूरी तरह असफल
इधर नीतिगत मामलों में भी भाजपा ने कमजोर रुख अपनाया। जैसे-धारा 370, राम जन्मभूमि पर मंदिर का निर्माण, समान नागरिक संहिता, बांग्लादेशी घुसपैठ, स्वादेश एवं स्वावलंबन आदि ऐसे मुद्दे हैं जिसपर भाजपा और संघ परिवार का बड़ा ही सकारात्मक रुख रहता था, लेकिन जब भाजपा सत्ता में आई तो इन तमाम मुद्दों से कन्नी काटती रही। कभी भी जमकर इन मुद्दों पर काम नहीं किया। इसका संदेश भाजपा के समर्थकों के बीच गया और यह भाजपा के लिए खतरनाक साबित हुआ।
मसलन रोजगार के मामले में भी भाजपा फिसिड्डी साबित हुई। आर्थिक विकास के मामले में तो सरकार का रिपोर्ट-कार्ड बेहद बुरा है। विदेश नीति के मामले में सरकार का ढुलमुल रवैया विरोधियों को फायदा पहुंचा गया। चीन भारत के पड़ोस में अपनी रणनीत में सफल होता चला गया। यह भी भारत के राष्ट्रवादी सोच वालों के लिए निराशानक साबित हुआ, जिसका खामियाजा अब भाजपा को भुगतना पड़ रहा है।
देश के सरकारी कर्मचारी, रेलवे कर्मचारी, बैंककर्मी और सैन्यकर्मियों को भी भाजपा सरकार ने नाराज कर दिया है। हर कर्मचारी इस बात से डरे हुए हैं कि कब सरकार उनके खिलाफ कोई घोषणा कर दे। सरकारी कर्मचारियों के भविष्यनिधी का पैसा शेयर बाजार में लगाने की बात से भी कर्मचारी खासे नाराज हैं। इसका भी सरकार को इन तीन राज्यों में खामियाजा भुगतना पड़ा है।
सामाजिक ताना-बाना हुआ खंडित
भाजपा की सरकार ने सामाजिक ताने-बाने को भी खंडित किया है। यही कारण है कि इन दो समाज के लोग भाजपा और संघ परिवार के खिलाफ हो गए हैं और संयुक्त रूप से भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
इधर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केन्द्र सरकार ने एससी/एसटी एक्ट संसद में पारित करवा दिया। इसके कारण भाजपा के साथ जुड़े सवर्ण कार्यकर्ता भाजपा के खिलाफ हो गए हैं। भाजपा के एक राष्ट्रीय नेता की मानें तो तीनों प्रदेशों में नोटा में जो वोट गया है वह भाजपा का ही वोट था जो उक्त एक्ट के कारण नाराज थे और नोटा का बटन दबा दिए। यह भी भाजपा के खिलाफ गया।
राष्ट्रीय मुद्दों से हार राज्य हार गई भाजपा
कुल मिलाकर देखें तो इन तीनों राज्यों की हार के लिए स्थानीय मुद्दे कम अपितु राष्ट्रीय मुद्दे ज्याद जिम्मेदार है। हालांकि अब तो सारा ठिकड़ा स्थानीय नेतृत्व पर ही फोड़ा जाएगा। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कुछ हद तक यह सही भी है, लेकिन मध्य प्रदेश में चुनाव के अंतिम दिन तक केन्द्रीय मुद्दे व किसानों का आन्दोलन हावी रहा। इसलिए अगर यह कहा जाए कि इस हार के लिए नरेन्द्र मोदी की नीति जिम्मेदार है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
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