इतिहास के गलियारों में वृंदावन: युगों-युगों से छले जा रहे वृंदावन का संकट आखिर कब खत्म होगा?
ब्रज वृन्दावन में गुजरे लम्बे वक़्त से तमाम विकट समस्याए व्याप्त हैं, जिनका समाधान अबतक नहीं हो पाया। इनमें सर्वप्रमुख श्रीयमुनामैया की दुर्दशा जगजाहिर है, जिसे प्रदूषण मुक्त करने हेतु चलाए गए प्रायः सभी अभियान ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। आजादी के करीब 80 साल बाद भी बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा, गंदगी जैसी आम समस्याओं से जूझ रही है यह ऐतिहासिक - धार्मिक भावभूमि।
ब्रज वृन्दावन में गुजरे लम्बे वक़्त से तमाम विकट समस्याए व्याप्त हैं, जिनका समाधान अबतक नहीं हो पाया। इनमें सर्वप्रमुख श्रीयमुनामैया की दुर्दशा जगजाहिर है, जिसे प्रदूषण मुक्त करने हेतु चलाए गए प्रायः सभी अभियान ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। आजादी के करीब 80 साल बाद भी बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा, गंदगी जैसी आम समस्याओं से जूझ रही है यह ऐतिहासिक - धार्मिक भावभूमि।
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अद्वितीय महत्व धारित श्रीधाम वृन्दावन का मौजूदा मंजर देखकर यह समझ नहीं आता कि युगों-युगों से निरंतर छले जा रहे वृन्दावन का कसूर क्या है? जो सृष्टि के आरम्भ से वर्तमान तक इसके साथ बेहिसाब नाइंसाफी होती रही है। सतयुग से लेकर कलयुग तक शासनतंत्र द्वारा जारी वृन्दावन के शोषण का ये वेदनापूर्ण दौर आखिर कब थमेगा?
पौराणिक प्रमाणानुसार दिव्य वृन्दावन की उपस्थिति सृष्टी पूर्व से ही रही है। सतयुग में समुद्र मंथन के समय जब अमृतकुम्भ निकला था, तो उसे वहां से लेकर दौड़े गरुण भगवान ने सर्वप्रथम वृन्दावन यमुना पुलिन पर कालीदह में दर्शनीय प्राचीन कदम्ब के पेड़ पर विश्राम किया था और पुनः यहीं से हरिद्वार के लिए दौड़े थे।
इस प्रक्रिया के चलते कलश से सबसे पहले अमृत की बूंदे वृन्दावन की पावन धरा पर एवं उसके बाद हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जयनी व नासिक की भूमि पर छलकीं थीं। बस तभी से वृन्दावन के साथ भेदभाव शुरू हो गया। जिसके चलते अन्य चारों धर्मक्षेत्रों में तो कुम्भ महोत्सव आयोजित होते हैं, किन्तु वृन्दावन में मात्र कुम्भ बैठक ही सजती है। इतना ही नहीं इस पवित्रधाम के निकट भगवान श्रीविष्णु के कर्ण मैल से उत्पन्न दैत्य मधु ने मधुपुरी (मथुरा) नामक राज्य बसाया और वृन्दावन को एक सीमित नगर के रूप में उसमें मिलाकर इसकी संप्रभुता ही नष्ट कर दी। इस दैत्य मधु एवं इसके भाई कैटभ का वध देवी चंडी ने किया था।
मधु के बाद त्रेतायुग में उसका पुत्र लवणासुर मथुरा का राजा हुआ, जिसका वध करके रामानुज शत्रुघ्न ने इस क्षेत्र में अपना राज्य स्थापित किया। शत्रुघ्नजी ने मथुरा को तो राजधानी घोषित कर उसकी बदस्तूर बसाबट की, परन्तु वृन्दावन पर कोई ध्यान नहीं दिया।
इसके उपरांत द्वापरयुग में लीलाधारी भगवान श्रीकृष्णचंद्रजी ने वृन्दावन को उसकी पुराणवर्णित छवि प्रदान की। लेकिन वृन्दावन की ये खुशी सिर्फ चंद वर्षों तक ही क़ायम रही, क्योंकि कुछेक दिन में वापसी की कहकर मथुरा और वहाँ से द्वारिका चले गये श्रीकृष्ण फिर कभी नहीं लौटे। बहुत साल बाद कलयुग की शुरुआत में श्रीकृष्णजी के प्रपौत्र बज्रनाभजी ने वृन्दावन आकर अपने पूर्वजों की स्मृतियाँ अवश्य संरक्षित कीं, पर स्थानीय क्षेत्र व जनविकास की ओर उनका ध्यान भी नहीं गया।
इसके बाद तो इस धर्मभूमि ने इतने भयंकर संकटों का सामना किया कि पीड़ित मानवता कराह उठी। कुछ खास शासकों के कार्यकाल को छोड़कर बीते हजारों वर्षों में भारत में सत्तासीन रहे मौर्य, गुप्त, मुग़ल, मराठा, विजयनगर, चोल, दिल्ली सल्तनत एवं ब्रिटिश राज में ब्रजसंस्कृति को हर सम्भव तहसनहस करने की कोशिशें होती रहीं।
अपवाद स्वरूप मुगल सम्राट अकबर के शासन में भक्तिकाल का उदय होने पर जरूर वृन्दावन को उसका गौरव वापस प्राप्त हुआ। पर वृन्दावनीय प्रसन्नता का वह दौर भी ज्यादा लम्बा नहीं चला, क्यों कि अपने पूर्वजों द्वारा किये गये धार्मिक व नगरीय विकास को औरंगजेब ने नष्ट - भ्रष्ट करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। मुग़लसाम्राज्य के आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर के बाद अंग्रेजी राज्य आने पर भी वृन्दावन के मूलभूत ढांचे में कोई विकासपरक बदलाव नहीं हुआ।
वर्ष 1947 में भारत के स्वतंत्र होने पर समूचे देश के साथ - साथ ब्रजक्षेत्र में भी खुशी की लहर दौड़ गई और यहां के लोग विकास हेतु पूरी तरह आस्वस्त हो गये। किन्तु अफसोस, इन करीब 80 वर्षों में वृन्दावन की पुरातन छवि बहाल करने का कोई गंभीर प्रयास राज्य अथवा केंद्र सरकार की ओर से नहीं हुआ।
पिछले कई दशकों में अनेक मर्तबा ब्रजवासियों की ओर से वृन्दावन को मथुरा से अलग करके स्वतंत्र विधानसभा क्षेत्र बनाने की मांग पुरुजोर तरीके से उठती रही है। इसके बाबजूद, उस मांग को पूरा करने की जगह बीते दशक में शासनतंत्र द्वारा सौ साल पुरानी नगर पालिका का अस्तित्व भी समाप्त कर वृन्दावन को मथुरा नगर निगम से जोड़ दिया गया।
इन सबसे ऊपर मौजूदा दौर में वृन्दावन गलियारा व मंदिर न्यास प्रक्रिया चलाकर सरकार ने भोलेभाले ब्रज वृन्दावनवासियों को अपने आराध्य से दूर करते हुए विस्थापन का दंश झेलने पर मजबूर कर दिया है, जो कतई उचित नहीं है। सदियों से अपनी दुर्दशा पर अश्रुधारा प्रवाहित करते हुए अपने पुनः उद्धार की बाट जोह रहा श्रीधाम वृन्दावन आज भी अपने तारनहार का इंतजार कर रहा है।
ब्रज वृन्दावन में गुजरे लम्बे वक़्त से तमाम विकट समस्याए व्याप्त हैं, जिनका समाधान अबतक नहीं हो पाया। इनमें सर्वप्रमुख श्रीयमुनामैया की दुर्दशा जगजाहिर है, जिसे प्रदूषण मुक्त करने हेतु चलाए गए प्रायः सभी अभियान ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। आजादी के करीब 80 साल बाद भी बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा, गंदगी जैसी आम समस्याओं से जूझ रही है यह ऐतिहासिक - धार्मिक भावभूमि।
इसी के साथ लगभग 75 प्रतिशत साक्षरता वाले इस प्राचीनतम क्षेत्र में उच्च शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। नगर में वर्ष 1962-63 ई. में स्थापित आई.ओ.पी. नामक एकमात्र महाविद्यालय के अतिरिक्त दूसरा डिग्री कॉलेज तक नहीं है।
इसके अलावा यहां सैंकड़ों वर्ष पूर्व देश के विभिन्न राजा - महाराजा एवं धनाढ्य वर्गों द्वारा बनवाए हुए हजारों छोटे बड़े मंदिर- मठ, कुंज- निकुंज, हवेली - महल, बाग-बगीचे व कुंड - तालाब इत्यादि स्थापित हैं। किन्तु रखरखाब के आभाव में इनमें से बहुत सी विरासतें खंडहर होती जा रहीं हैं। इनके निर्माता घरानों तथा सरकारों को इन ऐतिहासिक विरासतों को संरक्षित करने के प्रयास करने चाहिए।
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