मोदी सरकार के 100 दिनों के एजेंडा में शामिल है दिवालियापन कानून में सुधार, क्या है इसकी जरूरत?
आईबीसी का मुख्य उद्देश्य कंपनियों और व्यक्तियों के लिए एक कानूनी ढांचा तैयार करना था जो अपने ऋणों का भुगतान नहीं कर सकने और पुनर्प्राप्तियों को अधिकतम कराने के लिए कुशलता से काम करना था।
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दुनिया के कई देशों की तर्ज पर भारत में भी 2016 में भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता कोड (आईबीसी कानून) संसद द्वारा पारित किया गया, जो भारत के उद्योग जगत के सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में एक है। इसके द्वारा यह संभव हो पाया कि यदि उद्यम में वाछिंत सफलता ना मिले तो इससे उद्यम से बाहर जाने के लिए कानूनी मार्ग सुगम हो सकता है।
इसके द्वारा जहां एक ओर ईज ऑफ डूइंग में विभिन्न सुधारों द्वारा देश में पूंजी निवेश (entry) को बढ़ावा दिया जाता है, दूसरी ओर उद्यमों की असफलता में बाहर निकलने के लिए भी कानूनी रास्ता बना दिया गया है। इससे बैंकों को भी कर्ज देने में सहूलियत होती है और लेन-देन की प्रक्रिया भी ठीक से चलती रह सकती है।
जब कोई लोन या बकाया राशि लंबे समय तक अदा नहीं होती, तो कुछ परिस्थितियों में उनका वर्गीकरण एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) में कर दिया जाता है। इन परिस्थितियों में, जब ऋण लेने वाला देयता को पूरा करने में अक्षम होता है तो लेंडर लोन एग्रीमेन्ट को टूटा हुआ मानते हैं और एनपीए लेंडर की बैलेंस शीट पर वित्तीय बोझ बढ़ा देते हैं। इनसे बैंको के शेयर और बैंकों की साख भी गिर जाती है और बैंकिंग प्रणाली में लेन-देन अवरुद्ध हो जाता है।
इस महत्वपूर्ण सुधार के फलस्वरूप भारत की विश्व बैंक की व्यापार करने में सुगमता की रैंकिंग में 77वें से 63वें स्थान पर सुधार हुआ। आईबीसी का मुख्य उद्देश्य कंपनियों और व्यक्तियों के लिए एक कानूनी ढांचा तैयार करना था जो अपने ऋणों का भुगतान नहीं कर सकने और पुनर्प्राप्तियों को अधिकतम कराने के लिए कुशलता से काम करना था।
चुनाव जीतने के बाद मोदी सरकार ने 100 दिनों का एजेंडा जारी किया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के पहले 100 दिनों के लिए विशिष्ट प्राथमिकताएं और लक्ष्य शामिल थे। इन लक्ष्यों में आर्थिक वृद्धि, स्वच्छ उर्जा, सामाजिक कल्याण, और बुनियादी ढांचे का विकास आदि प्राथमिकताओं के अतिरिक्त कुछ कानूनों में सुधारों को भी शामिल किया गया था। इन में आईबीसी को संशोधित करके कॉस-बॉर्डर और सामूहिक दिवालियापन को शामिल करना भी था।
क्या है प्रस्तावित संशोधन
कॉस-बॉर्डर दिवालियापन क्या होता है? जब एक देनदार के पास कई देशों में ऋणदाता और/या संपत्तियां होती हैं, तो दिवालियापन की स्थिति में इसे कॉस-बॉर्डर दिवालियापन कहा जाता है। ऐसे मामलों को कानूनी रूप से निष्पक्ष और कुशलतापूर्वक संभालना महत्वपूर्ण है ताकि विभिन्न देशों की अदालतों में समन्वय हो सके, विरोधाभासी निर्णयों से बचा जा सके और ऋणदाताओं के हितों की रक्षा की जा सके।
वर्तमान में आईबीसी की कुछ धाराएं कॉस बॉर्डर की बात करती हैं। दिवाला कानून समिति (ILC) ने यूएनसीआईटीआरएएल (UNCITRAL) मॉडल कानून को अपनाने की सिफारिश की जो दुनियाभर में अदालतों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने पर आधारित है। यह मॉडल 1997 में स्थापित किया गया था और इसे विश्व बैंक और आईएमएफ द्वारा समर्थन दिया गया है।
मॉडल कानून चार सिद्धांतों पर आधारित है-पहुंच, मान्यता, सहयोग और समन्वय। इस मॉडल कानून को अपनाने से उन कानूनी चुनौतियों को कम किया जा सकता है जो वर्तमान में लोगों के न्याय मिलने में देरी करता है।
सामूहिक दिवालियापन आज के आधुनिक परिप्रेक्ष्य में सामूहिक व्यापार का जमाना है। जब समूह का कोई एक व्यापार दिवालिया हो जाए तो समूह को एकल आर्थिक इकाई (Single Economic Entity) मानने से मदद हो सकती है और ऋणदाता के पैसे तथा मुकदमे आसानी से निपट सकते हैं। परन्तु सामूहिक व्यापार में इसमें कठिनाई आ सकती है क्योंकि अभी आईबीसी में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
चुनौतियां और समाधान-
भारत को इन चुनौतियों को संबोधित करने के लिए एक मजबूत दिवाला कानून की आवश्यकता है। आईबीसी के तहत हाल ही में रिकवरी का ह्रास (गिरावट) एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। CRISIL रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2019 से सितंबर 2023 के बीच रिकवरी रेट 43% से गिरकर 32% हो गयी है। इसके अतिरिक्त, औसत समाधान (settlement) का समय भी 324 से बढ़कर 653 दिन हो गया है, जो आईबीसी के उद्देश्यों के विपरीत है, कि ऐसे मामलों में तीव्रता से समाधान हो।
फरवरी 2024 में स्टेन्डिग कमिटी ऑन फाइनेन्स ने पाया कि दिवाला प्रक्रिया में समाधान निर्धारित समय से बहुत ज्यादा समय तक विलंबित हो रहा है। और वास्तविक रिकवरी भी केवल 25-30% तक हो रही है।
इन देरी के कई कारण हैं-
- मामलों का प्रवेशः राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) के समक्ष मामलों का प्रवेश अक्सर बहुत लंबा समय लेता है। अनावश्यक अपीलें भी देरी का कारण बनती हैं।
- उच्च लंबितता NCLT में 20,000 से अधिक लंबित मामले हैं।
- समर्पित पीठ IBC मामलों के लिए एक समर्पित पीठ होने से प्रक्रिया को निर्धारित समय के भीतर पूरा करने में मदद मिल सकती है।
निष्कर्ष-
आईबीसी में वर्तमान कमियों को दूर करने के लिए कानून में सुधार आवश्यक है, जिसमें कॉस बॉर्डर और सामूहिक दिवालियापन प्रावधान शामिल हैं। इस प्रकार के मामलों में कुल मिलाकर जल्दी फैसले करना ताकि एसेट्स में कम से कम मूल्यह्रास हो और लेनदारों को ऋण की अधिकतम वापसी हो सके।
एडमिशन में तेजी को सुनिश्चत करना, जल्दी और समयबद्ध फैसला होना, अनावश्यक अपीलों को कम करना, अत्यधिक लम्बितता को कम करने के लिए प्रभावशाली कदम उठाना और एक समर्पित आईबीसी पीठ (bench) स्थापित करना, जैसे (Green Tribunal) होते हैं। ये आईबीसी की प्रभावशीलता को बढ़ा सकता है और इसमें निर्धारित उद्देश्यों को जल्दी प्राप्त कर सकते हैं।
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परिचय- धनेन्द्र कुमार-विश्व बैंक में भारत के भूतपूर्व कार्यकारी निदेशक, प्रथम चेयरमैन सीसीआई रहे हैं और वर्तमान चेयरमैन कम्पटीशन एडवाइजरी सर्विसेज हैं। रिसर्च में सहायता वरूण सिंह द्वारा)
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