फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   What are the implications of this hybrid devotion on New Year 2026

नया साल विशेष: ‘न्यू ईयर’ पर इस हाईब्रिड श्रद्धा के क्या निहितार्थ हैं?

Wed, 31 Dec 2025 03:37 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Wed, 31 Dec 2025 03:37 PM IST
सार

नए साल का आगाज भगवान के दर्शन से शुरू करने का यह नया जुनून अब परवान चढ़ता जा रहा है। पहले भी मंदिरों में तीज त्यौहारों पर भीड़ होती थी, लेकिन अब जो रहा है, उसका  कोई तार्किक, धार्मिक और पौराणिक आधार नहीं मिलता।

विज्ञापन
What are the implications of this hybrid devotion on New Year 2026
नए साल की शुभकामनाएं - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

‘न्यू ईयर’ पर इस साल भी खूब जश्न मना, और मनेगा। खाना पीना हुआ, नाच गाना हुआ। नया साल मौज मस्ती से शुरू हो, यह कौन नहीं चाहेगा। लेकिन इस अंतरराष्ट्रीय और प्रकारांतर से ईसाई नववर्ष पर हिंदू मंदिरों में बेतहाशा भीड़ जुटने के क्या निहितार्थ हैं? न तो भारतीय पंचांग और न ही हिंदू देवताओं की दृष्टि से यह कर्मकांड मेल खाता है और न ही एक पुरूषार्थी नस्ल से अपेक्षा के अनुरूप है। 

विज्ञापन


किसी भी शुभ कार्य का आरंभ देव दर्शन से हो, यह भारतीय परंपरा है, लेकिन न्यू ईयर पर धक्के खाकर भी देवताओं के दरबार में हाजिरी लगाने के पीछे कौन सी आस्था है? आजकल ‘न्यू ईयर’ पर भीड़ तो भारत में जन्मे सभी धर्मों के आराधना स्थलों पर होने लगी है, लेकिन हिंदू धार्मिक स्थलों पर तो यह उन्माद रिकॉर्ड तोड़ है।
विज्ञापन


अधिकांश हिंदू इस बात से गदगद हैं कि 1 जनवरी को देश भर के मंदिरों में रिकॉर्ड भीड़ उमड़ी, रिकॉर्ड चढ़ावा चढ़ा, दर्शनार्थियों की किलोमीटरों लंबी लाइनें लगीं, रिकॉर्ड रेलमपेल हुई, व्यवस्था के तटबंध टूटे। गोया साल के पहले दिन कृपा बरसी तो पूरा साल झकाझक।
विज्ञापन
विज्ञापन


नए साल का आगाज भगवान के दर्शन से शुरू करने का यह नया जुनून अब परवान चढ़ता जा रहा है। पहले भी मंदिरों में तीज त्यौहारों पर भीड़ होती थी, लेकिन अब जो रहा है, उसका  कोई तार्किक, धार्मिक और पौराणिक आधार नहीं मिलता। क्या यह नया हाइब्रिड हिंदू धर्म है, जिसमें अपनी सुविधा और स्वार्थानुसार सब एडजस्ट कर लिया जाता है? या यह नए साल के जश्न में धार्मिक तड़का लगाने का शौक है?

क्या इसे विश्व भर में मान्य नव वर्ष की शुरूआत आध्यात्मिक भाव से करने का सात्विक आग्रह मानें अथवा एक आयातित पंचांग के साथ हिंदू देवी-देवताओं की कृपा संगति बिठाने का आग्रह  है? इसे हम हिंदू मन की अति उदारता मानें या फिर नए किस्म की तर्कहीन श्रद्धा?

एक खास घड़ी में देव दर्शन कर स्वयं को धन्य मानने वाले खुद से भी सवाल करें कि जिस धर्म में वर्षारंभ मोटे तौर पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अथवा वैशाख माह से माना जाता हो, उस धर्म के पूज्य देवता देसी पंचाग को दरकिनार कर 1 जनवरी पर सुख-समृद्धि का वरदान कैसे और क्योंकर देंगे? अगर यही मान्यता और आस्था अडिग है तो हमे भारतीय कैलेंडरों का वर्षारंभ भी दुरूस्त कर लेना चाहिए, जोकि वैदिक काल से चला आ रहा है और उसमें भी समय-समय पर सुधार होते रहे हैं। 

भारतीयों और खासकर हिंदुओं का ह्रदय विशाल है, यह अच्छी बात है, लेकिन आस्था के प्रकटीकरण  में कोई तार्किक संगति भी तो हो। दुनिया भर में 1 जनवरी से प्रारंभ होने वाला वार्षिक कैलेंडर ग्रिगोरियन कैलेंडर है, जिसे ग्रेगरी पोप तेरहवें ने 1582 में प्रचलित किया। यह कैलेंडर भी यूरोप में पूर्व में प्रचलित जूलियन कैलेंडर का संशोधित रूप था। इस कैलेंडर में साल के पहले जनवरी माह का नामकरण रोमन देवता जेनुस के नाम पर किया गया है,  जिसे आरंभ और संक्रांति का देवता माना जाता था।

ईसाइयों ने भी उसे अपना लिया। यह बात अलग है कि ग्रेगोरी पोप ने कैलेंडर में जो सुधार सोलहवीं सदी में किए वह भारतीय ज्योति:शास्त्र के सूर्यसिद्धांत में करीब एक हजार पहले काफी कुछ किए जा चुके थे। उसी ग्रिगोरियन कैलेंडर को अंग्रेज को भारत में लाए और तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी ने 14 सितंबर 1752 को अपने प्रभाव क्षेत्र और कामकाज में लागू किया। अब यही अंतरराष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में मान्य है।

दुनिया के सभी व्यवहार इसी के अनुसार होते हैं। हालांकि भारत में पहले से प्रचलित हिंदू और इस्लामिक कैलेंडर भी चलन में रहे। आजादी के बाद भारत में 1957 में देशी पंचांग के रूप में शक संवत को मान्यता दी गई। फिर भी नव वर्षारंभ पर देव दर्शन के जुनून का कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता। भारत में मान्य शक संवत और विक्रम संवत दोनो ही चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा) से प्रारंभ होते हैं।

माना जाता है कि ब्रह्माजी ने इसी दिन सृष्टि की रचना की। इस वर्षारंभ को आंध्र, कर्नाटक में उगादि भी कहते हैं। कोशिश यही है कि गुड़ी पड़वा को ही एकमत से हिंदू नववर्षारंभ मान लिया जाए। लेकिन सभी हिंदुअोंका नववर्ष गुडी पड़वा से शुरू नहीं होता। गुजरातियों, बंगालियों, तमिलों, कश्मीरी पंडितों के अपने नववर्षारंभ हैं। 

लेकिन इनमें से किसी का वास्ता 1 जनवरी से नहीं है। यहां बुनियादी सवाल यह है 1 जनवरी को हिंदू देवी-देवताओं से आशीर्वाद मांगने और इसके लिए तीर्थ स्थानों पर बेलगाम भीड़ बढ़ाने का औचित्य क्या है? खुशी की बात इतनी है कि लाखों की तादाद में श्रद्धालुओं के पहुंचने से पर्यटन फल-फूल रहा है और स्थानीय लोगों की कमाई बढ़ गई है।

लेकिन इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं है कि अगर हिंदू देवी-देवता एक जनवरी को भी भक्तों पर कृपा बरसा सकते हैं तो इस्लामिक हिजरी कैलेंडर के मोहर्रम की पहली तारीख पर अथवा चीनी चांद्र नव वर्षारांभ पर ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

सम्बन्धित धर्मों के लोग भी उसी श्रद्धा के साथ उस दिन पूरा साल सुख समृद्धि से बीतने की कामना करते हैं। जबकि ऐसा कभी नहीं सुना गया कि किसी गैर हिंदूधर्मीय ने गुडी पडवा पर चर्च या मस्जिद में जाकर ईश्वर से कृपा बरसाने की याचना की हो।

संकीर्ण धार्मिक सोच से परे यह विचारें कि ईश्वर अगर धर्म के आधार पर बंटा है तो फिर उसे अपने ही धर्म के अनुयायियों के त्यौहारों अथवा शुभ दिवसों पर कृपावंत होना चाहिए। लेकिन यदि ईश्वर सभी जगह एक है, और धर्म तथा संस्कृति निरपेक्ष है तो उसे किसी भी तिथि पर भक्तों पर समान रूप से कृपा बरसानी चाहिए फिर चाहे न्यू ईयर हो, चैत्र प्रतिपदा हो अथवा पहली मुहर्रम हो (इस्लामिक नव वर्ष का आरंभ)। क्या दुनिया में केवल हिंदू देवी-देवता ही इतने उदार है कि वो किसी भी धर्म के नव वर्ष को अपना मान लेने में संकोच नहीं करते? 

दूसरी बात ईश्वर की काल अवधारणा में वर्षों तिथियों और युगों का कोई अर्थ नहीं है। ईश्वर को सृष्टि का संचालक मान लें तो भी कालानुक्रम के लिए कैलेंडरों और पंचांगों का निर्माण मनुष्य ने अपने खगोलीय अवलोकनों और प्राकृतिक घटनाचक्र और कार्मिक सुविधा के हिसाब से किया है न कि किसी देवता ने। हालांकि भारतीय सूर्यसिद्धांत के बारे में कहा जाता है कि उसे स्वयं सूर्यभगवान ने मयासुर को बताया था। लेकिन बाकी पंचाग मनुष्य की रचनाएं हैं।

ऐसे में भगवान किसी तिथि विशेष पर ही इतने कृपावंत क्यों होंगे कि जिसके लिए मंदिरों में श्रद्धालुओं का सैलाब आ जाए और लोग पहली तारीख को मिलने वाली तनख्वाह से भी ज्यादा न्यू ईयर को महत्वपूर्ण धार्मिक और आध्यात्मिक दिवस मानने लगें?


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed