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पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव हिंसा: राजनीतिक अतीत और सत्ता तक पहुंचती राहें

Prabhakar Mani Tewari प्रभाकर मणि तिवारी
Updated Sat, 17 Jun 2023 12:29 PM IST
सार

केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2018 के पंचायत चुनाव के दौरान 23 राजनीतिक हत्याएं हुई थी। एनसीआरबी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि वर्ष 2010 से 2019 के बीच राज्य में 161 राजनीतिक हत्याएं हुई और बंगाल इस मामले में देशभर में पहले स्थान पर रहा।

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West bengal panchayat polls 2023 violence and political issues
West Bengal Panchayat Election - फोटो : Social Media

विस्तार

पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के ऐलान के साथ ही शुरू हुई हिंसा और इस मुद्दे पर सियासत लगातार तेज हो रही है। सरकारी आंकड़ों के दौरान नामांकन-पत्र दाखिल करने के दौरान राज्य के अलग-अलग इलाको में हुई हिंसा में कम से कम तीन लोगों की मौत हो चुकी है और कई दर्जन लोग घायल हो गए हैं।

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लगातार तेज होती हिंसा को ध्यान में रखते हुए भाजपा और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों की याचिका पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने संवेदनशील इलाको में केंद्रीय बलों की तैनाती का निर्देश दिया है। लेकिन राज्य सरकार और चुनाव आयोग इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का मन बना रहा है।

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कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी कहते हैं-

राज्य पुलिस की मौजूदगी में  हिंसा मुक्त और निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं। वर्ष 2018 के पंचायत चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने करीब 34 फीसदी सीटें निर्विरोध जीत ली थीं, तब विपक्ष ने आरोप लगाया था कि उसके उम्मीदवारों को नामांकन ही दाखिल नहीं करने दिया गया। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस साल भी वही इतिहास दोहराने की कोशिश की जा रही है। शायद यही वजह है कि चुनाव आयोग ने इस बार नामांकन वापस लेने वालों के लिए इसकी समुचित और ठोस वजह बताना अनिवार्य कर दिया है।

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दूसरी ओर, नामांकन के दौरान होने वाली हिंसा का स्वतः संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक टीम भी जल्दी ही संवेदनशील इलाकों का दौरा करेगी।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह चुनाव तमाम दलों के लिए अपनी ताकत के आकलन का पैमाना तो है ही, राज्य में हजारों करोड़ की विकास योजनाएं पंचायतों के जरिए ही लागू की जाती हैं। ऐसे में तमाम दलों और नेताओं के लिए पंचायतें दुधारू गाय बन गई हैं। यही हिंसा की सबसे बड़ी वजह है और कोई भी पार्टी इसमें पीछे नहीं है।


इससे पहले वर्ष 2018 के पंचायत चुनाव के दौरान बी बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। उसके अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव और वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव भी काफी हिंसक रहे थे। खासकर विधानसभा चुनाव के बाद बड़े पैमाने पर होने वाली हिंसा और कथित राजनीतिक हत्याओं ने तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थी।


हिंसा के आंकड़े और राजनीति 

केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2018 के पंचायत चुनाव के दौरान 23 राजनीतिक हत्याएं हुई थी। एनसीआरबी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि वर्ष 2010 से 2019 के बीच राज्य में 161 राजनीतिक हत्याएं हुई और बंगाल इस मामले में देशभर में पहले स्थान पर रहा।
 

इससे यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर पंचायत चुनाव के दौरान बंगाल में हिंसा क्यों होती है? दरअसल, आंकड़े गवाह हैं कि बंगाल में सत्ता की राह ग्रामीण इलाकों से ही निकलती है। यही वजह है कि देश के कई राज्यों के विधानसभा चुनावों के मुकाबले पश्चिम बंगाल में होने वाले पंचायत चुनावों को ज्यादा सुर्खियां और अहमियत मिलती रही हैं। बंगाल में ग्रामीण इलाके शुरू से ही सत्ता की चाभीहे हैं।


वाममोर्चा ने भूमि सुधारों और पंचायत व्यवस्था की सहायता से सत्ता के विकेंद्रीकरण के जरिए ग्रामीण इलाकों में अपनी जो पकड़ बनाई थी उसी ने उसे यहां कोई 34 साल तक सत्ता में बनाए रखा था। वर्ष 2008 के पंचायत चुनावों में ग्रामीण इलाकों में पैरों तले की जमीन खिसकते ही वर्ष 2011 में यहां वाममोर्चा का लाल किला ढह गया था। तृणमूल कांग्रेस ने उन चुनावों में तमाम राजनीतिक पंडितों के आकलन को गलत साबित करते हुए बेहतरीन प्रदर्शन किया था।


राजनीतिक पर्यवेक्षक बताते हैं-

वर्ष 1971 में सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद तो राजनीतिक हत्याओं का जो दौर शुरू हुआ उसने पहले की तमाम हिंसा को पीछे छोड़ दिया। वर्ष 1977 के विधानसभा चुनावों में यह उसके पतन की भी वजह बनी। सत्तर के दशक में भी वोटरों को आतंकित कर अपने पाले में करने और सीपीएम की पकड़ मजबूत करने के लिए बंगाल में हिंसा होती रही है। उनके मुताबिक, वर्ष 1998 में ममता बनर्जी की ओर से टीएमसी के गठन के बाद वर्चस्व की लड़ाई ने हिंसा का नया दौर शुरू किया। उसी साल हुए पंचायत चुनावों के दौरान कई इलाकों में भारी हिंसा हुई।

 


राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर समीरन पाल कहते हैं-

“अगले साल लोकसभा चुनावों से पहले आखिरी चुनाव होने की वजह से तमाम दलों के लिए यह पंचायत चुनाव ग्रामीण इलाकों में उनको अपनी ताकत आंकने का पैमाना साबित होंगे। इन नतीजों का असर अगले साल के अहम लोकसभा चुनाव पर होना तय है। यही वजह है कि चुनाव की तारीख का एलान होते ही तमाम दलों के योद्धा कमर कस कर मैदान में कूद पड़े हैं। ऐसे में चुनाव करीब आने के साथ हिंसा और तेज होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।”

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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