पश्चिम बंगालः ममता बनर्जी के सामने असमंजस में भाजपा, स्थानीय निकाय चुनाव के लिए नहीं मिल रहे मुद्दे
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दिल्ली चुनाव के नतीजों ने पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होने का सपना देख रही बंगाल भाजपा को असमंजस में डाल दिया है। उनको यह समझ में नहीं आ रहा है कि दीदी यानी ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस के साथ किन मुद्दों पर लड़ा जाए। इस मुद्दे पर पार्टी में मतभेद भी गहराने लगे हैं।
एक गुट जहां रणनीति में बदलाव के पक्ष में है, वहीं प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के नेतृत्व वाला दूसरा गुट इसके खिलाफ है। इस गुट की दलील है कि अब रणनीति में किसी बदलाव से पार्टी के कार्यकर्ताओं व समर्थकों में गलत संदेश जाएगा।
रणनीति के सवाल पर मंथन के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कोलकाता के दौरे पर आ रहे हैं। समझा जा रहा है कि वही पार्टी के प्रदेश नेतृत्व को इस दुविधा से निकालेंगे। वैसे, केंद्रीय नेतृत्व ने बंगाल के नेताओं को स्थानीय मुद्दे तलाशने का निर्देश दिया है ताकि अप्रैल-मई में होने वाले स्थानीय निकायों के चुनावो में इन मुद्दो पर सरकार को घेरा जा सके।
अगले साल के विधानसभा चुनावों से पहले इस साल अप्रैल-मई में कोलकाता नगर निगम समेत सौ से ज्यादा स्थानीय निकायों के चुनाव होने हैं। इनमें से खासकर कोलकाता नगर निगम को मिनी विधानसभा चुनाव कहा जाता है।
भाजपा नेतृत्व ने बंगाल को अपनी नाक और साख का सवाल बनाते हुए यहां अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। पार्टी में विधानसभा चुनाव की रणनीति पर भी मतभेद पैदा हो गए हैं। उसके सामने दुविधा यह है कि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) पर पार्टी की आक्रामक रणनीति को आगे बढ़ाया जाए या कोई वैकल्पिक मुद्दा तलाशा जाए।
भाजपा के राज्यसभा सदस्य स्वप्न दासगुप्ता ने कहा है कि विधानसभा चुनाव में मुख्यामंत्री के नाम की घोषणा पहले होने चाहिए वहीं पश्चिमी बंगाल भाजपा अध्यक्ष का कहना है कि चुनाव के बाद ही इसका एलान किया जाना चाहिए।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रचार में हम केवल सीएए और एनआरसी के मुद्दे के भरोसे नहीं रहेंगे। अगर सरकार में आना है तो हमें विकल्प के तौर पर दूसरे मुद्दों को भी साथ लेकर चलना होगा। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं कि तृणमूल कार्यकर्ताओं को दिल्ली में भाजपा की हार को लेकर उत्साहित होने की जरूरत नहीं है। इसकी वजह यह है कि दिल्ली चुनावों के नतीजों का बंगाल पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बंगाल के लोगों ने राज्य में सत्ता परिवर्तन का मन बना लिया है औऱ लोगों का भरोसा भाजपा पर ही है।
दूसरी ओर, ममता बनर्जी औऱ उनकी सरकार के काट के लिए भाजपा अब उनके हथियार को ही अपनाने का फैसला किया है। इसके तहत हेल्पलाइन के तौर पर जल्दी ही कुछ टोल-फ्री नंबर जारी करेगी जहां लोग सरकार के खिलाफ अपनी शिकायतें दर्ज करा सकेंगे। ध्यान रहे कि बीते साल शुरू हुआ दीदी के बोलो कार्यक्रम काफी हिट साबित हुआ है और इससे मुख्यमंत्री और सरकार की छवि सुधारने में काफी सहायता मिली है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं कि राज्य के किसी भी कोने से लोग इन नंबरों पर शिकायत दर्ज करा सकते हैं या फिर सुझाव दे सकते हैं।
पार्टी का एक गुट ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ रणनीति बदलने की वकालत कर रहा है। एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि दिल्ली के नतीजों से सबक लेकर बंगाल में पार्टी की रणनीति में बदलाव जरूरी है। यहां सीएएऔर एनआरसी जैसे राष्ट्रीय मुद्दों की बजाय हमें सरकार के कुशासन, भ्रष्टाचार औऱ वैकल्पिक नीतियों पर ज्यादा जोर देना होगा। लेकिन दिलीप घोष की दलील है कि ऐसे किसी बदलाव से कार्यतकर्ताओं और समर्थकों में गलत संदेश जाने का अंदेशा है।
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