Independence Day: राजस्थान के आलूदा गांव के बुनकरों ने बनाया था स्वतंत्र भारत का पहला खादी का तिरंगा
स्वतंत्र भारत का पहला खादी का कपड़ा जिस आलूदा गांव में तैयार हुआ, वहां कभी 200 से अधिक परिवार हाथ से खादी तैयार किया करते थे। आज गांव में सिर्फ एक या दो खादी बुनने की हाथ की मशीनें बची हैं।
विस्तार
15 अगस्त 1947 को दिल्ली में लालकिले की प्राचीर पर प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने शान के साथ राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया था। उस तिरंगे झंडे के खादी का कपड़ा राजस्थान के दौसा जिले के गांव आलूदा में बुनकर चौथमल, शंभुदयाल, नानगराम और रेवड़मल ने तैयार किया था। आलूदा गांव से टाट साहब और देशपांडे खादी के इस कपड़े को गोविंदगढ़ ले गए थे, जहां स्वतंत्रता सेनानी हीरालाल शास्त्री, माणिक्य लाल वर्मा आदि ने इसे राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का स्वरूप दिया।
आज ये बुनकर तो जीवित नहीं हैं, लेकिन उनकी हाथ से खादी बुनने की परंपरा को आलूदा गांव के कुछ बुनकरों ने जीवित रखा हुआ है। हालांकि, समय के साथ खादी की डिमांड कम होने के बाद आलूदा गांव से बड़ी संख्या में बुनकरों ने अपने पारंपरिक काम को छोड़ा है।
आलूदा गांव में तैयार हुआ था पहला ध्वज
स्वतंत्र भारत का पहला खादी का कपड़ा जिस आलूदा गांव में तैयार हुआ, वहां कभी 200 से अधिक परिवार हाथ से खादी तैयार किया करते थे। आज गांव में सिर्फ एक या दो खादी बुनने की हाथ की मशीनें बची हैं। अधिकांश परिवार यहां से विस्थापित होकर दिल्ली और दूसरे शहरों में जा बस गए हैं। आधा दर्जन से कम परिवार ही खादी के सहारे अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं। ज्यादातर बुनकारों ने मूल काम छोड़कर दूसरे काम-धंधे अपना लिए हैं।
आलूदा गांव में भले आज खादी का कपड़ा उस स्तर पर तैयार नहीं हो रहा हो, लेकिन दौसा जिले ने खादी को बड़े स्तर पर अपनी पहचान कायम की है। आलूदा से प्रभावित होकर वर्ष 1967 में दौसा खादी समिति अस्तित्व में आई। तिरंगे झंडे के लिए खादी के कपड़े का निर्माण आज समिति कर रही है।
दौसा खादी की पहचान केवल देश में नहीं, बल्कि विदेशों में भी है। दौसा खादी समिति से आसपास के गांव के सैकड़ों परिवार जुड़े हुए हैं और हाथ की खादी को तैयार रहे हैं।
राष्ट्रीय ध्वज को लेकर नियम
एक समय था, जब राष्ट्रीय ध्वज को लेकर देश में बेहद सख्त नियम हुआ करते थे। केवल खादी से बना राष्ट्रीय ध्वज को फहराने की अनुमति थी। केवल कुछ विशिष्ट अवसरों पर राष्ट्रीय ध्वज को फहराया जा सकता था, लेकिन देश के प्रसिद्ध जिंदल ग्रुप के मालिक नवीन जिंदल ने इन नियमों लेकर एक दशक तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी, जिसके बाद भारतीय ध्वज संहिता में परिवर्तन किया गया।
23 जनवरी 2004 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय दिया, जिसमें कहा गया कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के भीतर गरिमा और सम्मान के साथ राष्ट्रीय ध्वज को स्वतंत्र रूप से फहराने का मौलिक अधिकार है। नए नियमों के बाद कपास, ऊन, रेशम, खादी के अलावा हाथ से काते-बुने हुए और मशीन से बने झंडे के लिए पॉलिस्टर के उपयोग की अनुमति दे दी गई।
पहले केवल सूर्योदय के बाद तिरंगे को फहराया जाता था, लेकिन अब 24 घंटे खुले में घर, इमारत या सार्वजनिक स्थान पर दिन-रात राष्ट्रीय ध्वज को प्रदर्शित किया जा सकता है। हालांकि, आज भी राष्ट्रीय ध्वज का आकार 3:2 होना अनिवार्य है।
वर्ष 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ पर हर घर तिरंगा अभियान की अपील की थी, जिसके बाद देशभर में लोगों ने अपने घरों, ऑफिस आदि पर शान से राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया था। ऐसी ही अपील इस साल भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की है।
देशभर में न केवल तिरंगा यात्राएं निकाली जा रही हैं, बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को 24 घंटे से शान से फहराया जाता है। वैसे, जब भी तिरंगे को शान से फहराया जाएगा तो दौसा के आलूदा गांव के चार बुनकरों को देश जरूर याद करेगा, जिनकी मेहनत से स्वतंत्र भारत का पहला खादी का तिरंगा झंडा लालकिले पर फहराया गया।
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