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यादों में दिलीप कुमार: अब शाद हूं मैं, आज़ाद हूं मैं, कुछ काम नहीं है आहों से..

Wed, 07 Jul 2021 10:52 AM IST
Sarang Upadhyay सारंग उपाध्याय
Updated Wed, 07 Jul 2021 10:52 AM IST
सार

दिलीप साहब के अभिनय की जीवन रेखा पीढ़ियों की स्मृतियों में किस्सों के रूप में दर्ज है। फिल्मों के अनगिनत रंग हर आंखों का दृश्य है। हर दृश्य एक धड़कन है और हर धड़कन में एक देवदास है, देवेंदर है, राम-श्याम है, शहजादा सलीम है और कोई शमशेर सिंह है तो कोई सांगा है। 

दरअसल, हर एक के हिस्से के दिलीप कुमार अलग हैं और फिल्मों के हर छोटे से हिस्से में एक कतरा दिलीप कुमार है।

दिलीप साहब एक नये सफर पर हैं। भारतीय सिनेमा पर दशकों तक छाया रहा यह अभिनेता इस फना जमाने में भरपूर जिंदगी जीकर विदा हो गया।

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veteran actor dilip kumar passed away memories and life
100 साल पुराना यह भारतीय सिनेमा दिलीप साहब की पुण्याई के भरोसे बहुत कुछ करता रहेगा। - फोटो : social media

विस्तार

दिलीप साहब नहीं रहे। इस बार उनकी मृत्यु की खबर अफवाह नहीं है। वे चले गए। अब सोशल मीडिया पर उनके ना रहने की कोई तैरती लाइनें नहीं हैं, जिन्हें गूगल पर खोजना होगा या फिर फोन पर पुख्ता करना होगा या रिमोट का गला दबाकर आनन-फानन में उस न्यूज फ्लैश को तलाशना होगा, जिसमें हम अफवाह को सच और सच को अफवाह मानने के बीच थे। 

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यकीनन, आज उनकी मृत्यु को अफवाह बनाने वालों के हिस्से एक सच हाथ आया होगा। वैसा ही सच, जैसी अफवाहें हमारे हाथ आती थीं। दरअसल, मृत्यु की अफवाह जीवित होने का सच होती है। दिलीप साहब की मृत्यु जब-जब अफवाह बनी, तब-तब उनकी जीवन बेल चढ़ती चली गई, और आज जब उनकी मृत्यु सच है तो वे चारो ओर और ज्यादा जीवित हुए जाते हैं। हर रंग में और अनगिनत ढंग में। 

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कमाल हैं दिलीप साहब, उन्होंने "जिंदा बचे हैं" के इस अचीवमेंट वाले बेशकीमती दौर में खामोशी से मौत का हाथ थाम लिया। इतना भरपूर जिए की मृत्यु आकस्मिक से कहीं ज्यादा सहज हो उठी. उनका नहीं होना उनका सबसे ज्यादा हो उठा, उनकी मृत्यु, उनके पूरे जीवन को उनकी ही चमक से हमेशा-हमेशा के लिए रौशन कर गई।  

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दिलीप साहब ने हमें तब अलविदा किया जब मृत्यु से ज्यादा जिंदगी अफवाह बन गई है, और देखिए ना उनकी विदा में भी जीवंतता है। एक विराम के बीच, दिलीप साहब को उतना तो याद किया ही जा सकता है जितना उससे ज्यादा याद किया जाता। दिलीप साहब आज जिंदगी के पर्दे पर कहीं नहीं हैं। "नहीं होना" अफवाहों पर लगाम नहीं विराम होता है। 


7 जुलाई 2021 यह दिलीप साहब के निधन की तिथि बन गई है। पुण्यतिथि। 100 साल पुराना यह भारतीय सिनेमा दिलीप साहब की पुण्याई के भरोसे बहुत कुछ करता रहेगा। उनकी स्मृतियों से जीवन उष्मा ग्रहण करता रहेगा, हरा-भरा रहेगा और कई दिलीप कुमार रचता रहेगा।   

दिलीप साहब के अभिनय की जीवन रेखा पीढ़ियों की स्मृतियों में किस्सों के रूप में दर्ज है। फिल्मों के अनगिनत रंग हर आंखों का दृश्य है। हर दृश्य एक धड़कन है और हर धड़कन में एक देवदास है, देवेंदर है, राम-श्याम है, शहजादा सलीम है, कोई शमशेर सिंह है तो कोई सांगा है। 


दरअसल, हर एक के हिस्से के दिलीप कुमार अलग हैं और फिल्मों के हर छोटे से हिस्से में एक कतरा दिलीप कुमार है।

दिलीप साहब एक नये सफर पर हैं। भारतीय सिनेमा पर दशकों तक छाया रहा यह अभिनेता इस फना जमाने में वे भरपूर जिंदगी जीकर विदा हो गया।

आदमी फिल्म के उन पर फिल्माए गए मेरे एक पसंदीदा गीत से उन्हें अलविदा, जिसे शकील बदायुनी ने लिखा और नौशाद साहेब अपने संगीतबद्ध से उसे दिलीप साहब की तरह ही अमर कर दिया।

आज पुरानी राहों से, कोई मुझे आवाज़ न दे
दर्द में डूबे गीत न दे, गम का सिसकता साज़ न दे

बीते दिनों की याद थी जिनमें, मैं वो तराने भूल चुका
आज नई मंज़िल है मेरी, कल के ठिकाने भूल चुका
न वो दिल न सनम, न वो दीन-धरम
अब दूर हूं सारे गुनाहों से

जीवन बदला दुनिया बदली, मन को अनोखा ज्ञान मिला
आज मुझे अपने ही दिल में, एक नया इनसान मिला
पहुंचा हूं वहां, नहीं दूर जहां, भगवान की नेक निगाहों से

टूट चुके सब प्यार के बंधन, आज कोई ज़ंजीर नहीं
शीशा-ए-दिल में अरमानों की, आज कोई तस्वीर नहीं
अब शाद हूं मैं, आज़ाद हूं मैं, कुछ काम नहीं है आहों से..!

अलविदा दिलीप साहब 


 

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