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गैरसैंण: राजधानी के नाम पर कब तक रस्म अदायगी?

Thu, 29 Oct 2026 11:58 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Thu, 29 Oct 2026 11:58 AM IST
सार

भराड़ीसैंण में विधानसभा सत्र आयोजित करने के लिए मुख्यमंत्री, मंत्रियों, विधायकों, अधिकारियों, कर्मचारियों और सुरक्षा बलों की आवाजाही होती है। सरकारी वाहनों, आवास, भोजन, सुरक्षा, संचार, बिजली, पानी तथा अन्य व्यवस्थाओं पर सार्वजनिक धन खर्च होता है।

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uttarakhand Gairsain: How long will the formalities regarding the capital continue
गैरसैंण विधानसभा सत्र - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण के भराड़ीसैंण में 27 और 28 अक्टूबर को आयोजित विधानसभा सत्र ने एक बार फिर राज्य की राजधानी के सवाल को गंभीर बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। दो दिनों के लिए आयोजित विधानसभा की वास्तविक कार्यवाही मात्र आठ घंटे चार मिनट चली।

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पहले दिन छह घंटे 58 मिनट और दूसरे दिन केवल एक घंटा छह मिनट। इस बीच 7,844.18 करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट और 9 विधेयक पारित हो गए, लेकिन जनता की समस्याओं पर अपेक्षित गंभीर चर्चा नहीं हो सकी। दूसरे दिन प्रश्नकाल भी विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़ गया। सवाल केवल इतने कम समय तक विधानसभा चलने का नहीं है।
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बड़ा सवाल यह है कि जिस स्थान को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया है, वहां सरकार और विधायिका की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने के बजाय कुछ घंटों की संसदीय गतिविधियों को राजधानी की सार्थकता का प्रमाण क्यों माना जाए?
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भराड़ीसैंण में विधानसभा सत्र आयोजित करने के लिए मुख्यमंत्री, मंत्रियों, विधायकों, अधिकारियों, कर्मचारियों और सुरक्षा बलों की आवाजाही होती है। सरकारी वाहनों, आवास, भोजन, सुरक्षा, संचार, बिजली, पानी तथा अन्य व्यवस्थाओं पर सार्वजनिक धन खर्च होता है। इस सत्र पर कुल कितनी धनराशि खर्च हुई, इसका प्रमाणित और मदवार विवरण सार्वजनिक होना चाहिए।

बिना अधिकृत लेखे के करोड़ों रुपये का कोई निश्चित आंकड़ा बताना उचित नहीं होगा। लेकिन खर्च की वास्तविक राशि चाहे जितनी हो, उसकी उपयोगिता का मूल्यांकन आवश्यक है। लोकतंत्र में सार्वजनिक व्यय का औचित्य केवल संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करने से नहीं, बल्कि जनता को मिलने वाले परिणामों से भी निर्धारित होता है।

गैरसैंण या भराड़ीसैण  कोई सामान्य कस्बा नहीं है, जहां कभी-कभार विधानसभा की बैठक आयोजित कर देने से राजनीतिक दायित्व पूरा मान लिया जाए। यह उत्तराखंड राज्य आंदोलन की उस अवधारणा का प्रतीक है, जिसमें अलग राज्य का अर्थ केवल उत्तर प्रदेश से प्रशासनिक विभाजन नहीं, बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप शासन व्यवस्था स्थापित करना था। आंदोलनकारियों की कल्पना में राजधानी केवल सत्ता के प्रतिष्ठानों का समूह नहीं, बल्कि शासन को पहाड़ के निकट लाने का माध्यम थी।

उत्तराखंड के गठन से पहले ही गैरसैंण राजधानी के विकल्प के रूप में उभर चुका था। राज्य आंदोलन के दौरान गढ़वाल और कुमाऊं के बीच इसकी भौगोलिक स्थिति को विशेष महत्व दिया गया। वर्ष 2000 में राज्य बनने पर देहरादून को अंतरिम राजधानी बनाया गया। इसके पीछे तत्काल उपलब्ध प्रशासनिक सुविधाओं और संपर्क व्यवस्था का तर्क था।

बाद में स्थायी राजधानी के प्रश्न पर आयोगों और समितियों के माध्यम से विचार हुआ, लेकिन राजनीतिक सहमति नहीं बन सकी। वर्ष 2020 में गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया। इसके बावजूद शासन का वास्तविक केंद्र देहरादून ही बना हुआ है।

राजधानी के सवाल पर उत्तराखंड की राजनीति में एक विचित्र विरोधाभास दिखाई देता है। विभिन्न राजनीतिक दल गैरसैंण के महत्व को स्वीकार करते रहे हैं, लेकिन उसे प्रशासनिक रूप से सक्षम राजधानी बनाने की दिशा में अपेक्षित निरंतरता नहीं दिखाई देती। सत्ता में रहते हुए एक प्रकार की व्यावहारिक कठिनाइयां सामने आती हैं और विपक्ष में रहते हुए वही प्रश्न जनभावनाओं से जुड़ जाता है।

इसलिए राजधानी के मुद्दे को किसी एक सरकार या दल के कार्यकाल तक सीमित करना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। यह राज्य गठन के बाद से चली आ रही राजनीतिक अनिर्णय की समस्या है।

सरकार का तर्क है कि एक वर्ष में गैरसैंण में दो विधानसभा सत्र आयोजित करना ग्रीष्मकालीन राजधानी की भूमिका को मजबूत करने की दिशा में उपलब्धि है। सरकारी सूचना विभाग ने भी इसे विशेष उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया है। लेकिन सत्रों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण उनकी अवधि, कार्यवाही की गुणवत्ता और शासन की वास्तविक उपस्थिति है। यदि दो सत्रों में भी सरकार और प्रशासन कुछ दिनों से अधिक वहां नहीं रहते, तो इससे ग्रीष्मकालीन राजधानी की अवधारणा कितनी साकार होती है?

ग्रीष्मकालीन राजधानी का सामान्य अर्थ  है कि वर्ष के निर्धारित ग्रीष्मकालीन महीनों में शासन का प्रमुख कामकाज वहां से संचालित हो। मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल, सचिवालय और महत्वपूर्ण विभागों की प्रशासनिक उपस्थिति हो। जनता अपनी समस्याएं लेकर वहां पहुंच सके। नीतिगत निर्णय हों और अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित हो। यदि वर्षभर अधिकांश प्रशासनिक गतिविधियां देहरादून से संचालित होती रहें और गैरसैंण में केवल कुछ दिनों के लिए विधानसभा का आयोजन हो, तो ग्रीष्मकालीन राजधानी का दर्जा मुख्यतः प्रतीकात्मक रह जाता है।

भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन और अन्य व्यवस्थाओं पर भारी सार्वजनिक निवेश किया जा चुका है। इन परिसंपत्तियों का वर्ष में कुछ दिनों तक उपयोग आर्थिक दृष्टि से भी विचारणीय है। दूसरी ओर, वहां बार-बार अस्थायी व्यवस्थाएं करने की आवश्यकता अतिरिक्त खर्च बढ़ाती है। यदि राजधानी की अवधारणा को वास्तविक रूप दिया जाए तो स्थायी प्रशासनिक व्यवस्था से इन परिसंपत्तियों का अधिक उपयोग संभव है।

हालांकि, इसके लिए कर्मचारियों के आवास, चिकित्सा, शिक्षा, परिवहन और संचार जैसी सुविधाओं का विस्तार भी जरूरी होगा। यदि सरकार ग्रीष्मकालीन राजधानी की व्यवस्था बनाए रखना चाहती है, तो उसके लिए स्पष्ट प्रशासनिक कार्यक्रम और समयबद्ध कार्ययोजना होनी चाहिए।

उत्तराखंड जैसे आपदा-संवेदनशील पर्वतीय राज्य में पलायन, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, शिक्षा, सड़क संपर्क, प्राकृतिक आपदाओं और सीमांत क्षेत्रों की समस्याओं पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता है। गैरसैंण में विधानसभा आयोजित करने का विशेष महत्व तभी है, जब वहां पर्वतीय विकास से जुड़े इन प्रश्नों पर गंभीर विमर्श हो। अन्यथा सदन का स्थान बदलने से शासन की प्राथमिकताएं अपने आप नहीं बदल जातीं।

राजधानी का प्रश्न केवल गैरसैंण बनाम देहरादून का भौगोलिक विवाद भी नहीं है। इसका संबंध राज्य के विकास के स्वरूप से है। क्या उत्तराखंड में आर्थिक गतिविधियों, रोजगार, उच्च शिक्षा, चिकित्सा और प्रशासनिक सुविधाओं का केंद्रीकरण कुछ शहरों तक सीमित रहेगा या उनका संतुलित विस्तार पर्वतीय जिलों तक होगा?

गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग के पीछे यही व्यापक चिंता रही है। केवल राजधानी का नामकरण कर देने से पहाड़ का विकास नहीं होगा, लेकिन शासन की वास्तविक उपस्थिति पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं को निर्णय प्रक्रिया में अधिक महत्व दे सकती है।

अब आवश्यकता राजधानी के प्रश्न पर राजनीतिक घोषणाओं के बजाय स्पष्ट नीति की है। सरकार को बताना चाहिए कि ग्रीष्मकालीन राजधानी में प्रतिवर्ष कितने महीने शासन संचालित होगा, कौन-कौन से विभाग वहां कार्य करेंगे, मंत्रिमंडल की कितनी बैठकें होंगी और विधानसभा की न्यूनतम कितनी बैठकें आयोजित की जाएंगी।

भराड़ीसैंण में निर्मित परिसंपत्तियों के रखरखाव और उपयोग पर होने वाले व्यय का विवरण भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इसके साथ ही प्रत्येक सत्र पर होने वाले खर्च तथा वास्तविक विधायी कार्यवाही की अवधि की जानकारी जनता को मिलनी चाहिए।

उत्तराखंड राज्य गठन के छब्बीस वर्ष पूरे करने जा रहा है। इतने लंबे समय बाद भी राजधानी के प्रश्न पर अस्पष्टता बनी रहना गंभीर विचार का विषय है। सरकारों को यह तय करना होगा कि गैरसैंण केवल भावनात्मक और सांकेतिक राजधानी रहेगा या उसे वास्तविक प्रशासनिक अधिकारों और संस्थागत गतिविधियों से भी जोड़ा जाएगा।

राजधानी किसी स्थान पर विधानसभा भवन खड़ा कर देने या साल में कुछ घंटे सदन चलाने से नहीं बनती। राजधानी वह होती है, जहां से शासन चलता है, निर्णय लिए जाते हैं और जनता की समस्याओं का समाधान होता है।

गैरसैंण के संदर्भ में अब इसी कसौटी पर सरकारी दावों और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं का मूल्यांकन होना चाहिए। उत्तराखंड को राजधानी के नाम पर एक और घोषणा नहीं, बल्कि स्पष्ट निर्णय और उसके ईमानदार क्रियान्वयन की आवश्यकता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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