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चमोली जल प्रलय: जहां पत्ते तोड़ने की मनाही, वहां लग रहे पावर प्रोजेक्ट

Wed, 10 Feb 2021 12:41 PM IST
मोहम्मद तौहिद आलम मोहम्मद तौहिद आलम
मोहम्मद तौहिद आलम Published by: मोहम्मद तौहिद आलम Updated Wed, 10 Feb 2021 12:41 PM IST
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उत्तराखंड के चमोली जिले में सात फरवरी को जो हुआ उसे प्राकृतिक आपदा कहकर केंद्र व राज्य सरकारें अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती - फोटो : social media

उत्तराखंड के चमोली जिले में सात फरवरी को जो हुआ उसे प्राकृतिक आपदा कहकर केंद्र व राज्य सरकारें अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती। इतिहास में पहली बार ठंड में ग्लेशियर का पिघलना यह दर्शाता है कि चमोली जल प्रलय एक कृत्रिम आपदा है। इस हादसे में अब तक 25 से ज्यादा लोगों की मौतें हो चुकी हैं जबकि 200 से ज्यादा लोग लापता हैं। रेस्क्यू टीम अभी भी बचाव कार्य में लगी हुई है।

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यह हादसा बताता है कि पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करने का नतीजा कितना भयावक हो सकता है। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने यहां गंगा पर हो रहे 24 पावर प्रोजेक्ट्स के निर्माण पर रोक लगाई थी जिसकी सुनवाई आज भी जारी है। 2016 में केंद्र सरकार के जल संसाधन मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के सामने मान भी लिया था कि उत्तराखंड में गंगा पर बांध या पॉवर प्रोजेक्ट का निर्माण खतरनाक है।
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गंगा शुद्धिकरण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में तपोवन बिजली प्रोजेक्ट पर ऐतराज जताया था। मंत्रालय ने बांध और पावर पोजेक्ट को खतरनाक बताया था। लेकिन पर्यावरण मंत्रालय ने इसका विरोध किया और हलफनामा देने की बात कही। मामला सुप्रीम कोर्ट में होने के बावजूद गंगा पर निर्माण कार्य जारी रहा। टनल बनाने के लिए विस्फोट किए गए। भू वैज्ञानिकों ने इसकी चेतावनी भी दी थी उसके बावजूद कार्य जारी रहा जिसका परिणाम फरवरी के महीने में हिमस्खलन के रूप में सामने आया और इतनी बड़ी तबाही हुई।
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मशहूर पर्यवारणविद डॉ. अनिल जोशी का कहना है कि जहां यह जल प्रलय हुआ वह क्षेत्र बायोस्फियर है। यहां गांव के लोगों को पेड़ से पत्ते तक तोड़ने की इजाजत नहीं है लेकिन पावर प्रोजेक्ट लग रहे हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से इतना संवदेनशील इलाका होने के बावजूद 1980 से अब तक यहां सड़क और बिजली प्रोजेक्टों के लिए लगभग 8.08 लाख हेक्टेयर वनभूमि को नष्ट किया गया।

आंकड़ों के मुताबिक उत्तरखंड में 69 हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट की वजह से भागीरथी को 81 और अलकनंदा को 65 फीसदी नुकसान हुआ है। इसके बावजूद यहां पर्यावरण संरक्षण के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया और भयानक दुष्परिणाम को नजरअंदाज कर यहां निर्माण कार्य जारी रखा गया। 

  • विकास के नाम पर पर्यावरण से खिलवाड़ पड़ेगा महंगा

चमोली जल प्रलय ने हमें एक बार फिर से पर्यावरण के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया है। पर्यवारणविद व वैज्ञानिक बार-बार इसके खतरों को लेकर आगाह करते रहते हैं उसके बावजूद सरकार इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है। इससे इतर, केंद्र सरकार ने मई 2020 में पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) 2020 मसौदा पेश किया है, जिसे लेकर पर्यावरणविद व पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्थाएं आगाह कर रही हैं। 

पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य करने वाले कुछ गैर-सरकारी संगठनों और पर्यावरणविदों ने यह आरोप लगाया है कि सरकार के द्वारा लाया गया पर्यावरणीय प्रभाव आकलन मसौदा, 2020 पर्यावरण प्रभाव आकलन के मूल प्रावधानों को कमज़ोर करता है, जो पर्यावरण को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है। 

अगर यह मसौदा लागू होता है तो भविष्य में इसका दुष्परिणाम जलवायु परिवर्तन के रूप में सामने आएगा। विकास कार्यों के नाम पर अंधाधूंध पेड़ों और पर्वतों की कटाई से जलवायु परिवर्तन होगा। तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों के पिघलने की दरों में तेजी आएगी जिसके परिणाम स्वरूप भविष्य में केदारनाथ व चमोली से भी बड़े हादसे देखने को मिलेंगे।

ईआईए 2020 के मसौदे में केंद्र सरकार ने कई ऐसे प्रस्ताव रखे हैं जिसका नाजायज फायदा कंपनियां उठाएंगी और प्रकृति का दोहन करेंगी। इस मसौदे में पोस्ट फैक्टो प्रोजेक्ट क्लीयरेंस और पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत को छोड़ने का प्रावधान है। जिसका मतलब यह हुआ अब बड़ी बड़ी कंपनियों को पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील इलाकों में निर्माण कार्य के लिए पहले क्लीयरेंस नहीं लेना होगा साथ ही उस क्षेत्र में निर्माण कार्य शुरू करने से पहले आसपास के क्षेत्र में रह रहे लोगों के मशविरे या यूं कहें कि सहमति लेने की जरूरत भी नहीं होगी। जबकि ईआईए 2006 के मसौदे के अनुसार किसी प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले उक्त कंपनी को क्लीयरेंस लेना होता था। साथ ही आसपास के लोगों की सहमति भी लेनी होती थी। 

दरअसल, ईआईए प्रक्रिया प्रस्तावित परियोजनाओं के संभावित पर्यावरणीय प्रभाव और नकारात्मक परिणामों की छानबीन करती है और यह निर्धारित करती है कि क्या प्रस्तावित प्रोजेक्ट को छोड़ा जा सकता है या उसमें कुछ संसोधन किया जा सकता है। इसका आकलन एक विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति करती है जिसमें वैज्ञानिक और परियोजना प्रबंधन विशेषज्ञ शामिल होते हैं।

यह टीम एक रिपोर्ट तैयार करती है जिसे प्रकाशित की जाती है और एक सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया को फॉलो किया जाता है। लेकिन, 2020 का ड्राफ्ट इसे निष्क्रिय कर देता है। इस प्रकार के प्रयोग उद्योग जगत व राजनीतिक गठजोड़ को बढ़ावा देने वाले साबित हो सकते हैं।

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यह हादसा बताता है कि पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करने का नतीजा कितना भयावक हो सकता है - फोटो : social media
  • विशाखापत्तनम गैस त्रासदी है इसका नवीन उदाहरण

इस मसौदे का एक दुष्परिणाम मई 2020 में सामने आया था जब विशाखापत्तनम के एलजी पॉलिमर संयंत्र में गैस रिसाव हुआ था। इसमें एक दर्जन लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों लोग प्रभावित हुए थे। जांच में सामने आया था कि यह संयंत्र कई सालों से बिना पर्यावरणीय मंजूरी के चल रहा था। इसके लिए पूर्व में अनुमति नहीं ली गई थी। 

  • नए मसौदे इसलिए होंगे घातक

पहले सिर्फ राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा से जुड़ीं परियोजनाओं को ही रणनीतिक माना जाता था लेकिन सरकार ने प्रस्तावित मसौदे के ज़रिये अन्य परियोजनाओं के लिये भी ‘रणनीतिक’ शब्द का प्रयोग किया है। पर्यावरणीय प्रभाव आकलन मसौदा, 2020 के तहत अब ऐसी परियोजनाओं के बारे में कोई भी जानकारी भी सार्वजनिक नहीं की जाएगी, जो इस श्रेणी में आती हैं। इससे उद्योग जगत और राजनीतिक गठजोड़ को बढ़ावा मिलेगा।

नए मसौदे के तहत अब उन कंपनियों या उद्योगों को भी क्लीयरेंस प्राप्त करने का मौका दिया जाएगा जो पहले पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करते आ रहे हैं। इसे ‘पोस्ट-फैक्टो प्रोजेक्ट क्लीयरेंस’ कहते हैं। इसका फायदा उठाकर कंपनियां बिना पर्यावरण प्रभाव का आकलन किए निर्माण कार्य जारी रखेगी जिसका प्रतिकूल प्रभाव पर्यावर और समाज पर पड़ेगा। इस मसौदे में यह कहा गया है कि सरकार इस तरह के उल्लंघनों का संज्ञान लेगी।

हालांकि ऐसे पर्यावरणीय उल्लंघन या तो सरकार या फिर खुद कंपनी द्वारा ही रिपोर्ट किए जा सकते हैं। नये मसौदे के तहत पर्यावरण अधिनियम का उल्लंघन करने वाली परियोजनाएँ भी अब मंज़ूरी के लिए आवेदन कर सकेंगी। इससे पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाली परियोजनाएं भी शुरू हो सकेंगी। जिसका दुष्परिणाम भविष्य में इसी तरह के मानवीय आपदाओं के रूप में देखने को मिलेगा। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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