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खटीमा से भड़की थी उत्तराखण्ड आंदोलन में ज्वाला

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Tue, 10 Sep 2019 08:18 AM IST
इन दोनों ही काण्डों से उत्तराखण्ड में सरकारी दमन की शुरुआत हुयी थी जिसे इलाहाबाद हाइकोर्ट ने सरकारी आतंकवाद कहा था।
इन दोनों ही काण्डों से उत्तराखण्ड में सरकारी दमन की शुरुआत हुयी थी जिसे इलाहाबाद हाइकोर्ट ने सरकारी आतंकवाद कहा था।
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हर साल जब 1 सितम्बर आता है तो उत्तराखण्ड के लोगों के दिलों में खटीमा काण्ड के जख्म ताजा हो जाते हैं और दूसरे ही दिन 2 सितम्बर को मसूरी काण्ड की यादें उन जख्मों पर ही जख्म कर उन यादों को बेहद पीड़ा दायक बना जाती हैं। इस बार दो सितम्बर को उत्तराखण्ड आन्दोलन के महान सेनानी रणजीत सिंह वर्मा का देहावासान उत्तराखण्डवासियों को और अधिक व्यथित कर गया।
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इन दोनों ही काण्डों से उत्तराखण्ड में सरकारी दमन की शुरुआत हुयी थी जिसे इलाहाबाद हाइकोर्ट ने सरकारी आतंकवाद कहा था। लगातार एक के बाद एक हुये इन दोनों काण्डों में 15 उत्तराखण्डी मारे गये थे और दर्जनों अन्य घायल हुये थे। उत्तर प्रदेश से अलग राज्य का सपना संजाये हुयेे इन शहीदों में केवल हिन्दू नहीं बल्कि मुसलमान और सिख भी शामिल थे। ये बात दीगर है कि इस आन्दोलन में लाठी गोली खाने के लिये रणजीत सिंह वर्मा जैसे जो लोग सबसे आगे थे वे राज्य प्राप्ति के बाद सत्ता सुख भोगने में सबसे पीछे चले गये और जो पीछे थे वे आगे आ गये।

देश में अपनी तरह के इस पहले अहिंसक आन्दोलन की कोख से उत्तराखण्ड राज्य का जन्म तो हुआ ही साथ ही इसका लाभ झारखण्ड और छत्तीसगढ़ के लोगों को भी मिला।

आरक्षण विरोध से भड़का था उत्तराखण्ड आन्दोलन
उत्तराखण्ड को उत्तर प्रदेश और उससे पहले संयुक्त प्रान्त से अलग प्रशासनिक इकाई बनाने की मांग तो सन् 1938 से की जा रही थी और आजादी के बाद समय-समय पर सड़क से लेकर संसद तक यह मांग बार-उठती भी रही, लेकिन इस मांग को अंजाम तक पहुंचाने के जनसंघर्ष की शुरुआत अलग राज्य के आन्दोलन से नहीं बल्कि आरक्षण विरोधी आन्दोलन से तब हुयी जब कि उत्तर प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव सरकार ने 17 जून, 1994 को मण्डल कमीशन की रिपोर्ट शिक्षण संस्थानों में लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी।

इस अधिसूचना से उत्तराखण्ड में राजनैतिक भूचाल आना स्वाभाविक ही था, क्योंकि ओबीसी के लिये 27 प्रतिशत सीटें आरक्षित हो रही थीं, जबकि उस समय उत्तराखण्ड में (हरिद्वार के बिना) ओबीसी की जनसंख्या लगभग 2 प्रतिशत अनुमानित थी। इस अधिसूचना से उत्तराखण्ड के छात्र एवं युवा बौखला उठे और उन्होंने जबरदस्त आन्दोलन छेड़ दिया। उत्तराखण्ड क्रांतिदल जैसे पृथक राज्य समर्थक इसी घड़ी का इंतजार कर रहे थे। 
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