लेटरल एंट्री और सरकार: आरक्षण के ज्वलनशील मुद्दे पर जोखिम क्यों ले रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी?
क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आरक्षण जैसे ज्वलनशील मुद्दे पर जरूरत से ज्यादा जोखिम ले रहे हैं? यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है, क्योंकि एक बार फिर सरकारी नौकरियों में आरक्षण का मुद्दा देश में चर्चा का विषय बन गया।
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क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आरक्षण जैसे ज्वलनशील मुद्दे पर जरूरत से ज्यादा जोखिम ले रहे हैं? यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है, क्योंकि एक बार फिर सरकारी नौकरियों में आरक्षण का मुद्दा देश में चर्चा का विषय बन गया। दरअसल, 17 अगस्त को यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (यूपीएससी) ने एक विज्ञापन प्रकाशित किया, जिसमें लेटरल एंट्री के माध्यम से डायरेक्टर, डिप्टी सेक्रेटरी और ज्वाइंट सेक्रेटरी पद पर 45 एक्सपर्ट्स की नियुक्ति के लिए आवेदन मांगे गए।
यूपीएससी के विज्ञापन को लेकर विपक्ष तो सरकार पर हमलावर था ही, एनडीए के सहयोगी चिराग पासवान और जनता दल (यू) ने भी विरोध किया। हालांकि, चौथे ही दिन सरकार ने यूपीएससी को विज्ञापन वापस लेने के लिए कह दिया, यानी लेटरल एंट्री से नियुक्तियां अब बगैर आरक्षण नहीं होंगी। प्रश्न यह है कि आरक्षण पर लगातार फजीहत होने के बावजूद ऐसे निर्णय लेकर सरकार की किरकिरी कौन करा रहा है?
बिना परीक्षा सीधी भर्ती से पदों को भरने को लेटरल एंट्री कहते हैं। सरकारों की मंशा लेटरल एंट्री के माध्यम से एक्सपर्ट्स को भर्ती करने की होती है। मुख्य रूप से फाइनेंस, एग्रीकल्चर, एजुकेशन, टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे एक्सपर्ट को लेटरल एंट्री से सरकार में काम करने का मौका मिलता है। हालांकि, यह व्यवस्था नई नहीं है। सरकार पहले भी एक्सपर्ट्स की सीधी भर्ती करती रही है।विज्ञापन विज्ञापन
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नियुक्ति बतौर वित्त सचिव तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वर्ष 1976 में ऐसे ही की थी। योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे मोंटेक सिंह अहलूवालिया हों या ‘आधार’ के जनक नंदन नीलेकणि, वो इसी रास्ते से सरकार में शामिल हुए। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं। यही नहीं, यूपीएससी ने वर्ष 2019 और 2021 में लेटरल एंट्री के माध्यम से कुल 37 पदों पर नियुक्तियां की थीं। हालांकि, तब यह मुद्दा नहीं बना था।
जब से यूपीएससी का विज्ञापन आया, तब से सोशल मीडिया से लेकर अखबारों और टेलीविजन तक हर चर्चा में लेटरल एंट्री और आरक्षण का मुद्दा छाया हुआ था। जहां कांग्रेस लेटरल एंट्री के माध्यम से सरकार पर आरक्षण को समाप्त करने का गंभीर आरोप लगा रही थी, वहीं कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने लेटरल एंट्री का पक्ष ले लिया।
समाजवादी पार्टी लेटरल एंट्री के खिलाफ थी, लेकिन समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल आरक्षण को लेकर कोर्ट में पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाते रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती और राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव सरकार पर आरक्षण से छेड़छाड़ का आरोप लगा रहे थे।
इस साल हुए लोकसभा चुनाव में विपक्ष को आरक्षण के मुद्दे का सहारा मिला था। एक नैरेटिव विपक्ष देश में स्थापित करने में कामयाब रहा था कि नरेंद्र मोदी नेतृत्व वाली केंद्र सरकार आरक्षण को समाप्त करना चाहती है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष के आरोपों का खंडन किया। फिर भी लोकसभा चुनाव में आरक्षण के मुद्दे का असर देखने को मिला।
पिछले दिनों जब अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में सुप्रीम कोर्ट ने वर्गीकरण को सही ठहराया, तब विरोध में सरकार के सहयोगी और विपक्षी दल साथ आते दिखे थे। कई दिनों के मौन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को लागू न करने की बात कही, लेकिन हरियाणा के मुख्यमंत्री नवाब सिंह सैनी ने पिछले दिनों प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि राज्य कैबिनेट द्वारा इस व्यवस्था को हरियाणा में लागू करने का निर्णय लिया गया है।
चूंकि, आचार संहिता लागू है, इसलिए चुनाव आयोग को कैबिनेट का फैसला भेजा गया है। इसे लेकर विपक्ष फिर सत्तारूढ़ पार्टी पर उंगली उठा रहा है। वर्गीकरण के मुद्दे को लेकर 21 अगस्त को बसपा और कई संगठनों ने भारत बंद का एलान किया है। वो केंद्र सरकार से अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन केंद्र सरकार की ओर से कोई कदम उठाया जाएगा या नहीं, इसका कोई संकेत अब तक नहीं मिला है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लेटरल एंट्री के माध्यम से नियुक्तियों को लेकर सीधा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हमलावर थे। दरअसल, वर्ष 2015 में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा को लेकर एक बयान दिया था, जिसका असर यह हुआ था कि भाजपा बिहार में अच्छी स्थिति में होते हुए भी चुनाव हार गई थी।
हालांकि, भागवत ने अपने वर्ष 2015 के बयान का एक तरह से स्पष्टीकरण देते हुए सितंबर 2023 में आरक्षण की व्यवस्था को जारी रखने का समर्थन किया। उन्होंने कहा था कि जब तक समाज में भेदभाव है, आरक्षण भी बरकरार रहना चाहिए। संविधान सम्मत जितना आरक्षण है, उसका संघ के लोग समर्थन करते हैं।
लेटरल एंट्री से नियुक्तियों के मुद्दे पर मोदी सरकार पहले मोर्चा लेती दिखी। ओबीसी से आने वाले कैबिनेट मंत्री अश्विनी वैष्णव और अनुसूचित जाति से आने वाले कैबिनेट मंत्री अर्जुनराम मेघवाल को सरकार ने विपक्ष से मोर्चा लेने का जिम्मा सौंपा गया। जहां अश्विनी वैष्णव ने कांग्रेस को लेटरल एंट्री को लेकर कठघरे में खड़ा किया और कहा कि यह व्यवस्था कांग्रेस सरकार लेकर आई थी, वहीं अर्जुनराम मेघवाल ने कहा कि यूपीए सरकार के समय सोनिया गांधी जब नेशनल एडवाइजरी काउंसिल की प्रमुख थीं, तब लेटरल एंट्री की शुरुआत देश में की गई थी।
उम्मीद यही लगाई जा रही थी कि सरकार लेटरल एंट्री मुद्दे पर आगे बढ़ेगी, लेकिन एकाएक कदम पीछे खींचने के पीछे निश्चित रूप से राजनीतिक नफा-नुकसान है। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने यूपीएससी की अध्यक्ष प्रीति सूदन को पत्र लिखकर विज्ञापन वापस लेने के लिए कहा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आदेश पर ऐसा किया।
कहते हैं दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है तो ढाई महीने पहले लोकसभा चुनाव में आरक्षण जैसे ज्वलनशील मुद्दे पर नुकसान उठा चुके नरेंद्र मोदी क्यों बार-बार इसी मुद्दे पर स्वयं की घेराबंदी कराने में लगे हैं? लेटरल एंट्री से एक्सपर्ट्स तो सरकार में शामिल हो सकते थे, लेकिन इसके राजनीतिक नुकसान की भरपाई भाजपा कैसे करती? इसका कोई सटीक फॉर्मूला पार्टी की ओर से नजर नहीं आ रहा था।
क्या आरक्षण की व्यवस्था के तहत लेटरल एंट्री में नियुक्तियां नहीं हो सकती हैं? ऐसा करके सरकार एक तीर से दो निशाने लगा सकती थी। एक तो सरकार को एक्सपर्ट्स मिल जाएंगे, दूसरा विपक्ष का मुंह बंद हो जाता। मोदी सरकार इंदिरा गांधी जैसा फॉर्मूला भी अपना सकती थी। स्वयं एक्सपर्ट का चयन करे और नियुक्ति कर दे।
लेटरल एंट्री के विज्ञापन के रद्द होने को विपक्ष अपनी जीत के रूप में पेश कर रहा है। कांग्रेस प्रवक्ता तो इसका श्रेय राहुल गांधी को देने में जुट गए हैं। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लेटरल एंट्री से नियुक्तियों पर रोक लगाकर थोड़ा डैमेज कंट्रोल किया है, क्योंकि हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बड़ा मुद्दा विपक्ष को मिल गया था। फिर झारखंड और महाराष्ट्र जैसे अहम राज्यों में भी साल के अंत में चुनाव हैं तो नरेंद्र मोदी कोई मौका विपक्ष को नहीं देना चाहते थे।
यह संभव है कि लेटरल एंट्री के मुद्दे से भाजपा ने सबक लिया होगा। अब सरकार का अगला कदम सुप्रीम कोर्ट के एससी-एसटी आरक्षण में वर्गीकरण को लेकर दिए निर्णय को निरस्त करने के लिए अध्यादेश लाना हो सकता है।
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