यूसीसी का उत्तराखण्ड के रास्ते शेष भारत में प्रवेश?
यूसीसी पर सुशील मोदी की अध्यक्षता में गठित 17 सदस्यीय कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय पर संसद की स्थायी समिति की 3 जुलाइ 2023 की बैठक के बाद सुशील मोदी ने प्रेस को बताया था कि इस संहिता से जनजातियों को अलग किया जा सकता है और यही प्रावधान उत्तराखण्ड की समान नागरिक संहिता में भी किया गया है।
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विस्तार
उत्तराखण्ड विधानसभा से समान नागरिक संहिता या कॉमन सिविल कोड (यूसीसी) का विधेयक पास कराना सम्पूर्ण भारत में इस संहिता को लागू कराने का ट्रायल माना जा सकता है। क्योंकि बिना राष्ट्रपति या केन्द्र सरकार की अनुमति से न तो यह संहिता लागू हो सकती है और ना ही उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बिना केन्द्रीय नेतृत्व की सहमति के इतने बड़े और विवादित मुद्दे को छेड़ सकते थे।
माना जाता है कि पंडित नेहररू ने भी 1951-52 का आम चुनाव समान नागरिक संहिता पर ही लड़ा था जिसका उन्हें लाभ मिला और उन्होंने 19555 और 56 में हिन्दुओं से संबंधित नागरिक संहिताएं (यूसीसी) पारित करवा दीं। परिस्थितियों को देख कर साफ लगता है कि लोकसभा चुनाव से पूर्व समान नागरिक संहिता का ट्रायल उत्तराखण्ड में कराया जा रहा है।
बिना केन्द्र सरकार की मर्जी के यूसीसी संभव नहीं
यूसीसी पर सुशील मोदी की अध्यक्षता में गठित 17 सदस्यीय कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय पर संसद की स्थायी समिति की 3 जुलाइ 2023 की बैठक के बाद सुशील मोदी ने प्रेस को बताया था कि इस संहिता से जनजातियों को अलग किया जा सकता है और यही प्रावधान उत्तराखण्ड की समान नागरिक संहिता में भी किया गया है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकाल करना बहुत सामान्य सी बात है, लेकिन धामी सरकार द्वारा नागरिक संहिता का मसौदा तैयार करने वाली जस्टिस रंजना देसाई कमेटी का गृह मंत्री और विधि आयोग से मिलना सामान्य बात नहीं है। ये मुलाकातें दर्शाती हैं कि धामी सरकार का यह कदम अमित शाह के आर्शिवाद और मार्ग दर्शन के नहीं है। नागरिक संहिता की ड्राफ्ट कमेटी ने 2 जून 2023 को दिल्ली में 22वें विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस ऋतुराज अवस्थी से भेंट की थी। इसके बाद जस्टिस रंजना
देसााई ने मुख्यमंत्री धामी के साथ 3 जुलाइ 2023 को इस संबंध में गृहमंत्री अमित शाह से देर सांय मुलाकात की। उसके अगले ही दिन मुख्यमंत्री धामी ने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के बाद प्रेस से बातचीत करते हुए बताया था कि प्रधानमंत्री उत्तराखण्ड में समान नागरिक संहिता की तैयारियों से भली भांति अवगत हैं। इन मुलाकातों से साफ जाहिर है कि उत्तराखण्ड का यूसीसी कानून अकेले पुष्कर सिंह धामी के दिमाग की उपज नहीं बल्कि एक सुनियोजित चुनावी रणनीति का ही हिस्सा है।
विधि आयोग भी कर रहा यूसीसी की तैयारी
जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता वाली कमेटी की 2 जून को 22वें विधि आयोग के अध्यक्ष से मुलाकात के बाद 14 जून को आयोग द्वारा समान नागरिक संहिता पर जन साधारण और धार्मिक संगठनों से राय शुमारी करना भी केन्द्र सरकार की इस संहिता को लागू करने के प्रति बढ़ती रुचि के साथ ही सरकार के उत्तराखण्ड की नागरिक संहिता से सीधे लिंक को ही दर्शाता है। क्यों 21वां विधि आयोग 2018 की अपनी रिपोर्ट में साफ कह चुका था कि भारत में न तो समान नागरिक संहिता जरूरी है और ना ही वांछित है।
उस आयोग का गठन भी मोदी सरकार ने ही किया था और उसके पास भी यह विषय विचारणीय था। यही नहीं उत्तराखण्ड के मुख्समंत्री ने पहले कहा था कि देसाई कमेटी जून तक अपनी रिपोर्ट दे देगी। उन्होंने यह भी कहा था कि संहिता का ड्राफ्ट बन कर पे्रस में है। लेकिन कमेटी की विधि आयोग और गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकातों के बाद उसकी रिपोर्ट को इतने विलम्ब से 2 फरबरी को आने का मतलब विधि आयोग और गृह मंत्रालय के सामंजस्य से रिपोर्ट को ऐसा बनाना भी हो सकता है जो कि स्वयं केन्द्र सरकार के काम आए।
विधि आयोग का कार्यकाल यूसीसी के लिए बढ़ा?
जस्टिस ऋतुराज अवस्थी की अध्यक्षता में 21 फरबरी 2020 को 22वें विधि आयोग का गठन 3 साल के लिए हुआ था जिसका कार्यकाल फरबरी 2023 में पूरा होने के बाद उसे 31 अगस्त 2024 तक का विस्तार दिया गया है। भारत का विधि आयोग एक गैर-सांविधिक निकाय है और भारत सरकार के विधि और न्याय मंत्रालय की एक अधिसूचना द्वारा कानून के क्षेत्र में अनुसंधान करने के लिए एक निश्चित समय सीमा के साथ इसे गठित किया जाता है और आयोग के विचारार्थ विषयों के अनुसार सरकार को (रिपोर्ट के रूप में) सिफारिशें करता है।
वर्तमान आयोग के समक्ष भी विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा समान नागरिक संहिता के मामले को संदर्भित किया गया है। आयोग को अपने मूल कार्यकाल की समाप्ति के बाद अब यूसीसी पर तत्परता दिखाने को सीधा मतलब भारत सरकार का इस मुद्दे को अपनी प्रथमिकता में लाना है। तत्परता भी तब दिखाई जा रही है जबकि उसका मूल कार्यकाल ही समाप्त हो गया। सरकार का इस विषय पर इतनी रुचि दिखाने का मतलब 2024 का लोकसभा चुनाव ही हो सकता है।
आसान नहीं था इसलिए हो रहा ट्रायल
संविधान के नीति निर्देशक तत्व संख्या 44 में सरकार सेे भारत के पूरे क्षेत्र के अंन्दर समान नागरिक संहिता लागू करने की अपेक्षा की गई है। मौलिक अधिकारों संबंधी अनुच्छेद 24 से 28 की रुकावटों, देश की संास्कृतिक विधिता और अनुसूची 5 और 6 की विशेष परिस्थितियों के कारण भारत की सरकारें अब तक इसे लागू नहीं कर सकीं। मोदी सरकार धारा 370 को तक हटाने का बहुत ही मुश्किल काम आसानी से कर गई। लेकिन वह भी देश की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता तथा संवैधानिक प्रावधानों को देखते हुए ‘‘यूसीसी’’ को लेकर ठिठक गई।
यह संहिता सीधे तौर पर लोगों की आस्था और धार्मिक परम्पराओं के मौलिक अधिकारों से संबंधित है। यह भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र से भी संबंधित है और सुप्रीम कोर्ट की सबसे बड़ी बेंच 1973 में कह चुकी है कि संसद के पास संविधान संशोधन के व्यापक अधिकार तो हैं लेकिन असीमित अधिकार नहीं हैं। उसी समय कोर्ट का यह भी कहना था कि संविधान की मूल भवना से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है और अगर ऐसा होता है तो सुप्रीमकोर्ट को ऐसे संशोधनों की समीक्षा का अधिकार है। इसलिए उत्तराखण्ड की यूसीसी को भी कोर्ट में चुनौती अवश्य मिलेगी।
संवैधानिक प्रावधान आड़े आएंगे यूसीसी के आगे
जहां तक उत्तराखण्ड में ‘‘यूसीसी’’ का सवाल है तो राज्य विधानसभा को कानून बनाने का पूरा अधिकार है मगर संविधान के दायरे से बाहर जाने का अधिकार नहीं। यह संविधान की समवर्ती सूची का है और अनुच्छेद 254(1) कहता है कि समवर्ती सूची के विषयों पर संसद के साथ ही विधानसभा भी कानून बना तो सकती है लेकिन अगर दोनों के कानून टकराते हैं तो केन्द्र के कानून के आगे राज्य का कानून स्वतः अमान्य हो जाएगा।
चूंकि इस विषय पर पहले ही संसद द्वारा पारित हिन्दू मैरेज ऐक्ट और मुस्लिम पर्सनल लॉ जैसे कानून मौजूद हैं, जिन्हें बदलने का अधिकार राज्य विधानसभा को नहीं है। लेकिन इसी अनुच्छेद के 254 (2) में कहा गया है कि अगर समवर्ती सूची में राज्य विधानसभा द्वारा पारित कानून को राष्ट्रपति अनुमति देते हैं तो वह कानून उस राज्य की सीमा के अंदर लागू हो सकता है।
जाहिर है कि इसी धारा को ध्यान में रखते हुए उत्तराखण्ड में ‘‘यूसीसी’’ बनाने की पहल हो रही है और बिना केन्द्र सरकार के आश्वासन या प्रोत्साहन के राज्य सरकार द्वारा यह पहल नहीं हो सकती थी। इस यूसीसी में मौलिक अधिकारों के हनन के साथ ही लिव इन रिलेशन, सम्पति का उत्तराधिकार, सरकारी कर्मचारियों तथा दूसरे राज्यों में रह रहे प्रवासियों पर बंदिशें जैसी कुछ एंसी खामियां हैं जो अदालती हस्तक्षेत्र के लिए पर्याप्त कारण है। ऐसा लगता है कि केन्द्र सरकार ट्रायल के तौर पर उत्तराखण्ड में यह संहिता परखना चाहती है और देखना चाहती है कि इसके सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक प्रभाव क्या हो सकते हैं।
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