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Tsunami 2004: ..और होटल का मालिक ताला लगाकर चला गया, अब केवल हम थे और मौत की पल-पल बढ़ती आहट..!

Thu, 26 Dec 2019 12:23 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Thu, 26 Dec 2019 12:23 PM IST
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tsunami 2004 in tamil nadu chennai 15 years
वहां का नजारा देखकर मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं। - फोटो : Social media

पूरे पंद्रह साल हो गए। पर एक-एक पल आज भी आंखों के सामने नाच रहा है। उस दिन भी 26 दिसंबर थी। इस बरस की तरह उस दिन भी दिल्ली में कड़ाके की ठंड थी। मैं आजतक चैनल में संपादक था। रात हम लोग देर तक ऑफिस की क्रिसमस पार्टी में थे, इसलिए सुबह सात बजे गहरी नींद में थे। अचानक, मोबाइल की घंटी बजने लगी। देर तक बजती रही। तनिक खीज के साथ फ़ोन लिया तो सुनकर हैरान रह गया।

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चेन्नई से एक मित्र का फ़ोन था। बोले-शहर में समंदर का पानी भरा है। लोग बदहवासी में भाग रहे हैं। मैने टीवी खोला तो सन्न रह गया। पूरबी और दक्षिणी समंदर सीमा वाले राज्यों में ऐसी ही खबर थी। कुछ अटपटा सा लगा। अपने परिचित भारत के विख्यात भू-गर्भ विज्ञानी डॉक्टर जेजी नेगी से बात की।

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उन्होंने कुछ और जानकारी ली फिर बताया कि अगर चेन्नई में डेढ़ दो फिट पानी भरा है तो इसका अर्थ सुनामी आई है। इसमें कई हज़ार लोग मारे जाएंगे। सुनामी यानी समंदर का भूकंप।
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मैंने तुरंत उन सूचनाओं को आजतक पर ब्रेक किया। ऑफिस पहुंचा। सबसे विनाशकारी स्थल तमिलनाडु का नागपट्टनम और कुछ पुडुचेरी का इलाका था। ग्यारह बजते तो मैं अपनी कैमरा यूनिट के साथ दिल्ली के एयरपोर्ट परथा। चेन्नई उतरा। तब तक ऑफिस ने टैक्सी और सीधा प्रसारण करने की सुविधा वाली ओबी वैन एयरपोर्ट भेज दी थी। शाम पांच बजे के आसपास हम लोगों की टीम नागपट्टनम में प्रवेश कर चुकी थी। 

tsunami 2004 in tamil nadu chennai 15 years
ईश्वर ऐसी घटनाएं ना ही हो और इस तरह की रिपोर्टिंग भी किसी को करने का अवसर ना दे। - फोटो : फाइल फोटो

उफ़! क्या विध्वंस था। देखकर आंखें फटी रह गईं। चारों तरफ़ हाहाकार। मछुआरों की बस्ती रेत में दफ़न हो चुकी थी। हज़ारों लोग उसके दस फिट नीचे दबे थे। शहर भुतहा था। बड़े-बड़े जहाज़ जैसे उड़कर किनारे दो तीन मंजिला इमारतों की छत पर टंगे थे। अनेक इमारतें ज़मींदोज़ हो चुकी थीं। शाम तक क़रीब दो हज़ार लोगों के मारे जाने की ख़बर पक्की हो चुकी थी। घंटे भर के भीतर हम आधा घंटे के वीडियो और साक्षात्कार दिल्ली भेज चुके थे। हम सबसे पहले विस्तार से सीधे दिखाने वाले पहले चैनल थे। इसके बाद हम लोगों ने एक होटल तलाश किया। दो ही ढंग के होटल थे। एक में जगह मिल गई।

सुबह आठ बजे के पहले हम फिर करीब एक घंटे की खबरिया सामग्री दिल्ली भेज चुके थे। हमारी गाड़ी के पीछे ओबी वैन चलती थी। जहां कुछ नया दिखता,हम वहीं से सीधा प्रसारण शुरू कर देते। दोपहर होते-होते पूरे शहर में एक बार फिर अफरा-तफरी मच गई। अफ़वाह फैली कि सुनामी फिर आने वाली है। शाम होते होते शहर वीरान हो गया। सड़कों पर कर्फ्यू जैसा सन्नाटा था।

इधर, होटल मालिक मेरे पास आया। उसने पूछा- क्या हम लोग रुकने का इरादा रखते हैं ? मैंने कहा- मैं तो इसी काम के लिए आया हूं। छोड़कर नहीं जा सकता। उसने कहा-कोई ज़िंदा नहीं बचेगा। मैंने कहा-अब जो भी होगा देखा जाएगा।

उसने कहा- मैं तो होटल में ताला लगाकर जा रहा हूं। आपके लिए दो कमरे खुले छोड़ देता हूं। किचिन खुला है। आप लोग रहिए। अगर आप वापस लौटें और अगर श्रद्धा हो तो एक स्थान पर कमरों का किराया रख जाइए। नहीं तो रहने दीजिए। यह कहकर वह चला गया।

उसकी घबराहट देखकर और शहर का माहौल देखकर हमारी ओबी के ड्राईवर इंजीनियर और यूनिट के साथी भी घबरा गए थे। वे भी जाने की बात करने लगे।


इंजीनियर बोला- मेरी तो अभी शादी तक नहीं हुई है। मैं मरने के लिए नहीं आया हूं। मैंने सबको बुलाया। एक बैठक की। उन सबसे कहा कि वे जाना चाहें तो बेशक जा सकते हैं किन्तु मैं छोड़कर नहीं जाऊंगा। चाहे जान चली जाए। तुम सब कैमरा और ओबी छोड़ कर जाओ। मैं अकेला ही कैमरा ऑपरेट कर लूंगा और ओबी भी संचालित कर लूंगा। मुझे यह सब आता है। मेरा निश्चय देखकर अनमने ढ़ंग से वे लोग रुक गए। लेकिन मरने का डर उनके चेहरों पर मैं पढ़ सकता था।

हमने किचिन में देखा। कुछ ब्रेड के पैकेट,अंडे, दो चार लिटर दूध, गुड़ और थोड़ा सामान था। अगले कुछ दिन हमने उस वीरान शहर में इसी तरह काटे। पूरे शहर में कुछ और टीवी टीमें तथा पुलिस प्रशासन के अलावा बमुश्किल सौ डेढ़ सौ लोग बचे थे। जब दो तीन दिन दोबारा सुनामी नहीं आईं तो लोग भी लौटने लगे। होटल मालिक भी लौट आया।


जब दिल्ली से गए थे तो कड़ाके की सर्दी थीं, इसलिए गरम कपड़ों में ही जिस हाल में थे भागे थे। वहां तेज गरमी थी। हम सब परेशान थे। तीन दिन बाद नागपट्टनम से कोई अस्सी किलोमीटर दूर किसी अन्य कस्बे में गए। वहां से टी शर्ट और कुछ कपड़े खरीदे। एटीएम से धन निकाला और लौटे। कई दिन तो नाश्ते के लिए कुछ भी नहीं मिलता था।अलबत्ता वहां नाश्ते के नाम पर रोज़ एक ठेले वाला कटहल के बड़े-बड़े मीठे बीज दे जाता था। दस रुपए में बड़े आम के आकार के मीठे-मीठे फल थे। अभी भी उनका स्वाद ताज़ा है। मैंने पहली बार कटहल के बीजों का नाश्ता किया।

फिर पंद्रह दिन वहां रहे। आसपास के इलाकों से ख़बरें निकाली। आजतक के अलावा वॉइस ऑफ अमेरिका के लिए भी लगातार रिपोर्टिंग की। हमारे चैनल का अनुबंध था। आज भी उन पंद्रह दिनों की याद करके रूह सिहर जाती है । ट्रकों में भर भर कर रोज़ लाशें निकलती थीं । मैंने भोपाल के  गैसकांड के बाद इस तरह के दृश्य देखे। ठीक बीस साल बाद। भगवान करे- किसी पत्रकार के लिए कभी ऐसा कवरेज़ करने की नौबत न आए। उस कवरेज़ का एक हिस्सा यहां प्रस्तुत है। मेरी कुछ और भी सुनामी केन्द्रित रपटें आप देख सकते हैं।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।




 

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