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टाइम मशीन: तेल के डग्गामार समुद्री जहाजों की दास्तान...और इमैनुअल नोबेल की उपलब्धियां

Sun, 29 Oct 2023 07:56 AM IST
Anshuman Tiwari अंशुमान तिवारी
Updated Sun, 29 Oct 2023 07:56 AM IST
सार

अल्फ्रेड नोबेल के पिता इमैनुअल नोबेल 19वीं सदी की विशिष्ट प्रतिभाओं में एक थे। वह वैज्ञानिक, प्लानर, और  इंजीनियर थे। मार्च 1928 में 27 साल की उम्र में वह पेटेंट हासिल करने लगे थे मगर इमैनुअल कारोबार करना चाहते थे। उन्होंने कंस्ट्रक्शन का धंधा किया जो 1835 में डूब गया। इमैनुअल दिवालिया हो गए। इसी साल अल्फ्रेड नोबेल का जन्म हुआ।

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Time Machine The story of rogue oil ships and achievements of Immanuel Nobel
story of rogue oil ship - फोटो : ANI

विस्तार

ईरान की मानवाधिकार योद्धा नरगिस मोहम्मदी इसी अक्तूबर दुनिया की आदर्श बन गईं। ईरान के अधिनायकवादी शासन के खिलाफ संघर्ष में 31 साल से जेल में बंद नरगिस को सम्मानित कर नोबेल शांति पुरस्कार ने खुद को गौरवान्वित किया।

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अलबत्ता चिकित्सा, साहित्य, अर्थशास्त्र आदि में शोध और रचना के नए क्षितिज गढ़ने वालों को नोबेल पुरस्कारों की सुर्खियों के बीच कारोबारियों की दुनिया अंधेरे समुद्रों से उठने वाली कुछ खबरों के ओर-छोर तलाश रही थी। यह खबरें ईरान से भी जुड़ी थीं और रूस व वेनेजुएला से भी।
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बीते बरस जी7 देशों ने रूस के तेल पर एक अनोखी पाबंदी लगाई कि उसका तेल 60 डॉलर प्रति बैरल से महंगा नहीं बेचा जा सकता। पाबंदी इसलिए लगी क्योंकि रूस महंगा तेल बेच कर कमाई कर रहा है और जंग थोपकर यूक्रेन को तबाह कर रहा है।  
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यह शर्त लागू हुई शिपिंग और जहाजों का बीमा करने वाली कंपनियों के जरिये। जहाज वाले अब 60 डॉलर से महंगा रूसी तेल नहीं उठायेंगी। उस माल और यात्रा का बीमा भी नहीं होगा।

जी7 देशों ने इस सितंबर में जब तेल बाजार की तस्वीर देखी तो बगलें झांकने लगे। रूस पर इस सख्ती का कोई असर नहीं हुआ। उसका तेल बदस्तूर टैंकर शिप के जरिये चीन और भारत पहुंच रहा था। रूस ही क्यों, ईरान और वेनेजुएला भी प्रतिबंधों के धुर्रे बिखेर कर पूरी दुनिया में तेल बेचने घूम रहे थे।

इस साल मई मलेशिया के पास पाब्लो नाम का एक टैंकर शिप हादसे का शिकार हुआ था। गैबन में रजिस्टर्ड 27 साल पुराना यह जहाज अवैध रूप से ईरान का कच्चा तेल दुनिया में पहुंचाता था। अब यह रूस के लिए भी काम कर रहा था।

यह ऑयल टैंकर्स का डार्क फ्लीट है...तेल के कारोबार की दुनिया को पहली बार इनकी ताकत का अहसास हुआ है। इन डग्गामार आयल टैंकर जहाजों ने प्रतिबंधों को समुद्र में डुबा दिया है। यह पुराने जहाज बगैर बीमा के तेल ले जाते हैं और अब निकोलस मादुररो, ब्लादाीमिर पुतिन और अल खमैनी की ऑयल कूटनीति का हिस्सा हैं।  

मगर इस डग्गामारी का नोबेल से क्या रिश्ता है?
तो आई बैठिये टाइम मशीन में।
हम आपको ले चलते है स्वीडन के ऐतिहासिक शहर ऊप्साला। स्टॉकहोम से करीब 64 किलोमीटर दूर। उत्तरी यूरोप के इतिहास की चर्चा ऊप्साला के बिना नामुमकिन है। यह शहर प्राचीन नॉर्स धर्म का काशी, काबा या वेटिकन है। थोर, ओडिन फ्रेयर जैसे महान नॉर्स देवताओं के मंदिर का केंद्र ऊप्साला नॉर्स दंतकथाओं का केंद्र है।

यही शहर पेगन और क्रिश्चियन धर्म के रक्तरंजित संघर्ष का गवाह भी है। कहते हैं उस युद्ध में ऊप्साला के महान मंदिर को जला दिया गया था। नेटफ्लिक्स पर वाइकिंग इतिहास की गाथाओं के साथ ऊप्साला नई पीढ़ी को रोमांचित कर रहा है।

15 सदी में बनी ऊप्साला यूनिवर्सिटी उत्तरी यूरोप के ज्ञान का केंद्र थी। यूनिवर्सिटी की मशहूर शख्सियत थे ओल्ड रुडबेक। चिकित्सा विज्ञानी, अन्वेषक, इतिहासकार रुडबेक ने स्वीडन को कई पीढ़ियों तक प्रभावित किया। रुडबेक गायक भी थे। 1675 में सम्राट कार्ल्स 11वें के राज्याभिषेक का गीत उन्होंने ही लिखा और गाया भी। नोबेल पुरस्कार वाले अल्फ्रेड नोबेल इन्ही रुडबेक के परिवार से आते थे। अल्फ्रेड नोबेल पिता इमैनुअल नोबेल 19वीं सदी की विशिष्ट प्रतिभाओं में एक थे। वह वैज्ञानिक, प्लानर, और  इंजीनियर थे। मार्च 1928 में 27 साल की उम्र में वह पेटेंट हासिल करने लगे थे मगर इमैनुअल कारोबार करना चाहते थे। कंस्ट्रक्शन का धंधा किया जो 1835 में डूब गया। इमैनुअल दिवालिया हो गए। इसी साल अल्फ्रेड नोबेल का जन्म हुआ। 1842 में इमैनुअल नोबेल नए कारोबार की खोज फिनलैंड होते हुए रूस पहुंच गए।

इंजीनियर इमैनुअल ने एक व्हीलबस बनाई जो उस वक्त का बड़ा आविष्कार थी। इमैनुअल को सेना की मशीनें बनाने के ऑर्डर मिले तो उन्होंने फैक्ट्री लगा ली। 1854 में क्रीमिया के युद्ध के दौरान वह जंगी स्टीम जहाजों के इंजन बनाने लगे। मगर युद्ध खत्म होने के बाद उनकी कंपनी फिर दिवालिया हो गई। इमैनुअल अपने बेटे अल्फ्रेड के साथ स्टॉकहोम आ गए.अल्फ्रेड नोबेल बड़े आविष्कारक बने। जिनके नाम से नोबेल पुरस्कार दिया जाता है।  

तेल के डग्गामार जहाजों की रोमाचंक दास्तान अल्फ्रेड नोबेल के भाई रॉबर्ट और लुडविग नोबेल से संबंधित है। मामला कुछ ऐसा था कि दिवालिया होने के बाद जब इमैनुअल नोबेल अपने बेटे अल्फ्रेड के साथ रूस छोड़ रहे थे तब उनके कर्जदारों ने बेटों रॉबर्ट और लुडविग को रूस में रोक लिया।    

रॉबर्ट नाइट्रो ग्लिसरीन कंपनी चला रहे थे जो उनके पिता इमैनुअल ने लगाई थी। जबकि लुडविग के पास स्टील कंपनी थी जो रूस की सेना के लिए बंदूकें बनाती थी।

तेल से कारोबार से रॉबर्ट का रिश्ता अजीबोगरीब ढंग से बना। लुडविग नोबेल की शादी हुई तो अपनी स्टील फैक्ट्री रॉबर्ट को को सौंपकर हनीमून पर चले गए। रॉबर्ट को बंदूकों के कुंदे बनाने के लिए लकड़ी चाहिए थी। वालनट की लकडी की तलाश में रॉबर्ट पहुंच गए अज़रबैजान के शहर बाकू।

यहां कच्चे तेल की खोज और खुदाई चल रही थी। रॉबर्ट 1875 में यहां एक पुरानी रिफाइनरी और कुछ जमीन खरीद दी। बाकू में नोबेल ब्रदर्स की कंपनी ब्रेनोबेल ने तेल का उत्पादन शुरु कर दिया था। दूसरी तरफ अमेरिका में रॉकफेलर की स्टैंडर्ड ऑयल तेल के कारोबार में तेजी से आगे बढ़ रही थी।

अब मंच पर प्रवेश करते हैं लुडविग नोबेल यानी रॉबर्ट नोबेल के भाई। बाकू की पहली यात्रा में समझ गए कि तेल भविष्य का सोना है। उन्होंने इसमें निवेश बढ़ाया। 1875 में लुडविग ने ब्रेनोबेल के मैनेजरों को तेल प्रबंधन की तकनीक सीखने के लिए अमेरिका भेजा और एक साल में ही बाकू में नई तकनीक से तेल उत्पादन होने लगा।

1877 में रॉबर्ट और लुडविग ने बाकू से रूस के बाजारों तक तेल पहुंचाने की पाइपलाइन बिछा दी। यह पाइप लाइन ग्लासगो इंग्लैंड से आयात हुई थी। तब तेल का इस्तेमाल रोशनी के लिए किया जाता था। यह पैरफीन या केरोसिन होता था। नोबेल ब्रदर्स बाकू का  तेल यूरोप भेजना चाहते थे। तब तक तेल के जहाजी टैंकर नहीं बने थे। तेल को लकड़ी की बड़ी बैरल में भरकर जहाजों के जरिये भेजा जाता था।  

लुडविग के पास रूस की सेना के लिए स्टीम शिप बनाने का तजुर्बा था। तेल टैंकर बनाने का एक प्रयोग 1872 में हो चुका था  मगर उसका इस्तेमाल नहीं हुआ। लुडविग ने जहाज के भार और पानी में संतुलन के विज्ञान पर प्रयोग करते हुए टैंकर में ब्लास्ट टैंक तकनीक विकसित की। लुडविग ने 1877 में स्वीडन के शहर नॉरचापिंग में मोटोला वर्क्स के शिपयार्ड को ऑयल टैंकर बनाने तकनीक और डिजाइन समझाई और दुनिया का पहला ऑयल टैंकर बनने लगा। बेरमस्टर स्टील पर बना यह जहाज 1877 में ब्रेनोबल कंपनी को मिल गया।  

इसका नाम था जोरसेस्टर ..जो फारस के प्राचीन धर्मगुरु जरस्थुत्र से मिला था। जोरसेस्टर के तेल की ग्लोबल यात्रा शुरु हो गई। यह जहाज बाकू से तेल और केरोसिन लेकर वोल्गा और कैस्पियन सागर के रास्तों अस्त्राखान और यूरोप जाने लगा।  

1880 तक ब्रेनोबल का टैंकर बेड़ा बढ़ने लगा। इसमें शामिल हुआ अगले  टैंकर का नाम था बुद्ध। फिर आया टैंकर नॉर्डेनशॉल्ड। यह नाम फिनलैंड-स्वीडिश वैज्ञानिक और  अन्वेषक एरिक नॉर्डेनशॉल्ड के नाम पर रखा गया था।  

1881 तक गोटेनबर्ग के शिपयार्ड ने ब्रेनोबल कंपनी के लिए छह और ऑयल टैंकर बनाए। इनके नाम थे मोहम्मद, ब्रह्मा, सॉकर्टीज (सुकरात), स्पिनोजा (क्रांतिकारी यहूदी डच दार्शनिक बरुच स्पिनोजा) और डार्विन (वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन)। ब्रेनोबल का छठा आयल टैंकर था पेट्रोलिया। लुडविग नोबेल के निधन के बाद इसका नाम बदल कर लुडविग किया गया।


जोरसेस्टर ने दुनिया को टैंकरों की तकनीक सिखा दी थी। रूस और अमेरिका में नए टैंकर बनने शुरू हो गए। 2021 में दुनिया में करीब 9,000 ऑयल टैंकर शिप थे। जिनसे लगभग 1.83 अरब बिलियन मीट्रिक तेल का परिवहन हुआ। इनमें से कई जहाज एसे हैं जो पुराने हैं और समुद्र में गैर लाइसेंसी वाहनों की तरह चलते हैं वेनेजुएला और ईरान जैसे मुल्क प्रतिबंधों के बीच इनके जरिये तेल का निर्यात करते हैं।

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