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इंदौर दुर्घटना : हादसे अब पार करने लगे हैं अपनी हदें, नहीं चाहिए दौरे और जांचें
सार
शहर की संवेदनशीलता पर सवाल उठ रहे हैं क्योंकि हादसे के बाद कुछ दिनों में ही लोग इसे भुला देते हैं। प्रशासन हर बार जांच और निलंबन तक सीमित रह जाता है, जबकि अवैध निर्माण और लापरवाही भविष्य में और बड़े हादसों को न्योता दे रहे हैं।
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जर्जर मकान गिरने के बाद बिखरा मलबा।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
यह तीसरा सोमवार है, जब शहर में इस दिन बड़ा हादसा हुआ है। चूहा कांड, फिर शराब के नशे में एक ट्रक ड्राइवर ने तीन लोगों की जान ले ली और अब एक कमजोर मकान दो लोगों की मौत की वजह बना। ये कोई ‘लीला’ नहीं है, ये लापरवाही है। इस शहर में हादसे पर हादसे होते हैं, लेकिन चेतता कोई नहीं है। सरकारी अफसर हादसे की समीक्षा करते हैं, जांच होती हैं, बस।
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सोमवार को जिस गली में हादसा हुआ, उसी गली में 100 कदम दूर पर कुछ वर्षों पहले पटाखा दुकान में आग लग गई थी। उस हादसे में सात लोगों की मौत हो गई थी। उस धमाके में आदमी तो आदमी आसपास के तारों में बैठे कबूतर भी नहीं उड़ पाए थे। इंदौर में इंसान की जान की कीमत भी कबूतरों जैसी हो गई, जिस परिवार का व्यक्ति जाता है, उस परिवार की दुनिया लुट जाती है, बाकि किसी को फर्क नहीं पड़ता।
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अभी भी हैं जर्जर इमारतें जो दोहरा सकती है हादसा
हादसे को भुलाकर शहर दूसरे ही दिन खाने-कमाने, जाम में फंसने के लिए शहर की सड़कों पर निकल जाता है। जो अवैध बिल्डिंग गिरी, उसी गली में और भी अवैध इमारतें हैं, जो भविष्य में हादसे को दोहराएंगी, रानीपुरा नहीं तो कोई दूसरा इलाका हादसे का नया पता होगा। तब तक पुराने हादसे से सबक लेने की कसमें खाने वाले अफसर तबादलों के आदेश लेकर दूसरे शहरों में होंगे।
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कहां जाएं, कहां रोए?
जिन लोगों के गर्भनाल इस शहर में ही गड़े हैं, जिन्हें हादसों का अफसोस दिल से होता है, वे कहां जाएं, कहां रोए? क्योंकि अब शहर में बड़े हादसों की संवेदनाओं का ‘उठावना’ तीसरे ही दिन हो जाता है। ज़्यादा दिनों तक दुख कोई नहीं मनाता। शहर को जल्दी बातें भूलने की बीमारी लग गई है। अफसोस है कि इसका इलाज किसी अस्पताल में नहीं होता है। 'कौन मुंह लगे इनके..., हम अकेले बोलेंगे तो क्या होगा इससे..' जैसी मानसिकता ताकतवर होती जा रही है।