दूसरा पहलू: गुरुत्वाकर्षण को चुनौती देता हजार साल पुराना मंदिर, एमपी का यह शिव उपासना स्थल अद्भुत है
ककनमठ मंदिर हजार वर्षों से भौतिक विज्ञान के नियमों को धता बता लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। उत्तर प्रदेश के आगरा से चंबल नदी को पार कर मुरैना से लगभग 40 किलोमीटर दूर सिहोनिया कस्बे में स्थित यह शिव उपासना स्थल अद्भुत है। महमूद गजनवी से लेकर इल्तुतमिश व सिकंदर लोदी ने भी मंदिर को जमींदोज करने की कोशिश की, लेकिन वे अपने मंसूबों में पूरी तरह सफल नहीं हो सके।
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तस्वीरें इस असाधारण देवस्थल से न्याय नहीं करतीं। लेकिन जब आप इसके सामने होते हैं, तो बरबस ही उन दंतकथाओं पर यकीन करने लगते हैं, जो इस मायावी मंदिर से जुड़ी हैं। आगरा से चंबल नदी को पार कर मुरैना से लगभग 40 किलोमीटर दूर सिहोनिया कस्बे में स्थित यह शिव का उपासना स्थल अद्भुत है। इंटरनेट पर देखेंगे, तो ककनमठ मंदिर को लेकर रील और वीडियो की भरमार है, जिसमें इसे भूतों द्वारा एक ही दिन में निर्मित बताया जाता है।
विशाल मंदिर के प्रांगण में खड़े होकर ऊपर देखकर हैरानी होती है, लगता है पत्थर की विशाल शिलाएं जैसे आसमान में तैर रही हैं और किसी जादू ने उन्हें बांध दिया है। आखिर ऐसा क्यों लगता है कि यह मंदिर बस अभी गिरने वाला है। गुरुत्वाकर्षण के नियमों को धता बता पिछले लगभग एक हजार साल से यह ऐसे ही खड़ा है। ग्वालियर के किले पर सास-बहू मंदिर के एक शिलालेख जिस पर ककनमठ के बारे में लिखा है:
अद्भुत सिंहपनीयनगरे ये कारित
कीर्ति स्तम्भ इवा भाति प्रासाद पार्वतीपते।।
अर्थात कीर्तिराज ने अपनी राजधानी सिंहपानीय नगर में पार्वती पति (शिव) के प्रासाद (मंदिर) का निर्माण कराया। यही शिव प्रासाद है, ककनमठ। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि ककनमठ की बाहरी दीवारों पर बनी प्रतिमाएं विश्व प्रसिद्ध खजुराहो का शिल्प चंबल के इस इलाके से प्रेरित हो सकती हैं। विशेषज्ञ इसे 10वीं-11वीं सदी का आंकते हैं, जबकि खजुराहो की मंदिर शृंखला बाद की है। मंदिर के निर्माण में विशाल शिलाओं को जोड़ने के लिए सीमेंट जैसे किसी पदार्थ का प्रयोग नहीं हुआ है।
शिलाओं को तराशकर इस तरह लगाया गया कि 115 फुट ऊंचा मंदिर किसी स्तंभ सरीखा लगे। एक जनश्रुति के अनुसार, कच्छपाघात राजकुमार कीर्तिराज ने कंकणावती की जान मगरमच्छ से बचाई थी। बाद में दोनों का विवाह हो गया। राजा मंगलदेव ने तब यह मंदिर बनवाया। राजकुमारी कंकणावती के नाम से ही इसे ककनमठ के रूप में जाना गया।
इतिहासकार डॉ. हरिहर निवास द्विवेदी के अनुसार, महमूद गजनवी ने 1026 ईस्वी के आसपास ककनमठ पर भी हमला किया था। तब इसे इतना नुकसान नहीं हुआ, लेकिन गुलामवंश के शासक इल्तुतमिश ने इसे जमींदोज करने की भरपूर कोशिश की। फिर सिकंदर लोदी ने जब हमला किया, तो मुख्य मंदिर को छोड़कर सब कुछ नष्ट कर दिया। सवा सौ साल पहले बिजली गिरने से मंदिर के शिखर को खासा नुकसान पहुंचा। फिर भी तमाम झंझावातों को झेलते हुए आज भी प्रेम और आस्था का प्रतीक यह देवालय किसी योगी-सा तपस्या में लीन है।