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जो समझता है प्रेम करता है, जो कुछ नहीं समझता व्यर्थ है

Thu, 08 Aug 2019 03:00 PM IST
Lalit fulara ललित फुलारा
Updated Thu, 08 Aug 2019 03:00 PM IST
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The one who understands loves who does not understand is meaningless
ऑफिस के आखिरी दिन प्यार - फोटो : pixabay
एक पाती प्रेम के नाम
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प्रेम, गुलाब की पंखुड़ियों में होता तो चंद घंटे बाद गुलाब मुरझा क्यों जाता? प्रेम तो गुलाब की टहनियों में है जो हवा के संग लहलहाती हैं। प्रेम की जड़ वो मिट्टी है जो पानी से सींची जाती है और चंद रोज बाद असंख्य गुलाब मुस्करा रहे होते हैं। प्रेम मनुष्य के भीतर है। न शब्द में है, न भाव में है। वो चेतना में है। अहसास में है। शब्द मात्र उसकी अभिव्यक्ति हैं। प्रेम व्यक्ति के भीतर एक सक्रिय शक्ति है। यह शक्ति, व्यक्ति और दुनिया के बीच की दीवारों को तोड़ डालती है और उसे दूसरों से जोड़ देती है।

कहीं ऐसा तो नहीं अब यह सक्रिय शक्ति क्षीण होती जा रही है और प्रेम दिखावटी! हम एक जल्दबाजी। शोरगुल। भीड़-भाड़ और रफ्तार और हड़बड़ी में तो नहीं जी रहे। अगर जी रहे हैं तो कितना अजीब है यह जल्दबाजी है। शोरगुल। भीड़-भाड़… और रफ्तार। हमारे पास सबकुछ है सिर्फ वक्त नहीं है। न मिलने, न बातचीत के लिए। ऐसे में हमारे अंदर का प्रेम फीका पड़ रहा है…शून्य की तरफ बढ़ रहा है। किसी के दुख में हमारे आंखों में आंसू नहीं होते, सुख में चेहरे की मुस्कारहट…हमारी भावनाएं किस तरफ बढ़ रही हैं।
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The one who understands loves who does not understand is meaningless
प्यार - फोटो : pixabay
टहनी विहीन गुलाब न बनें। टहनियों पर खिलखिलाने वाला गुलाब बनें। किसी ने पूछा प्रेम क्या है? प्रेम आस्था है। विश्वास है। बंधनों से रहित, स्वतंत्र व उन्मुक्त है। उन्मुक्त है तो प्रेम पाना नहीं, देना है। खुशी देना। खुशी का अहसास देना। लबों पर मुस्कुराहट देना। दुनिया की तमाम बंदिशों से आजादी देना। सम्मान देना और समानता देना। यही जीवन और प्रेम का सार है। गहरा दर्शन है। बाकि रोमानी अवधारणा है…. जिसने आधुनिक उपभोक्तावादी जटिल दौर में प्रेम के वास्तविक मर्म को खो दिया है। प्रेम में पाने की लालसा, देने के त्याग पर हावी हो रही है।

ऐसे में प्रेम की कला और सुखद अनूभित को बचाए रखना जरूरी है। जिसे किसी चीज का ज्ञान नहीं है, वह किसी चीज़ से प्रेम भी नहीं करता। जो कुछ कर नहीं सकता , वह कुछ समझ भी नहीं सकता। जो कुछ समझ नहीं सकता, वह व्यर्थ है। लेकिन जो समझता है वह प्रेम भी करता है। एरिक फ्रेम का प्रेम एक कला है। वो प्रेम को वैसे ही कला बताते हैं, जैसे जीना एक कला है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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