मालदीव से मिल रहे संकेत अभी भी चिंता में डालते हैं
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मालदीव के चुनाव परिणाम भारत के लिए राहत देने वाले तो हैं ,लेकिन ताजे संकेत गंभीर हैं। अभी चुनाव आयोग ने वहां नतीजों का औपचारिक ऐलान नहीं किया है। अगर एक सप्ताह में किसी ने चुनाव में गड़बड़ी की शिकायत की तो यह रोका जा सकता है। तानाशाह और हारे हुए राष्ट्रपति अब मज़हबी कार्ड खेल रहे हैं। वे इस्लामी कट्टरपंथियों की सहानुभूति बटोरने का प्रयास कर रहे हैं। इस्लामी देश को यामीन के चुनाव हारने के बाद पता लग रहा है कि वहां कुछ मूर्तियां भी हैं और मूर्ति का प्रतीक ग़ैर इस्लामी है। इसलिए वे कुल्हाड़ियों से मूर्तियां तोड़ने का निर्देश दे चुके हैं, जिससे यह आंदोलन बन जाए और जो भी इसका विरोध करे उसे इस्लाम विरोधी करार दिया जाए।
अगर चुनाव आयोग ने किसी शिकायत पर दोबारा चुनाव के निर्देश दिए तो उन्हें धार्मिक ध्रुवीकरण का फायदा मिल जाए। यह चीन की योजना हो सकती है। इसमें वह पाकिस्तान की सहायता ले सकता है। आपको याद होगा कि चुनाव पूर्व जब बीजेपी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने मालदीव में भारत को सैनिक कार्रवाई करने का बयान दिया था तो तुरन्त चीन ने गंभीर एतराज़ किया था और अपना युद्धपोत रवाना कर दिया था। इतना ही नहीं उसने पाकिस्तान से भी कहा था कि वह मालदीव की समंदर सीमा की रक्षा करे और अपनी नौसेना वहां भेजे। अब आईएसआई और पाकिस्तानी फौज़ सिंहलियों, बौद्ध और तमिल मूल के इस देश को इस्लामी पाठ पढ़ा रही है। दूसरा बयान पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद का आया था। उन्होंने चुनाव परिणामों के बाद चीन से व्यापारिक समझौतों की समीक्षा और भारत से संबंधों में सुधार की बात कही थी। इससे चीन फिर भड़क गया और उसने एक बार फिर चेतावनी दी है। तीसरा हारे हुए राष्ट्रपति यामीन इन दिनों दिन रात यह काम कर रहे हैं कि किसी भी तरह अन्य छुटभैये नेता चुनाव प्रक्रिया को चुनौती दे दें, जिससे यामीन को पद पर बने रहने अथवा नए चुनाव कराने का अवसर मिल जाए। जब ऐसा होगा तो मज़हबी ध्रुवीकरण उन्हें मदद दे सकता है। मुख्य चुनाव अधिकारी तो यामीन के समर्थक ही हैं। वे पहले के चुनाव में यामीन के चुनाव प्रचार अधिकारी रह चुके हैं। कुल मिलाकर मालदीव गृहयुद्ध के क़रीब जा रहा है।
चीन के लिए एशियाई देशों के अंदरूनी मामलों में दख़ल देने से लगा दूसरा आघात है। इससे पहले श्रीलंका में उसने महिंद्रा राजपक्षे के साथ ऐसा ही खेल खेला था लेकिन वहां भी चीन की दाल नहीं गली। महिंद्रा राजपक्षे को मैत्रीपाला सिरिसेना से हार का सामना करना पड़ा था। सिरिसेना ने पद संभालते ही हंबनटोटा हवाई अड्डे को भारत की निगरानी में संचालन के लिए सौंप दिया है। अब भारत को श्रीलंका और मालदीव की गतिविधियों पर पल पल निगरानी रखनी होगी ।