फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Teachers Day 2024: Many films have been made on teachers in Hindi English and Malayalam languages

शिक्षक दिवस विशेष: रुपहले पर्दे की दुनिया में सिनेमाई शिक्षक और किरदार

Thu, 05 Sep 2024 01:44 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Thu, 05 Sep 2024 01:44 PM IST
सार

आज शिक्षक दिवस है। भारतीय और क्षेत्रीय सिनेमा में शिक्षक को केंद्र में रखकर कई फिल्में बनी हैं। बॉलीवुड में तो कई फिल्मों के शिक्षक किरदार यादगार बन गए हैं। 

विज्ञापन
Teachers Day 2024: Many films have been made on teachers in Hindi English and Malayalam languages
शिक्षक दिवस 2024 - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

टीचर समाज का अभिन्न अंग है। जाहिर-सी बात है वह फ़िल्मों में भी है। हिन्दी, इंग्लिश, मलयालम भाषा में आपको शिक्षक को केंद्र में रख कर बनी कई फिल्में मिल जाएंगी। मलयालम भाषा में 2022 में ‘द टीचर’ नाम से बनी फिल्म है। इस फ़िल्म में अमला पॉल, चेम्बन विनोद, मंजु पिल्लाई आदि ने काम किया है।

विज्ञापन


इसी तरह हिन्दी में महेश भट्ट के निर्देशन में 1993 में ‘सर’ नाम से फ़िल्म बनी, जिसमें नसीरुद्दीन शाह ने शिक्षक की भूमिका निबाही है। साथ में अतुल अग्निहोत्री, पूजा भट्ट ने भी भूमिकाएं की हैं। इस फ़िल्म में परेश रावल एवं गुलशन ग्रोवर खलनायक के रूप में हैं। इस फ़िल्म को तेलगु में ‘गंगामास्टर’ नाम से बनाया गया।
विज्ञापन


अक्सर टीचर को लेकर बनाई गई फ़िल्मों में केंद्रीय पात्र शिक्षक होता है। यह शिक्षक परम्परागत शिक्षकों से बहुत भिन्न होता है। शिक्षक की प्रचलित छवि के अनुसार इसके हाथ में बच्चों को निरंतर सजा देने केलिए छड़ी अथवा स्केल नहीं होता है। यह गुस्सैल स्वभाव का नहीं होता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


बच्चों को बंदी बना कर रखने में विश्वास नहीं करता है और न ही प्रिंसिपल या अभिभावकों से छात्रों की शिकायत करता है। इसके विपरीत यह अपने छात्रों से नरमी से पेश आता है। बच्चों की प्रतिभा को पहचान कर उन्हें उसी दिशा में आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करता है। स्कूल/कॉलेज के गलत नियमों को तोड़ता है। उदार-प्रगतिशील मूल्यों की स्थापना करता है। जाहिर है, ऐसा टीचर मैनेजमेंट को शुरु में पसंद नहीं आता है।

वह छात्रों को प्यार करता है, अपने व्यवहार से उनका दिल जीतता है। आगे चल कर छात्र उसके लिए जरूरत पड़ने पर विद्रोह करते हैं और अंत में इस टीचर की जीत होती है, छात्रों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, आत्मविश्वास प्राप्त होता है। और मजे-मजे में फ़िल्म समाप्त होती है। ऐसा नहीं है, ऐसे शिक्षक मात्र फ़िल्मों में मिलते हैं, वास्तविक जीवन में भी ऐसे टीचर होते हैं, मगर विरले। टीचर से जुड़ी फ़िल्में अंत में दर्शक में फ़ीलगुड का भाव उत्पन्न करती हैं। कई बार ये ‘कमिंग ऑफ़ एज’ फ़िल्म की श्रेणी में आती हैं।
 

एम मोहनन की 2011 की मलयालम फ़िल्म ‘माणिक्यकल्लु’ एक ऐसी ही फ़िल्म है। इसमें एक युवा टीचर विनयचंद्रन (पृथ्वीराज सुकुमारन) एक गाँव के स्कूल में छात्रों के नजरिए में सकारात्मक परिवर्तन लाता है। दो घंटे से कुछ ऊपर की 2000 की मलयालम फ़िल्म ‘लाइफ़ इज ब्यूटीफ़ुल’ (निर्देशक फ़ैज़िल) नाजी काल की पृष्ठभूमि पर बनी त्रासद फ़िल्म ‘लाइफ़ इज ब्यूटीफ़ुल’ से बिल्कुल भिन्न है।


मलयालम फ़िल्म में पति-पत्नी विनय (मोहनलाल) एवं सिंधु (संयुक्ता वर्मा) एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। विनय एक पब्लिक स्कूल में मलयालम भाषा का टीचर बनता है और अपने छात्रों में सकारात्मक मूल्य उत्पन्न करता है। प्रियदर्शन की ‘चेपु’ भी टीचर से जुड़ी फ़िल्म है और इस 1987 की फ़िल्म में भी मोहनलाल ने टीचर का पात्र जीया है। यहाँ वे इंग्लिश टीचर की भूमिका में हैं।

आइए अब कुछ विदेशी फ़िल्मों को देखते हैं, जिनमें टीचर की महत्वपूर्ण भूमिका है।

1989 की ‘डेड पोयेट्स सोसायटी’ तथा 2003 की ‘मोना लीसा स्माइल’ दोनों में टीचर एलिट स्कूल में काम करने आए हैं। फ़र्क यह है कि ‘डेड पोयेट्स सोसायटी’ लड़कों का बोर्डिंग स्कूल वेल्टन अकादमी है और टीचर पुरुष मिस्टर कीटिंग (रॉबिन विलियम्स) है, जबकि माइक नेवेल निर्देशित फ़िल्म ‘मोना लीसा स्माइल’ में लड़कियों के वेलेस्ले कॉलेज में कैथरीनन एन वाट्सन (जूलिया रॉबर्ट्स) स्त्री टीचर है। 

दोनों शिक्षण संस्थान उच्च वर्ग के बच्चों के लिए हैं। उनके लिए टीचर कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं है। वेल्टन अकादमी का काल 1959 है। पहले दिन इंग्लैंड के कैम्ब्रिज से इंग्लिश पढ़े और वेल्टन के पूर्व छात्र मिस्टर कीटिंग के छात्र उसके पढ़ाने के गैरपरम्परागत तरीके से चकित हैं। जबकि कैथरीन को जल्द पता चलता है कि उसकी छात्राओं ने पूरी टेक्स्टबुक तथा पूरा सिलेबस कंठस्थ कर रखा है। उसके सामने चुनौती है, वह इन छात्राओं को क्या पढ़ाए? छात्राएँ जो यहाँ केवल एक सफ़ल पत्नी की भूमिका सीखने आई हैं। उनके भीतर

सदियों से स्त्री की रूढ़ भूमिका की छवि उसे तोड़नी है और बताना है कि वे न केवल मात्र लीडर की पत्नी बनने केलिए हैं, वरन वे स्वयं लीडर बनने की क्षमता रखती हैं। काल यहाँ भी 1950 के दशक का ही है।

मिस्टर कीटिंग काव्य के सहारे छात्रों में नई चेतना जगाता है, जबकि कैथरीन मॉर्डन आर्ट्स के सहारे यह काम करती है। छात्राओं को व्यक्तिगत स्वतंत्रता-आर्थिक स्वावलंबन से परिचित कराती है। दोनों टीचर को फ़िल्म के मध्य में मैनेजमेंट के कोप का सामना करना पड़ता है, अंतत: वे छात्रों के चहेते और एक सफ़ल टीचर की ऊंचाई पाते हैं।

इनसे हटकर है, 1994 की दो घंटे से कुछ ऊपर की फ़िल्म ‘रेनेसाँ मैन’। यह कॉमेडी-ड्रामा फ़िल्म पेनी मार्शल द्वारा निर्देशित है। बिल रैगो (डैनी डेविटो) तलाकशुदा असफ़ल व्यापारी है। वह विज्ञापन जगत में विफ़ल रहा है, तभी उसे सेना द्वारा नए रंगरूटों को प्रशिक्षण केलिए रखा जाता है। उसे आठ छात्र सौंपे जाते हैं, जिनका व्यवहार उसे ठीक करना है।

उसे प्रशिक्षण देने का कोई अनुभव नहीं है। इन अनुशासनहीन लोगों को वश में करना सरल नहीं है। परेशान हो कर वह उन्हें शेक्सपीयर का ‘हेमलेट’ पढ़ाना शुरु कर देता है, और धीरे-धीरे चमत्कार होता है। फ़िल्म को प्रशंसा के साथ आलोचना झेलनी पड़ी।

टीचर का काम बहुत चुनौती भरा और जटिल काम है। यह नैसर्गिक प्रतिभा का मामला भी है। टीचर प्रशिक्षित हो अथवा नहीं मगर एक सफ़ल शिक्षक केलिए मानवीय गुणों यथा संवेदनशीलता, धैर्य, अपनी विशेषताओं के साथ अपनी सीमाओं का ज्ञान होना आवश्यक है। एक कुशल टीचर को अपने छात्रों की संभावनाओं को पहचानता है, उसी दिशा में छात्रों को विकसित होने का अवसर देता है। एक विशिष्ट टीचर अपने छात्र की न्यूनता को उसके गुण में परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। उपरोक्त फ़िल्में और इस तरह की शिक्षक केंद्रित अन्य फ़िल्में यह दिखाती हैं।

जरूरी नहीं, जो किसी संस्थान में शिक्षण करे वही आपका शिक्षक हो। शिक्षक कोई पेशेवर अथवा गैरपेशेवर व्यक्ति हो सकता है। कई बार गैरपेशेवर व्यक्ति अधिक कुशल शिक्षक होते हैं। यहीं यह भी बताती चलूँ कि शिक्षक और गुरु दो बिल्कुल भिन्न पद हैं। प्रत्येक शिक्षक गुरु पद को सुशोभित नहीं करता है। गुरु विरले होते हैं।



शिक्षक दिवस पर इस पेशे से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को बधाई!

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed