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शिक्षक दिवस विशेष: जीवन के हर आयाम को शिक्षण से जोड़ते थे डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन्

Thu, 05 Sep 2024 01:40 PM IST
Mohan singh मोहन सिंह
Updated Thu, 05 Sep 2024 01:40 PM IST
सार

राधाकृष्णन एक सफल राजनेता एक कुशल राजनयिक और उत्कृष्ट वक वक्ता तो थे ही। पर इन सबसे ऊपर वे एक उच्चकोटि के शिक्षक थे । एक शिक्षक के रूप  उन्होंने अपने जीवन के बहुमूल्य चालीस साल बिताए।

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teachers day 2024 life of dr sarvepalli radhakrishnan interesting facts and history
स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी के शिक्षा सम्बन्धी विचारों से प्रेरणा ग्रहण करते  हुए राधाकृष्णन ने अपने शिक्षा दर्शन को विकसित किया है। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सर्वपल्ली राधाकृष्णन् की चालीस साल के बाद अपने शैक्षिक अनुभव के आधार  पर शिक्षा के बारे में  यह  टिप्पणी आज भी हमारे शिक्षण संस्थानों के लिए एक सबक की तरह है। खासतौर से सूचना क्रांति के  इस दौर में जब -सूचनाओं और  डाटा का अधिक से अधिक संग्रह और और उसका विश्लेषण करना हमारे योग्यता का पैमाना हो गया है। भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा, ज्ञान और विद्या अलग-अलग विधाएं रही हैं।

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शिक्षा का प्रयोजन उन विधाओं को खोजने से हैं- जो ज्ञान तक पहुंचाने की हमारी यात्रा में सहयोग करें। विद्या का सम्बन्ध -परा और अपरा विद्या से है अर्थात् सांसारिक और पारलौकिक विद्या से।

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इसी अर्थ में विद्या को- ' या विद्या सा विमुक्तये ' कहा गया है। मतलब वह विद्या जो हमें सांसारिक प्रपंच क्रोध, लोभ, द्वेष और  घृणा से मुक्त कर पारलौकिक सत्ता से हमारा संबंध स्थापित करने में मदद करें। इसलिए हमारे शास्त्रों में कहा गया है - ' विघा गुरुणां गुरु:'। 'गु' का अर्थ है अंधकार और 'रू' का अर्थ है दूर करना। अंधकार सिर्फ बौद्धिक अज्ञानता का ही नहीं होता, बल्कि आध्यात्मिक अज्ञानता का भी होता है और जो आध्यात्मिक अज्ञानता को दूर करने में सक्षम हो, उसे गुरु  कहा  जाता है। एक गुरु का परम कर्तव्य है कि वह अपने शिष्यों में  छिपी  प्रतिभा, कौशल और  योग्यता को उद्घाटित करें, उसे  निखार और संवार दें।

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जीवन का आयाम और राधाकृष्णन 

स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी के शिक्षा सम्बन्धी विचारों से प्रेरणा ग्रहण करते  हुए राधाकृष्णन ने अपने शिक्षा दर्शन को विकसित किया है। महात्मा गांधी के अनुसार हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए  जिसमें 'हेड' 'हार्ट' एंड  'हैंड' अर्थात् मस्तिष्क हृदय और हाथ का समुचित उपयोग हो। मतलब यह कि शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान, विवेक और कौशल को विकसित करना होना चाहिए। ज्ञान जब सघन होता है, तो विवेक में बदल जाता है।


राधाकृष्णन की तरह शिक्षा  पर विचार करते हुए आध्यात्मिक विचारक जे_ कृष्णमूर्ति कहते हैं कि-

"शिक्षा के उद्देश्य जब बड़े हो जाएंगे, तो बेरोजगारी भ्रष्टाचार अराजकता जैसी समस्याएं  स्वत: खत्म होने लगेंगी, क्यों कि बड़ी सोच वाले नागरिक खुद इनके निदान के लिए आगे आने लगेंगे।" ऐसे नागरिक को तैयार करने के लिए एक शिक्षक को कैसा होना चाहिए?
 

राधाकृष्णन कहते हैं कि- वह जिस विषय को पढ़ाता है, उसमें तो उसे महारत हासिल होनी ही चाहिए, अपने विषय में हो रहे नए अनुसंधान और विमर्शों से भी उसे जुड़े रहना चाहिए। ताकि वह ज्ञान की खोज यात्रा का सहयात्री बन सके। एक अच्छा शिक्षक वह होता है जो अपने विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार कर सकें।


आचार्य पतंजलि ने विद्या को तब तक उपयोगी नहीं माना है जब तक वह चार प्रक्रियाओं अर्थात् अध्ययन, मनन, प्रवचन और प्रयोग की कसौटी पर खरा न उतरें। इस प्रसंग में आचार्य विद्यानिवास मिश्र का यह कहना सर्वथा उचित प्रतीत होता है कि "शिक्षा केवल अक्षर की ही नहीं होती, हर एक कौशल की, हर एक कला की होती है और सिखाने वाला जरूरी नहीं केवल साक्षर व्यक्ति ही हों। इसी अर्थ में भारतीय शिक्षा प्रणाली गुरु को ही एक संस्था मानती है।"

teachers day 2024 life of dr sarvepalli radhakrishnan interesting facts and history
दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में राधाकृष्णन ने स्वामी विवेकानंद के बाद पश्चिम और पूर्व के बीच एक सेतु का काम किया। - फोटो : अमर उजाला, ग्राफिक

एक सफल राजनेता एक कुशल राजनयिक

राधाकृष्णन एक सफल राजनेता एक कुशल राजनयिक और उत्कृष्ट वक वक्ता तो थे ही। पर इन सबसे ऊपर वे एक उच्चकोटि के शिक्षक थे । एक शिक्षक के रूप  उन्होंने अपने जीवन के बहुमूल्य चालीस साल बिताए। एक शिक्षक बतौर वे अपनी कक्षाओं में  बीस देर से और दस मिनट पहले अपनी कक्षा छोड़ दिया करते थे। वे भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति तो थे ही। पर उनकी वक्तृत्व क्षमता इतनी ओजस्वी और प्रभावी थी कि जवाहरलाल नेहरू की यह दिली ख्वाहिश थी कि भारत की आजादी के अवसर पर रात्रि 12:00 बजे के पहले वे भारत की जनता को संबोधित करें।
 

15 अगस्त सन् 1947 को  रात्रि के ठीक  12:00 बजे का समय जवाहरलाल नेहरू को देश के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेना था। इसलिए राधाकृष्णन को पहले ही यह बता दिया गया था कि वे अपना भाषण रात्रि 12:00 बजे के पहले खत्म कर दें। यह बात राधाकृष्णन और जवाहरलाल नेहरू के अलावा किसी अन्य को नहीं मालूम था। एक राजनेता के बजाय राधाकृष्णन हमेशा एक शिक्षक ही बने  रहना चाहते थे।उनकी यह भी इच्छा थी कि उनका जन्मदिन 'शिक्षक दिवस' के रूप में ही मनाया जाए, इसलिए भारत सरकार द्धारा सन् 1962 से उनका जन्मदिन 5 सितंबर इसी रूप में मनाया जाता है।


राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर सन्  1888 को आंध्रप्रदेश के तिरूतनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सन् 1960 तक यह गांव आंध्रप्रदेश का हिस्सा रहा। और इसके बाद तमिलनाडु प्रांत में शामिल हुआ। राधाकृष्णन की वक्तृत्व क्षमता से प्रभावित होकर इंग्लैंड के एच एन स्पाल्डिंग ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सन् 1936 में 'इस्टर्न रिलिजन एंड एथिक्स' का चेयर की स्थापित किया।

दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में राधाकृष्णन ने स्वामी विवेकानंद के बाद पश्चिम और पूर्व के बीच एक सेतु का काम किया। दर्शनशास्त्र पर उनकी कई महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं- जिनमें कुछ के नाम हैं -हिस्ट्री ऑफ इंडियन फिलासफी, इस्टर्न रिलिजन एंड वेस्टर्न थॉट, आइडियलिस्टिक व्यू ऑफ़ लाइफ, हिंदू व्यू ऑफ़ लाइफ, माय सर्च फॉर ट्रुथ और कालकी।
 

अपनी पुस्तक 'कालकी ' में वे आधुनिक युग के बारे में कहते है कि -

"यह आध्यात्मिक खोखलापन नैतिक भ्रामकता और सामाजिक अराजकता का युग है। आर्थिक और बौद्धिक नृशंसता का युग है।" अपने देशमें आजादी के बाद सत्ता परिवर्तन के लिए तो कई आंदोलन हुए। पर  गांधी और विनोबा के बाद कोई बड़ा आध्यात्मिक आंदोलन इस देश में खड़ा नहीं हो पाया। नब्बे के दशक के बाद नयी अर्थव्यवस्था के दौर में हमारे नैतिक मूल्यों का  जीवन के हर क्षेत्र में जिस तरह से क्षरण हुआ है, उसकी कोई मिसाल नहीं है। इसलिए राधाकृष्ण का यह कहना  कि। - "आध्यात्मिक आकांक्षाओं की उपेक्षा हम बहुत दिनों तक नहीं  कर सकते, क्योंकि वर्तमान व्याधि और अराजकता की स्थिति बहुत दिन तक टिक नहीं सकती।" 


समकालीन भारतीय दार्शनिक के रूप में राधाकृष्णन की पहचान 'धार्मिक आध्यात्मवादी' के  रूप में किया जाता है। भौतिकवादियों की आलोचना करते हुए वे अपने धार्मिक आध्यात्मवाद की प्रतिष्ठा करते हैं। उनका मानना है कि नीति, प्रेरणा, परोपकार, दया और करुणा जैसे  नैतिक मूल्य अध्यात्मिकता से संबद्ध आकांक्षाएं हैं। भौतिक संसाधनों से  तो  इन्हें विकसित नहीं किया जा सकता। भौतिकवादी अनुभवातीत स्रोतों से प्राप्त होने वाले मानवतावाद को ही स्वीकार नहीं करते हैं। इस अर्थ में मानवतावाद जिस सत् की  अवमानना करता है, वह जीवन का आधारभूत सत्य है।

धर्म और नीति का संबंध भी उससे है। राधा कृष्ण का  मानना है कि-"जिन मूल्यों को मानवतावाद स्वीकार करता है, उन्हें अतीन्द्रिय  सत्  से सम्बद्ध  करने का कार्य धर्म का है , तभी ये मूल्य हमारे जीवन में सार्थक हो सकेंगे और तभी हमारी आस्था सबल और स्थायी हो सकेगी। बिना निष्ठा का कोई काम संपन्न नहीं होता और निष्ठा का अंतिम स्रोत 'अध्यात्म' ही है। ज्यादातर पाश्चात्य दार्शनिक  विश्व की व्याख्या करते हुए भौतिकवाद की तरफ ही आकर्षित हुए हैं। राधाकृष्णन  'वर्तमान धर्म संकट' नामक अपने एक लेख में बर्ट्रेंड रसेल के हवाले से बताते हैं कि-

प्रो जी ई मूर अपने एक लेख में लिखते है कि

-आरंभ में पदार्थ ही था, पदार्थ से शैतान पैदा हुआ और शैतान ने ईश्वर को जन्म दिया। और ईश्वर मर गया; उसके बाद शैतान मरा और फिर पदार्थ ही शेष रह गया। इस पदार्थ का अस्तित्व सर्वत्र इतना व्यापक हो गया कि जर्मन दार्शनिक नीत्शे ने बहुत पहले ही घोषणा कर दी थी कि 'ईश्वर मर चुका है।' पाश्चात्य दर्शन में भौतिक पदार्थों की सत्ता लगभग सर्वमान्य है। जबकि भारतीय दर्शन में धरती पर मनुष्य की सत्ता से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। महाभारत के एक  श्लोक में कहा गया है कि-  'न मानुषात्  श्रेष्ठतरं हि किंचित्'  भारतीय ज्ञान परंपरा में हम प्रश्न और उत्तर के द्वारा किसी समाधान तक पहुंचाते हैं। पर यह समाधान भी कोई अंतिम समाधान नहीं होता। इसमें नित्य परिष्कार की संभावना  सदा बनी रहती है।


अपने अध्ययन के दौरान राधाकृष्णन को यह एहसास हुआ कि कुछ  ईसाई संस्थाएं हिंदू धर्म को हेय  दृष्टि से दखती हैं। इस आरोप को खारिज करते हुए राधाकृष्णन कहते हैं कि - "भारतीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा धर्म, ज्ञान और सत्य पर आधारित है। सभी धर्मों के प्रति सम्मान का भाव हिंदू संस्कृति की विशेषता रही है। यह विश्व एक विद्यालय है इस  विद्यालय  में शिक्षा के द्वारा मानव मस्तिष्क का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस तरह मानवीय सभ्यता का विकास होते हुए देखना चाहते हैं और उसमें  अपनी कल्याणकारी भूमिका कैसे निभाते है। मात्र  उपदेश देने से ही हमारे कर्तव्यों की इति श्री  नहीं हो  जाती है।

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि-

पर उपदेश कुशल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घने रे।।  
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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