पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने कहा- सिर्फ बातें ही न करो, सजग भी रहो
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ग्रेटा थनबर्ग ने पर्यावरण को बचाने और उसको पुन: स्वच्छ व मानव हितैषी बनाने के लिए ऐसा सशक्त अभियान चलाया है कि उसकी बात अब संयुक्त राष्ट्र (यूएन) तक पहुंच गई है और अब इस संस्था ने उसकी पुरजोर आवाज को विश्व तक पहुंचाने के लिए अपने यहां आमंत्रित किया है। जिससे कि विश्व के अनेक देशों तक उसकी बात पहुंचे और वह अपने यहां पर्यावरण की सुरक्षा तथा उसे बचाने के लिए जुट जाएं।
ग्रेटा थनबर्ग स्वीडन की एक किशोरी है और उसने जब बड़ों तक अपनी चिंता पहुंचाने का प्रयास किया तब वह विश्व भर में चर्चित हो गई। उसने अपनी बात के लिए कुछ इस तरह के शब्द और भाषा का प्रयोग किया कि अनायास ही सबका ध्यान उसकी कहीं हुई बातों पर चला गया। ग्रेटा ने कहा- "पर्यावरण की समस्या पर गंभीरता से कुछ करिए। केवल उस पर बातें ही न करें।" दरअसल ग्रेटा का मतलब यह था कि पर्यावरण को लेकर केवल चर्चाएं करने से कुछ नहीं होगा। इसके लिए जमीनी तौर से जुड़कर कुछ करना होगा।
ग्रेटा ने कहा- "जागो और कुछ करो।" ग्रेटा ने अपनी देश की संसद के बाहर प्रोटेस्ट किया और वहां एक साइन बोर्ड लगाया जिस पर लिखा था- "स्कूल स्ट्राइक फॉर क्लाइमेट चेंज"। उसके इस संदेश ने उसके देश समेत अन्य देशों के किशोरों व युवाओं में हलचल मचा दी। उसके इस प्रयास की जबरदस्त प्रतिक्रिया हुईं और अन्य देशों के किशोरों व युवाओं ने उसे कई संदेश भेजे और कहा कि वह उसके पर्यावरण को बचाने के अभियान से जुड़ना चाहते हैं।
उसने कहा- वैज्ञानिक चिंतकों की बातों को सुनो। विज्ञान की इन बातों का साथ दो, उनके पीछे खड़े हो जाओ और तब वास्तविक तथा व्यवहारिक स्तर पर एक्शन लो।" आज अमेरिका में एक तिहाई किशोर पर्यावरण की सुरक्षा में जुटे हैं और ऋतु परिवर्तन की चिंता तथा उसके लिए पर्यावरण की सुरक्षा में जुटे हैं और इसके लिए इसमें सक्रियता से भाग ले रहे हैं। पर्यावरण चिंतकों का मानना है कि वर्तमान पीढ़ी पर्यावरण की सुरक्षा के लिए बहुत सजग है और वह समझती है कि उनके जीवन पर ऋतु परिवर्तन से कैसे और कितना प्रभाव पड़ेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए यह कितना खतरनाक हो सकता है।
इसके लिए हमारी कई पूर्व पीढ़ियां भी जिम्मेदार हैं जिन्होंने बिना सोचे-समझे पर्यावरण का भरपूर दोहन किया और यह तक नहीं सोचा कि हमारी पीढ़ी के किशोरों और युवाओं के लिए इस तरह का पर्यावरण कितना नुकसानदेह साबित हो सकता है। यूएन सेक्रेटरी जनरल की पर्यावरण एक्शन कमेटी की समिट पर आने वाले देश तथा इसमें भाग लेने वाले देशों के प्रतिनिधियों से यह कहना है कि "डोन्ट प्रिंट अ स्पीच, प्रिंट अ प्लान।" यहीं ग्रेटा थनबर्ग का कहना है।
पर्यावरण के लिए हमारे देश में भी बहुत चिंता है और ऐसी कई संस्थाएं और समूह है जो पर्यावरण पर सिर्फ बातें ही नहीं करते या संगोष्ठियां ही नहीं करते बल्कि जमीनी स्तर पर भी कार्य करते हैं। युवाओं के कई समूह अपने-अपने शहरों में पर्यावरण के लिए सजग हो रहे हैं। 15 अगस्त को जब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने प्लास्टिक मुक्त पर्यावरण की बात कही तो एक जागरुकता की लहर तो उठी है।
पर, पर्यावरण की सुरक्षा यूं ही नहीं हो जाएगी। प्लास्टिक थैलियों (तय मानक से कम) की फैक्टरियां उत्पादन करती जा रहीं हैं। अभी भी लोग घर से कपड़े की थैलियां बाजार लेकर जाते हैं। अभी भी फोल्डर्स और अन्य उपहारों में प्लास्टिक अपनी पूरी बुराई के साथ मौजूद है। अभी भी कार्यालयों तथा अन्य किसी कार्यक्रम की मीटिंग्स में प्लास्टिक की बोतलों में पीने का पानी रखा जाता है।
इंदौर के स्कूलों में यह घोषणा हुई कि 2 अक्टूबर से वहां प्लास्टिक मुक्त व्यवस्था रहेगी। यहां यह पूछा जाना चाहिए कि स्कूल की प्रत्येक छात्र की तीन या चार नोटबुक्स और बुक्स पर जो प्लास्टिक कवर्स चढ़ाए जाते हैं वह पर्यावरण को हानि नहीं पहुंचाते क्या तथा यह प्लास्टिक मुक्त पर्यावरण के अभियान के प्रतिकूल नहीं है?
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।