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कोरोना से जंग: स्वीडन में शासन से ज़्यादा अनुशासन से हो रहा फायदा

Tue, 05 May 2020 06:00 PM IST
Priyamvada Sahay प्रियंवदा सहाय
Updated Tue, 05 May 2020 06:00 PM IST
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Swedish lifestyle and self discipline is helping to fight against corona virus
कोरोना से लड़ने में स्वीडिश लोगों का अनुशासन आ रहा काम। - फोटो : Social Media

शासन और अनुशासन में फ़र्क़ होता है  देश को विकास के मार्ग पर ले जाने के लिए जनप्रतिनिधियों के ज़रिए संवैधानिक शक्तियों का उपयोग कर नीतियांं लागू कराना ही शासन है। विश्व बैंक के मुताबिक़ समाज की समस्याओं और मामलों के प्रबंधन के लिए राजनीतिक अधिकार और संस्थागत संसाधनों का इस्तेमाल किया जाना शासन है जबकि अनुशासन का मतलब ख़ुद पर शासन करना और उसके अनुसार अपने जीवन को चलाना है।

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मानव जीवन में अनुशासन का महत्व सबसे ज़्यादा है। अनुशासन ही मनुष्य को सफल और विजयी बनाता है। यह बातें नई नहीं है लेकिन इसकी प्रमाणिकता को स्वीडन के मौजूदा माहौल से जोड़कर देखा जा सकता है जहां की आबादी का बड़ा हिस्सा अनुशासित रहने का हरसंभव प्रयास करती है। अनुशासन ही उनके जीवन को दूसरे देशों से अलग पहचान दे रहा है।
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कोरोना से जंग में दुनिया भर में लाखों जानें जा चुकी है। इसकी रोकथाम की ज़िम्मेदारी चुनी हुई सरकारों की शासन व्यवस्था पर आ टिकी है लेकिन स्वीडन इस मामले में अन्य देशों से थोड़ा अलग इस तरह है कि यहांं शासन से ज़्यादा अनुशासन व्यवस्था पर ज़ोर दिया गया है। लोगों को यह ज़िम्मेदारी सौंपी गई है कि वे खुद के साथ देश के दूसरे नागरिकों के स्वास्थ्य का भी पूरा ख़्याल रखें।
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यह उनकी ज़िम्मेदारी है कि कोरोना नहीं फैले और शासन व्यवस्था की ज़िम्मेदारी है कि वो जनता के अभियान को सफल बनाने के लिए अपने स्तर पर कदम उठाए। लेकिन ये कदम वो हैं जिससे आम जनता ख़ुद को बाधित महसूस नहीं करें और रोज़मर्रा के कामकाज को निपटाते हुए उसे हमेशा अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास रहे।
 

Swedish lifestyle and self discipline is helping to fight against corona virus
यही अनुशासन यहांं की सरकार और जनता को एक-दूसरे में भरोसा दिलाती है। - फोटो : ट्विटर

यही अनुशासन यहांं की सरकार और जनता को एक-दूसरे में भरोसा दिलाती है। और इस भरोसे की बदौलत स्वीडन हालात को क़ाबू में करने की उम्मीद लगाए बैठा है। मुमकिन है कि कोरोना से मुक्ति के लिए वैक्सीन तैयार होने में साल दो साल या उससे भी ज़्यादा समय लग जाए। तब किसी भी देश में जनता का अनुशासन ही सही मायने में जीवनरक्षक का काम करेगा। यह समाज और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए सरकार की पाबंदी से ज़्यादा कारगर उपाय है।

यहांं कोरोना के कारण लॉकडाउन नहीं है। देश के अंदर परिवहन व्यवस्था बंद नहीं है। कुछ को सीमित ज़रूर किया गया है। शुरू में बस व मेट्रो का परिचालन सीमित किया गया लेकिन यह महसूस किया गया कि इस तरह आमजनता को नहीं चाहते हुए भी अनुशासन तोड़ना पड़ सकता है, इसलिए जल्द ही बस व मेट्रो पुराने अंतराल पर दौड़ने लगी। जनता को यह याद दिलाया गया कि यह आपकी ज़रूरत के लिए है, इसलिए अनुशासित रहकर ज़िम्मेदारी के साथ इसका उपयोग करें।

स्टॉकहोम में बसों व सार्वजनिक स्थलों पर जनता के ध्यानाकर्षण के लिए पोस्टर लगाए गए कि आपकी सुविधा के लिए परिचालन बाधित नहीं किया जा रहा, लेकिन आप बसों में चढ़ने से पहले दो बार यह ज़रूर सोचें कि क्या आपका इसमें चढ़ना वाक़ई ज़रूरी है। यानी यह व्यवस्था ज़रूरतमंदों के लिए रहने दें। लोगों के बीच यह बात घर कर गई। देखते ही देखते बसों और मेट्रो में सफ़र करने वालों की संख्या कम होती चली गई। इसी तरह सार्वजनिक स्थलों, रेस्तराँ, कैफ़े व बार में भी आने वालों की संख्या में गिरावट आई है।

बुजुर्गों और अस्वस्थ लोगों को घर में रहने की सलाह दी गई। लेकिन उनपर पूरी तरह पाबंदी नहीं लगाई गई है यही अनुशासन यहांं की सरकार और जनता को एक-दूसरे में भरोसा दिलाती है। बल्कि यह अनुरोध किया गया कि ऐसा करके वे अपने साथ दूसरों की जान बचाने में भी मददगार साबित हो सकते हैं। धीरे-धीरे इस बात का असर भी हुआ। बुजुर्ग अपने ज़रूरत के लिहाज़ से बाहर तो निकलते हैं लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग को भूलते नहीं। यह अलग बात है कि उनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण कोरोना का सबसे ज़्यादा प्रभाव और उससे सर्वाधिक मौत बुजुर्गों की हो रही है।जिसे रोकने में यहाँ की नीतियाँ कारगर साबित नहीं हो रही।

ठंडे प्रदेशों में गर्मी के दिनों का महत्व मैं तब पूरी ईमानदारी से समझ पाई जब मैंने यहांं की सर्दी के मौसम को देखा और महसूस किया। शरीर के लिए सूरज की रोशनी कितनी लाभदायी है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। विटामिन डी से लेकर कैंसर तक के इलाज में सूर्य की किरणों का महत्व अतुलनीय है। लेकिन यह आप में ऊर्जा का संचार करने और प्राकृतिक आपदाओं से लड़ने में मददगार भी तो होता है।

अब किसी ऐसे देश जहां सूरज की गर्मी महज़ पाँच-छह महीनें ही महसूस की जाए, वहाँ के लिए तो इन महीनों का महत्व बढ़ जाना स्वभाविक है। स्वीडन भी एक ऐसा ही देश है जहां जनता गर्मी के दिनों को घर में दुबक कर गँवाना नहीं चाहती। वो इन्हीं महीनों में सूर्य की गर्मी से होने वाले फ़ायदों को उठाने में व्यस्त रहती है। लेकिन इस बार की गर्मी अलग है।

Swedish lifestyle and self discipline is helping to fight against corona virus
बुजुर्गों और अस्वस्थ लोगों को घर में रहने की सलाह दी गई। लेकिन उनपर पूरी तरह पाबंदी नहीं लगाई गई है। - फोटो : पीटीआई

कोरोना से चारों ओर तबाही का मंजर है। इसलिए गर्मी के दिनों को धूमधाम से उत्सव की तरह नहीं मना सकते। लेकिन पचास से कम लोगों को एक साथ सोशल डिस्टेंसिंग के साथ इसे मनाने के लिए किसी ने नहीं रोका है। यानी लोग सार्वजनिक जगहों, समुद्र के किनारे, पार्क या जंगलों के बीच बैठेंगे तो ज़रूर पर एक दूसरे से निश्चित दूरी का ख़्याल रखकर।

यह सुनने में भले ही अटपटा है कि दुनिया के ज़्यादातर देश कोरोना से लड़ने के लिए लॉकडाउन का विकल्प चुने हुए हैं वहीं स्वीडन सोशल डिस्टेंसिंग के बूते ही आगे बढ़ रहा है। लोगों में अनुशासन और इस अनुशासन में सरकारी एजेंसियों का विश्वास है कि यहाँ ज़िंदगी की रफ़्तार पर पूरी तरह ब्रेक नहीं लग पाया है।

अनुशासन और विश्वास के भरोसे ही यहाँ की पब्लिक हेल्थ एजेंसी अभी फ़्रंट फुट पर खेल रही है। बेशक यहाँ कोरोना से मरने वालों की संख्या पड़ोसी देशों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है लेकिन जनता में अनुशासन और दूरगामी नीतियों की बदौलत स्वीडन को कोरोना काल से उबरने का भरोसा है। यह उम्मीद भी है कि स्वीडन को कोरोना से इटली और स्पेन जितनी क्षति नहीं होगी। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

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