स्वाति मालीवाल और स्त्री देह पर राजनीति: सियासी दलों की खामोशी बहुत कुछ कह रही है..!
सच तो यह है कि राजनीतिक दलों ने महिलाओं को तमाशा बना दिया है। न उनमें महिलाओं के प्रति सम्मान है न दुष्कर्म के खिलाफ गुस्सा। राजनेता ऐसे मामलों में सेलेक्टिव हो जाते हैं। भाजपा शासित राज्यों में दुष्कर्म होता है तो विपक्ष में जोश आ जाता है। वे सबसे बड़े महिला हितैषी हो जाते हैं। लेकिन जब विपक्ष शासित राज्यों में दुष्कर्म होता है तो तो उन्हें सांप सूंघ जाता है।
सच तो यह है कि राजनीतिक दलों ने महिलाओं को तमाशा बना दिया है। न उनमें महिलाओं के प्रति सम्मान है न दुष्कर्म के खिलाफ गुस्सा। राजनेता ऐसे मामलों में सेलेक्टिव हो जाते हैं। भाजपा शासित राज्यों में दुष्कर्म होता है तो विपक्ष में जोश आ जाता है। वे सबसे बड़े महिला हितैषी हो जाते हैं। लेकिन जब विपक्ष शासित राज्यों में दुष्कर्म होता है तो तो उन्हें सांप सूंघ जाता है।
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राजनीतिक दलों ने समाज को तो बांट ही दिया है, महिलाओं से दुर्व्यवहार और दुष्कर्म जैसी घटनाओं को भी वोट के तराजू में तौलने से वे बाज नहीं आते। ताजा उदाहरण स्वाति मालीवाल का है। वे दिल्ली महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष और आम आदमी पार्टी की राज्यसभा सदस्य हैं। आप की फाउंडर सदस्य हैं। जब अरविंद एनजीओ चलाया करते थे तब से वे उनके साथ हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री के आवास में उनकी पिटाई और दुर्व्यवहार का मामला अब पुलिस तक पहुंच गया है। पिटाई का आरोप मुख्यमंत्री के निजी सहायक विभव कुमार पर है। केजरीवाल दुनिया जहान की बारे में बोल रहे हैं, लेकिन पिटाई मामले पर मौन ओढ़ रखी है। आरोप है कि केजरीवाल के कहने पर पिटाई हुई।
इधर पूरा इंडी गठबंधन इस पर चुप है। केजरीवाल के साथ है। यह अकेला मामला नहीं है। इसके पहले पश्चिम बंगाल के संदेशखाली दुष्कर्म कांड पर भी इंडी गठबंधन इसी तरह चुप था। वहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केजरीवाल की ही तरह खामोश थीं। महिला नेत्री सोनिया गांधी और 'लड़की हूं लड़ सकती हूं' का नारा बुलंद करने वाली प्रियंका गांधी ने भी कुछ बोलना मुनासिब नहीं समझा। लेकिन ठीक इसके उलट महिला पहलवान यौन उत्पीडन कांड पर वे खूब मुखर रहीं। पूरा विपक्ष पहलवानों के साथ खड़ा नजर आया जबकि भाजपा इस मामले पर चुप रही। दूसरी ओर भाजपा संदेशखाली और स्वाति मामले पर खूब मुखर है।
सच तो यह है कि राजनीतिक दलों ने महिलाओं को तमाशा बना दिया है। न उनमें महिलाओं के प्रति सम्मान है न दुष्कर्म के खिलाफ गुस्सा। राजनेता ऐसे मामलों में सेलेक्टिव हो जाते हैं। भाजपा शासित राज्यों में दुष्कर्म होता है तो विपक्ष में जोश आ जाता है। वे सबसे बड़े महिला हितैषी हो जाते हैं। लेकिन जब विपक्ष शासित राज्यों में दुष्कर्म होता है तो तो उन्हें सांप सूंघ जाता है।
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दरअसल, वे घटना को ही झुठलाने में लग जाते हैं। ठीक ऐसा ही सत्ता पक्ष भी करता है। उनके राज्यों में दुष्कर्म होता है तो वे लीपापोती में जुट जाते हैं। महिला नेत्रियां चुप हो जाती हैं। लेकिन विपक्ष शासित राज्यों में उनकी सक्रियता देखने लायक होती है। यानी अपना दुष्कर्मी राजा बेटा और दूसरे का दुष्कर्मी हैवान! यह कैसी सोच है, कैसी मानसिकता है? मजे की बात यह है कि इसमें महिलाएं भी इस्तेमाल होती हैं। महिला के खिलाफ महिला को ही खड़ा कर दिया जाता है। महिला राजनेताओं को दुष्कर्मी के पक्ष में खड़ा होने में रत्ती भर भी शर्म महसूस नहीं होती।
इसके साथ ही एक और पहलू भी जुड़ा है। जो महिला नेत्रियां पार्टी के इशारे पर निसंकोच दुष्कर्म को झुठलाने की कोशिश करती हैं उनका अपनी पार्टियों में भी बड़े नेताओं द्वारा यौन शोषण होता है। यह बहुत आम बात है। ऐसे ढेरों प्रसंग सार्वजनिक भी हुए हैं। और यह आज से नहीं आजादी के पहले से होता चला आ रहा है। सभी नेत्रियों के साथ ऐसा होता है, यह नहीं कहा जा सकता, लेकिन शिकार होनेवाली नेत्रियों की अच्छी खासी संख्या है। कोई पार्टी इसका अपवाद नहीं है। कई महिलाओं ने तो इसकी वजह से राजनीति छोड़ना श्रेयकर समझा।
महिलाओं को दलीय दायरे से ऊपर उठकर यह समझना होगा कि पुरुषवादी मानसिकता उनका इस्तेमाल कर रही है। ऐसे मामलों में सभी राजनेत्रियों और महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं को एकजुट होकर हल्ला बोलना होगा, तभी आपकी प्रतिष्ठा बचेगी। स्वाति मालीवाल केस ने एक मौका दिया है, महिला नेत्रियों को अपनी अस्मिता के लिए उठ खड़े होने का। क्या वे यह चुनौती स्वीकार करेंगी? क्या उनका स्वाभिमान उन्हें ललकारेगा?
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।