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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Supreme Court’s AI Draft Rules 2026: A New Era for India’s Judicial System

न्यायपालिका में एआई युग का आगमन, क्या AI बनेगा नया न्यायाधीश ?

Wed, 17 Jun 2026 06:37 PM IST
Eklavya gaba एकलव्य गाबा
Updated Wed, 17 Jun 2026 06:37 PM IST
सार

न्यायपालिका को आधुनिक बनाने और लंबित मामलों के भारी बोझ को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 3 जून को 'अदालतों में एआई के इस्तेमाल के लिए ड्राफ्ट नियम, 2026' जारी किए। इसमें पारंपरिक न्यायिक कार्यों के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को सही ढंग से जोड़ने के लिए एक व्यवस्थित प्रणाली शुरू की गई है।

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Supreme Court’s AI Draft Rules 2026: A New Era for India’s Judicial System
न्यायपालिका में एआई - फोटो : Ai

विस्तार

हाल ही में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भारत के न्यायिक इतिहास में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। न्यायपालिका को आधुनिक बनाने और लंबित मामलों के भारी बोझ को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 3 जून को 'अदालतों में एआई के इस्तेमाल के लिए ड्राफ्ट नियम, 2026' जारी किए। इसमें पारंपरिक न्यायिक कार्यों के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को सही ढंग से जोड़ने के लिए एक व्यवस्थित प्रणाली शुरू की गई है। ये ड्राफ्ट नियम अभी 20 जून तक जनता एवं वकीलों और जजों जैसे संबंधित लोगों की राय जानने के लिए खुले हैं। 

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आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के प्रयोग को बढ़ावा
 

इन नियमों का मूल आधार मानव विवेक की श्रेष्ठता को बनाए रखते हुए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के प्रयोग को बढ़ावा देना है। इन नियमों में एआई को केवल एक सहायक उपकरण के तौर पर परिभाषित किया गया है जो इंसानी न्यायिक बुद्धि की जगह नहीं ले सकता। अगर एआई से कोई गलती होती है, तो न्यायिक अधिकारी अपनी गलतियों के लिए एआई को जिम्मेदार ठहराकर अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकते।

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भाषा अनुवाद में होगा एआई का इस्तेमाल 
 

कामकाज की क्षमता बढ़ाने के लिए ये नियम प्रशासनिक कार्यों जैसे केस की कानूनी रिसर्च, साइटेशन की जांच और रियल-टाइम स्पीच-टू-टेक्स्ट ट्रांसक्रिप्शन के लिए एआई के इस्तेमाल की इजाज़त देते हैं। तथा ये नियम एआई का इस्तेमाल जटिल अंग्रेजी फैसलों का क्षेत्रीय भाषाओं में तुरंत अनुवाद करने के लिए भी इजाज़त देते हैं, जिससे क्षेत्रीय भाषाएँ बोलने वाले लोगों को न्याय पाने में मदद मिलेगी।

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इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों के तहत एआई के इस्तेमाल पर सख्त लक्ष्मण रेखा भी तय की है। अदालत ने साफ तौर पर अंतिम फैसले लेने, गवाहों को परखने या जमानत और सजा तय करने के लिए एआई के इस्तेमाल पर रोक लगाई है। यह एक अहम कदम है क्योंकि ऐसे कार्य कानून के साथ-साथ इंसानी मूल्यों और अनुभवों के साथ ही बेहतर तरीके से होते हैं।


वकीलों को बताना होगा एआई के इस्तेमाल का ब्यौरा

अमेरिका जैसे देशों में, ऑटोमेटेड रिस्क-स्कोरिंग एल्गोरिदम की वजह से भेदभाव भी देखे गए हैं, जिनसे अक्सर अल्पसंख्यक लोगों की गलत तरीके से प्रोफाइलिंग होने के मामले सामने आये हैं। ये नियम एल्गोरिदम के प्रयोग से होने वाले संभावित भेदभाव को रोकते हुए, न्यायिक अधिकारियों को अपने विवेक का प्रयोग करते हुए न्यायिक कार्य करने के लिए निर्देशित करते हैं। साथ ही, इन नियमों के तहत, वकीलों को यह साफ तौर पर बताना होगा कि वे अपनी दलीलें या सबमिशन तैयार करने के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं या नहीं जोकि पारदर्शिता बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

अनुच्छेद 145 के तहत
 

हालांकि, भारतीय न्यायपालिका के भविष्य को ध्यान में रखकर बनाए गए इन नियमों ने एक अहम संवैधानिक बहस को भी जन्म दिया है, खासकर 'शक्तियों के बंटवारे' के मुद्दे पर। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 145 के तहत, सुप्रीम कोर्ट को अपनी अंदरूनी प्रक्रियाओं को रेगुलेट करने का अधिकार तो है, परन्तु, ये ड्राफ्ट नियम एक राष्ट्रीय सिस्टम बनाते हैं, जिसमें एआई के कामकाज की देखरेख के लिए एक शीर्ष संस्था, राज्य स्तर पर कामकाज की देखरेख के लिए हाई कोर्ट सचिवालय और एक 'सेंटर ऑफ़ रिसर्च एंड एक्सीलेंस' शामिल हैं।

इसके अलावा, ये राज्य की अदालतों और स्वतंत्र वकीलों पर अनिवार्य अनुपालन भी लागू करते हैं। कई आलोचकों का तर्क है कि इस तरह का रेगुलेटरी दखल न्यायिक कार्य के बजाय कानूनी या विधायी कार्य जैसा लगता है, जिनको करने की जिम्मेदारी अदालत की जगह संसद की है और सुप्रीम कोर्ट का ऐसे नियमों को बनाना 'शक्तियों के बंटवारे' को धुंधला करता है जो की भारत के संविधान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।


 

संक्षेप में यह कहना अनुचित नहीं होगा कि टेक्नोलॉजी डेटा प्रोसेसिंग जैसे कार्य बहुत तेज़ी से ज़रूर कर सकती है, लेकिन अभी भी, यह इंसानी सहानुभूति, निष्पक्षता या संदर्भ-आधारित विवेक की पूरी तरह से नकल नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट के ये नियम यह सुनिश्चित करते हैं कि अदालतें टेक्नोलॉजी से आधुनिक बनती रहें और एआई जज के बजाय एक कुशल मुंशी के रूप में न्याय की मानवीय भावना को बरकरार रखे।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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