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अध्ययन कक्ष: द रिवॉल्यूशनिस्ट्स, आज के ईरान को समझना हो तो
Sun, 18 Jan 2026 05:56 AM IST
लव गौर
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: लव गौर
Updated Sun, 18 Jan 2026 05:56 AM IST
सार
- द रिवॉल्यूशनिस्ट्सः द स्टोरी ऑफ द एक्सट्रीमिस्ट हू हाइजैक्ड द नाइंटीन सेवेंटीस
- लेखक : जेसन बर्क
- प्रकाशक : बोडली हेड
- मूल्य : 3,016 रुपये (हार्डकवर)
दशकों के शोध के बाद लिखी गई यह बेस्टसेलर किताब बताती है कि 1970 का दशक ईरान समेत पूरे प. एशिया में वाम उग्रवाद के उदय का था, जिसके शांत होने पर इस्लामी आतंकवाद का उदय हुआ, जो अधिक कट्टर व खौफनाक था।
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द रिवॉल्यूशनिस्ट्सः द स्टोरी ऑफ द एक्सट्रीमिस्ट हू हाइजैक्ड द नाइंटीन सेवेंटीस
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
द गार्जियन के पत्रकार जेसन बर्क ने अपनी बेस्टसेलर किताब द रिवॉल्यूशनिस्ट्स में बताया है कि पश्चिम एशिया में वामपंथी उग्रवादियों की जगह इस्लामी उग्रवादियों ने कैसे ले ली। यह किताब 1960 के दशक के आखिर से लेकर 80 के दशक की शुरुआत तक, पश्चिम एशिया में बढ़ती हिंसा का सही और दिलचस्प ब्यौरा प्रस्तुत करती है।
अगस्त 1969 में, पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ फलस्तीन द्वारा प्रशिक्षित एक व्यक्ति और एक महिला ने रोम से तेल अवीव जा रहे एक अमेरिकी यात्री विमान को अपहृत कर लिया। विमान दमिश्क में उतरा, जहां यात्रियों और क्रू सदस्यों के उतरने के बाद उसके अगले हिस्से को उड़ा दिया गया। उस दिन फलस्तीन समर्थक मशहूर व बदनाम आइकन अपहर्ता लैला खालिद ने यात्रियों से बात करने की कोशिश की, उन्हें टॉफियां बांटी और समझाया कि वह इस्राइली जुल्म के साथ-साथ दुनिया भर में वामपंथी क्रांतिकारियों के प्रयासों को भी सबके सामने लाना चाहती हैं।
1969 में अपने बेपरवाह बंधकों को घूरते हुए खालिद ने कहा, ‘हम तीसरी दुनिया और क्रांति का हिस्सा हैं, और सभी दबे-कुचले लोगों से प्यार करने वालों को सलाम!’ यह घटना बर्क की लंबी और वृहद अनुसंधान आधारित कहानी के लिए जमीन तैयार करती है, जो फलस्तीनी प्रशिक्षण शिविर और जर्मन जेलों से लेकर काहिरा और तेहरान की सड़कों तक घूमती है। इस घटना ने पश्चिम को डरा दिया था। 1970 के दशक में अगर अपहरणकर्ताओं ने फलस्तीनी मुद्दे को वामपंथी क्रांतिकारियों के बीच एक वैश्विक मुहिम बनाने की कोशिश में किसी को भी मारने से बचने की कोशिश की थी, तो दशक के आखिर तक सुन्नी और शिया मुस्लिम जिहादियों के वर्चस्व वाले आंदोलन में खून-खराबा मुख्य तरीका बन गया था।
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बर्क लिखते हैं कि दोनों आंदोलनों का मकसद उन वैश्विक ताकतों के तूफान का विरोध करना था, जिन्हें उनके मानने वाले यहूदीवाद, साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के रूप में देखते थे। उन्होंने कई ऐसे खतरनाक हमले किए, जिन्होंने सरकारों को घुटनों पर ला दिया। दशकों के शोध, सरकारी फाइलों, गुप्त दस्तावेजों और अपहरणकर्ताओं, जासूसों, गवाहों तथा पीड़ितों के साथ इंटरव्यू के आधार पर, जेसन बर्क हमें इन जानलेवा अभियानों की अंदरूनी जानकारी देते हैं। संघर्ष लगातार बदल रहा है, पर पश्चिम एशिया में इतने सारे लोग, जो विस्थापन और अधिकारों से वंचित होने की गहरी भावना महसूस करते हैं, उस पर कभी ध्यान नहीं दिया जाता।
ये भी पढ़ें: अध्ययन कक्ष: परिधानों के पीछे की कहानी
द रिवॉल्यूशनिस्ट्स बताती है कि कैसे धर्मनिरपेक्ष वामपंथी क्रांतिकारियों के नेतृत्व वाला एक अभियान, रूढ़िवादी धार्मिक कट्टरपंथ से कहीं ज्यादा खतरनाक आंदोलन में बदल गया, जो आने वाले दशकों पर हावी रहेगा। इस किताब को पढ़े बिना आज की दुनिया को समझना लगभग नामुमकिन है।
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अगस्त 1969 में, पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ फलस्तीन द्वारा प्रशिक्षित एक व्यक्ति और एक महिला ने रोम से तेल अवीव जा रहे एक अमेरिकी यात्री विमान को अपहृत कर लिया। विमान दमिश्क में उतरा, जहां यात्रियों और क्रू सदस्यों के उतरने के बाद उसके अगले हिस्से को उड़ा दिया गया। उस दिन फलस्तीन समर्थक मशहूर व बदनाम आइकन अपहर्ता लैला खालिद ने यात्रियों से बात करने की कोशिश की, उन्हें टॉफियां बांटी और समझाया कि वह इस्राइली जुल्म के साथ-साथ दुनिया भर में वामपंथी क्रांतिकारियों के प्रयासों को भी सबके सामने लाना चाहती हैं।
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1969 में अपने बेपरवाह बंधकों को घूरते हुए खालिद ने कहा, ‘हम तीसरी दुनिया और क्रांति का हिस्सा हैं, और सभी दबे-कुचले लोगों से प्यार करने वालों को सलाम!’ यह घटना बर्क की लंबी और वृहद अनुसंधान आधारित कहानी के लिए जमीन तैयार करती है, जो फलस्तीनी प्रशिक्षण शिविर और जर्मन जेलों से लेकर काहिरा और तेहरान की सड़कों तक घूमती है। इस घटना ने पश्चिम को डरा दिया था। 1970 के दशक में अगर अपहरणकर्ताओं ने फलस्तीनी मुद्दे को वामपंथी क्रांतिकारियों के बीच एक वैश्विक मुहिम बनाने की कोशिश में किसी को भी मारने से बचने की कोशिश की थी, तो दशक के आखिर तक सुन्नी और शिया मुस्लिम जिहादियों के वर्चस्व वाले आंदोलन में खून-खराबा मुख्य तरीका बन गया था।
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बर्क लिखते हैं कि दोनों आंदोलनों का मकसद उन वैश्विक ताकतों के तूफान का विरोध करना था, जिन्हें उनके मानने वाले यहूदीवाद, साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के रूप में देखते थे। उन्होंने कई ऐसे खतरनाक हमले किए, जिन्होंने सरकारों को घुटनों पर ला दिया। दशकों के शोध, सरकारी फाइलों, गुप्त दस्तावेजों और अपहरणकर्ताओं, जासूसों, गवाहों तथा पीड़ितों के साथ इंटरव्यू के आधार पर, जेसन बर्क हमें इन जानलेवा अभियानों की अंदरूनी जानकारी देते हैं। संघर्ष लगातार बदल रहा है, पर पश्चिम एशिया में इतने सारे लोग, जो विस्थापन और अधिकारों से वंचित होने की गहरी भावना महसूस करते हैं, उस पर कभी ध्यान नहीं दिया जाता।
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द रिवॉल्यूशनिस्ट्स बताती है कि कैसे धर्मनिरपेक्ष वामपंथी क्रांतिकारियों के नेतृत्व वाला एक अभियान, रूढ़िवादी धार्मिक कट्टरपंथ से कहीं ज्यादा खतरनाक आंदोलन में बदल गया, जो आने वाले दशकों पर हावी रहेगा। इस किताब को पढ़े बिना आज की दुनिया को समझना लगभग नामुमकिन है।