फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   story of tousif shah a young activist working with korku tribal unemployed youngsters in khandwa district madhya pradesh

युवा कदम: कहानी तौसिफ शाह की, जिन्होंने बदल दी 49 गांवों के 4 हजार बच्चों की दुनिया

Tue, 27 Jul 2021 12:09 PM IST
Sandip Naik संदीप नाईक
Updated Tue, 27 Jul 2021 12:09 PM IST
सार

तौसिफ शाह खंडवा के रहने वाले हैं, जिनका बचपन संघर्ष में बीता। तौसिफ के भीतर दुनिया बदलने का जज्बा है, इसी जज्बे के बूते उन्होंने आदिवासी समुदाय के बच्चों को प्रशिक्षित कर उनकी दुनिया बदल दी।

पढ़िए तौफिक के युवा कदमों की कहानी विस्तार से इस लेख में..!

विज्ञापन
story of tousif shah a young activist working with korku tribal unemployed youngsters in khandwa district madhya pradesh
“हुनर की पाठशाला” ने पहली बार में 100 युवा कोरकू (आदिवासी) जो पलायन करने वाले बेरोजगार थे। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

खालवा मप्र के खंडवा जिले का कोरकू आदिवासी बहुल ब्लॉक है, जहां कुपोषण बहुत ज्यादा है और तौसिफ एक युवा हैं जो कुपोषण दूर करने का विभिन्न तरीकों से प्रयास कर रहे हैं ताकि जिले के माथे पर लगा यह दाग़ मिट सके। इसके लिए उन्होंने हुनर की पाठशाला की स्थापना की है, जो युवाओं को शिक्षा के साथ-साथ हुनर भी सिखाती है और आजीविका का भी प्रबंध करती है। 

विज्ञापन


कहानी तौसिफ शाह की जो बदल रहे हैं युवाओं की दुनिया 
तौसिफ शाह खंडवा के रहने वाले हैं, जिनका बचपन संघर्ष में बीता, पिता ने परिवार को लम्बे समय पहले ही छोड़ दिया था। तौसिफ की माताजी अरबी की शिक्षिका हैं जिन्होंने आठ सदस्यों वाले परिवार को अपनी मेहनत से पाला पोसा। तौसिफ जब थोड़े बड़े हुए तो मां को संघर्ष करते हुए देखा, उन्होंने भी अपने मामा से मोटर मैकेनिक का काम सीखा और एक गैराज में काम करना शुरू किया पर इस सब में पढ़ाई छूट गई। एक मिशनरी संस्था ने परिवार की आर्थिक मदद की तो तौसिफ को पुन: पढ़ने का हौसला भी दिया और मदद भी की, तब वे पढ़ाई की ओर लौटे।
विज्ञापन


इधर मिशनरी ने उनकी बड़ी बहन को स्थानीय संस्था में नौकरी दिलवाई तो उन्हें भी बहन के साथ संस्था के काम देखने सीखने का मौका मिला। तौसिफ को लगता है कि काश वो भी गैराज छोड़कर कुछ समुदाय के लिए कर पाते। एक दिन उन्होंने दिल की बात मिशनरी के लोगों से कही तो मिशनरी वालों ने उन्हें जबलपुर में विकास से सम्बंधित एक पाठ्यक्रम में भेजने के लिए सहयोग की बात की। तौसिफ तैयार हो गए और इस तरह से जबलपुर की पढ़ाई ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।  
विज्ञापन
विज्ञापन


लौटकर आए तो उसी संस्था में काम किया जहां उन्होंने कोरकू समुदाय के बारे में जाना, समझा और साथ ही गांवों में गरीबी, खेती और आजीविका की समस्याएं देखीं। संस्था में लगभग ढाई साल कम करने के बाद उन्हें लगा कि अभी भी बहुत कुछ करने की जरूरत है जो संस्था के दायरे में नहीं हो सकता, उन्होंने काम छोड़ दिया और खुद अपना काम करने का सोचा।  

तौसिफ ने इस तरह शुरू किया काम 
संस्था से काम छोड़कर जब एक बस्ती में कचरा बीनने वाले बच्चों के साथ काम शुरू किया, लेकिन यह बिना उस्ताद के समंदर में गोता लगाने के तरह था। वे बच्चे तौसिफ से दोस्ती नहीं करते थे, जिसके लिए उन्होंने उन्हीं बच्चों के साथ कचरा उठाना शुरू किया, और फिर कुछ दिन में वे बच्चे दोस्त बन गए और पढ़ने के लिए तैयार हो गए, पर परिवार की जीविका के लिए कोई सहयोग नहीं था।

इधर इसके लिए एक संस्थान में सेक्स वर्करों के सर्वे और सर्विस देने का कार्य उन्हें मिला जो कि उन्होंने किया भी, लेकिन शायद सपना कुछ बड़ा जो खुद समाज के बीच कुछ करने का था वह अभी अधूरा था। उनकी मुलाकात इसी बीच पुराने साथियों से हुई और सब ने तय किया कि वे खालवा के कोरकू आदिवासी समुदाय के बीच रोजगार और शिक्षा को लेकर कार्य करेंगे। वे कहते हैं कि इस तरह हम 4 युवा साथियों ने मिलकर  “हुनर की पाठशाला” पहल शुरू की।  
 

story of tousif shah a young activist working with korku tribal unemployed youngsters in khandwa district madhya pradesh
तौसिफ अब तक 49 गांव में काम कर चुके हैं और 4 हजार बच्चों को प्रशिक्षित कर चुके हैं। - फोटो : अमर उजाला

तौसिफ के प्रयास और हुनर की पाठशाला 
“हुनर की पाठशाला” ने पहली बार में 100 युवा कोरकू (आदिवासी) जो पलायन करने वाले बेरोजगार थे। उन्हें रोजगार से जोड़ने के प्रयास किए, साथ ही आदिवासी क्षेत्र के 10 गांव में प्रशिक्षण शुरू किए जिसमें युवाओं को ब्लॉक प्रिटिंग, साइकिल रिपेयरिंग, सामूहिक खेती के प्रशिक्षण के साथ अपने रोजगार को गांव में शुरू करने के लिए सहयोग भी दिया।
 

“यह एक सीखने वाला समय रहा था, हमने 20 युवाओं के रोजगार की दुकान शुरू करने के लिए सामग्री सहयोग किया, लेकिन सिर्फ 2 दुकान ही चली बाकी बंद हो गईं”- 

तौसिफ अफ़सोस से कहते हैं- यह प्रयास किया गया कि यह प्रकल्प फेल क्यों हुआ - गांव में बैठक में समझा कि - समुदाय के बीच शिक्षा का स्तर बहुत निम्न है, जिसके कारण उन्हें अपने हुनर, खेती और कार्यो का मूल्य नहीं मालूम, वे अपने कार्य या समुदाय को दूसरों से या शहरों से कम आंकते हैं, जिसके चलते वे अकुशल मजदूर के रूप में ही कार्य करते आ रहे हैं, और फिर यहां से शिक्षा और आजीविका की पहल को तौसिफ ने एक साथ करने का निर्णय लिया।  

तौसिफ के लिए आगे मुश्किलें बहुत ज्यादा थींं। एक तो खुद के परिवार के लिए आमदनी जुटाना और दूसरा संस्था चलाने के लिए रुपयों की जरूरत- वे कहते है - “मेरे लिए यह बहुत मुश्किल कार्य था चूंकि कोई सहयोग नहीं था, हमने 2014 में संस्था को स्वरूप दिया, रजिस्ट्रेशन की प्रकिया पूर्ण हुई, लेकिन सहयोग कुछ नहीं था। मैं हफ्ते में 3 दिन सब्जी बेचता था और बाकी 4 दिन अपने साथियों को फील्ड में काम करने में मदद करता था, यहीं से हम अपना घर भी चलाते और संस्थागत गतिविधियों को भी पूरा करते रहे। 

तौसिफ याद करते हैं- वह समय बड़ा खराब था। गेराज उनके भाई संभालने लगे थे, अब चिंता थी संस्था के साथियों को सहयोग पहुंचाने की थी, तब उन्होंने वापस अपनी सब्जी और फल की दुकान साप्ताहिक बाजारों में लगाना शुरू की। 2016 में एक साथी ने हमसे पूछा कि गांव में तुम्हें काम करने के लिए कितने रुपये प्रतिमाह की जरूरत है- हमने कहा 3 हजार रुपये महीने में हम अपना काम कर सकते हैं। उन्होंने हमें 1 वर्ष तक 3000 रुपये प्रति माह तक सहयोग किया और हमने अपने शिक्षा के कार्यो को जमीन पर करना शुरू किया।  


अपनी उपलब्धियों के बारे में तौसिफ कहते हैं-

“अभी तक हमने कोरकू आदिवासी समुदाय के 7 से 14 वर्ष के 4000 बच्चों को केंद्र के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जोड़ने के लिए 49 गांव में कार्य किया है। यह सहयोग दिल्ली के एक संस्थान द्वारा मिला। 

2016 में 400 आदिवासी किसानों के साथ मिलकर समूह बनाकर कोरो किसान के नाम से प्याज को एक नाम के साथ स्टोर कर दिल्ली तक बेचा व किसानों को उचित दाम दिलवाया जोकि एक बड़ा काम था किसानों के हित में। 2017 में 2 सामुदायिक शिक्षा केन्द्र स्थापित किए जहां सीखने-सिखाने और पढ़ने-पढ़ाने को लेकर खुद की सीखा को बेहतर किया और स्थानीय बोली में बच्चों के लिए पाठ्यक्रम विकसित किया”। 

पगडंडी यात्रा का काम 
एक सबसे बड़ा काम जो हमने किया वो पगडंडी यात्रा का था जो 2017 से शुरू हुआ और जिसमें देशभर व अन्य देशों के युवाओं को आमंत्रित कर समुदाय के बीच 8 दिन रहने का अनुभव प्रदान करते थे। कोरकू आदिवासी समुदाय की संस्कृति को समझना, देखना और उन्हें क्या मदद की जा सकती है- इस पर यात्रा का जोर रहता था।

आठ दिन का यह शैक्षिक सफ़र सभी भागीदार तय करते हैं जिसमें कोरकू समुदाय के बारे में बाहरी दुनिया के लोगों को जानने समझने का मौका मिलता है, साथ ही शहरी युवाओं को ग्रामीण युवाओं से जोड़कर उनके सपनों को पाने के लिए एक रास्ता बनाने का प्रयास होता है। 

यह यात्रा ट्रेक्टर पर बने एक घर मे होती है, जो सतपुड़ा के बीच उसमे फैली असीम कोरकू सभ्यता को जानने-समझने के साथ युवाओं को प्रेरित करती है कि युवा पुन: गांव की ओर वापस लौटें और सार्थक कार्य करें। 

यात्रा के द्वारा अब तक 510 शाला त्यागी बच्चों की पहचानकर उन्हें स्कूल से जोड़ने का प्रयास किया गया है। यात्रा के ही एक यात्री द्वारा 100 बालिकाओं की शिक्षा के लिए 1 वर्ष के लिए सहयोग प्रदान किया गया- जिसमें उन बालिकाओं को किताबें, यूनिफार्म और ट्यूशन मुफ्त में दी गई। यात्रा के ही 10 युवा यात्रियों द्वारा गांव में लाइब्रेरी के लिए 1000 कहानियों की पुस्तक पहुंचाई गई।  



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed