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महर्षि अरविन्द की 153वीं जन्म जयंती पर विशेष: महर्षि अरविन्द के शिक्षा सम्बन्धी चिन्तन पर
सार
महर्षि अरविन्द को वह दिव्य दृष्टि प्राप्त थी, जिसके बदौलत वे भारत का भविष्य कैसा होगा? इस महत्वपूर्ण सवाल पर विचार करते हुए जो दावा करते हैं- वह दिव्य वाणी उनके 15 अगस्त 1947 के रेडियो संदेश में भी सुनायी देती है- "आज भारत स्वतंत्र है, परन्तु उसमें एकता नहीं आ पाई है।
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महर्षि अरविन्द
- फोटो : X/@@SachinDubey4444
विस्तार
महर्षि अरविन्द के विषय में सुपरिचित फ्रांसीसी विद्वान रोम्या रोलां के इस कथन पर ध्यान दें-
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"एशिया और यूरोप के प्रतिभाओं में सबसे अधिक पूर्ण समन्वय जिस व्यक्तित्व में हुआ है, वे श्री अरविन्द हैं- इस अन्तिम महान ऋषि ने अपने हाथों, अपने दृढ़ तथा तत्पर मुट्ठी में रचनात्मक ऊर्जा के धनुष को धारण कर रखा है।" महर्षि अरविन्द अपने अन्तर दृष्टि से यह देख सकें थे कि भारत को आजादी मिल जाएगी।
वह समय आया 15 अगस्त 1947 को, जब वे पृथ्वीलोक पर अपने अवतरण के 75 वें साल में प्रवेश कर रहे थे। महर्षि अरविन्द भारत की आजादी के लिए तो आशान्वित तो थे ही, वे यह भी यह स्वीकार करते है कि - "रूसी क्रांति की सफलता में भी उन्होंने आध्यात्मिक सहायता की थी।"
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महर्षि अरविन्द को वह दिव्य दृष्टि प्राप्त थी, जिसके बदौलत वे भारत का भविष्य कैसा होगा? इस महत्वपूर्ण सवाल पर विचार करते हुए जो दावा करते हैं- वह दिव्य वाणी उनके 15 अगस्त 1947 के रेडियो संदेश में भी सुनायी देती है- "आज भारत स्वतंत्र है, परन्तु उसमें एकता नहीं आ पाई है। अगर यही स्थिति बनी रही, तो हम पुनः बीच में गिर पड़ेंगे और वहां पहुंच जायेंगे, जहां हम अंग्रेजों के पहले थे।
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हिन्दुओं और मुसलमान के बीच सांप्रदायिक विभाजन अब देश के स्थायी राजनीतिक विभाजन के रूप में सुदृढ़ होता प्रतीत हो रहा है। हमें यह आशा करनी चाहिए कि इस निश्चित तथ्य को एक स्थायी उपाय से कुछ अधिक के रूप में स्वीकार नहीं किया जायेगा। उनका दूसरा संदेश था एशियाई जनता की मुक्ति, मानव सभ्यता की प्रगति में उसकी महान भूमिका की ओर वापस लाना।
अपने तीसरे संदेश में वे चाहते हैं कि मानवता के उज्जवल और आदर्श जीवन के लिए विश्व संघ की स्थापना हो। महर्षि अरविन्द यह जानते थे कि इस मार्ग में अनेक कठिनाइयां हैं। लेकिन उन्हें यह पूर्ण भरोसा था कि अगर सर्वोच्च शक्ति का अस्तित्व है, तो ये अवश्य पराभूत होंगी।इस सन्दर्भ में हमें श्री मां यह संदेश भी याद रखना चाहिए। यह बात 6 अक्टूबर 1969की है। देश की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी और श्रीमती नन्दिनी सत्पथी श्री मां का दर्शन करने गयी। श्री मां ने उनसे कहा कि " भारत को अब भविष्य की दृष्टि में रखकर काम करना चाहिए।
उसे विश्व का नेतृत्व करना है। एक अरसे से शासन विरोध और वैमनस्य के द्वारा ही चलाया जाता रहा है। अब समय आ गया है कि शासन पारस्परिक सूझ-बूझ और सहयोग द्वारा होना चाहिए। इसी माध्यम से ही भारत विश्व रंगमंच पर अपना सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर सकता है।" क्या आज के सत्ताधारी दल और विपक्षी दलों के नेता श्री मां इस सन्देश से कोई सबक सीखने को तैयार हैं।?
महर्षि अरविन्द की जीवन यात्रा में 30 मई 1909 को उत्तरपाड़ा में दिये भाषण में सनातन धर्म के बारे में उनके श्रेष्ठ विचार प्रकट हुए ही हैं।पर उसके बाद उनके जीवन में एक तरह से कायांतरण होता गया।अलीपुर जेल में भी उन्हें अनेक दिव्य संदेश प्राप्त हो रहे थे। इस षडयंत्र केस से बरी होने के बाद वे उग्रपंथी राजनीति से अलग होकर आध्यात्मिक यात्रा पर निकल पड़े।
उनका साधना केन्द्र बना पांडिचेरी। फिर भी देश-दुनिया में घटित हो रही घटनाओं को वे अपनी दिव्य दृष्टि से देख रहे थे।पहले 'वन्देमातरम ' फिर 'आर्य ' और 'कर्मयोगी ' पत्रिकाओं के माध्यम से अपना सन्देश दुनिया को दे रहे थे। महर्षि अरविन्द की यह मान्यता है कि "भारत अपने अतीत के उद्घाटन में ही भविष्य की आशा देखता है।"
इस अवधारणा की पुष्टि के लिए उन्होंने 'फाउंडेशन ऑफ इंडियन कल्चर' 'सीक्रेट ऑफ वेद ' और 'लाइफ डिवाइन' समेत कई कई पुस्तकों की रचना किया।पर इन दार्शनिक- आध्यात्मिक मान्यताओं के अलावा उनकी शिक्षा सम्बन्धी मौलिक चिन्तन भारत में सदियों पुरानी गुरूकूलों की परम्परा से मेल खाती है।
महर्षि अरविन्द की शिक्षा सम्बन्धी चिन्तन को साकार रूप प्रदान करने के लिए श्री मां ने 6जनवरी 1952 को 'श्री अरविन्द इन्टरनेशनल यूनिवर्सिटी सेन्टर'की स्थापना किया, लेकिन बाद में अन्य विश्वविद्यालयों में प्रचलित शिक्षा प्रणाली से बिल्कुल अलग उद्देश्य से संचालित इस संस्था का नामकरण किया गया 'श्री अरविन्द इन्टरनेशनल सेन्टर फार एजुकेशन'।
जिन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस सेन्टर की स्थापना की गयी थी, उसकी जड़े 17 नवम्बर 1973 को श्री मां के देहत्याग के पूर्व अपनी जड़ें जमा चुकी थी।
महर्षि अरविन्द की शिक्षा सम्बन्धी चिन्तन में तीन बातें स्पष्ट हैं - पहला यह कि हर व्यक्ति में सोचने की क्षमता होती है। दूसरा हर व्यक्ति में कल्पना करने की भी क्षमता होती है।तीसरा यह कि हर व्यक्ति में कुछ न कुछ रचनात्मक गुण भी होते हैं। एक शिक्षक का कर्तव्य है कि -वे अपने विघार्थियों में इन गुणों की पहचान करें, उसे विकसित करें।उस दिशा में उन्हें सोचने - विचार करने और कुछ करने के लिए बार -बार प्रेरित करें।
महर्षि अरविन्द की इस शिक्षा प्रणाली से हम सीख सकते हैं कि - एक शिक्षक को अपने विघार्थियों को कुछ सीखना नहीं है। विघार्थियों को स्वयं कुछ करते हुए सीखना है। इस तरह सीखने की न कोई तय समय सीमा है, न कोई डिग्री प्राप्त कर नौकरी प्राप्त करना भर इस शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य है। यह शिक्षा ताउम्र चल सकती है।
इस प्रणाली में यह अंतर्निहित है कि इस पद्धति से सिर्फ विद्यार्थियों की ही प्रगति नहीं होती, बल्कि स्वयं अध्यापक भी बहुत हद तक लाभान्वित होते हैं।एक अच्छे अध्यापक के लिए जरूरी है कि वह तब तक अपने विद्यार्थियों से कुछ करने के लिए नहीं कहें, जिसे वह स्वयं पहले आजमा न हो चुका हो।
इस सम्बन्ध में अरविन्द इन्टरनेशनल एजुकेशन सेन्टर के डायरेक्टर का कहना है कि है- आज की शिक्षा व्यवस्था में यह प्रचलित अवधारणा है कि- एक शिक्षक अपने छात्रों को वहीं पढ़ाता है जिसे वह जानता है।महर्षि अरविन्द की दृष्टि में यह मूलतः गलत अवधारणा है। इसके बजाय एक योग्य अध्यापक का यह कर्तव्य होगा कि वे विद्यार्थियों को बतावें कि उस विषय को वह स्वयं कैसे सीख सकते हैं।
यह सीखने के लिए उन्हें अपने ही तरीके की खोज करनी होगी। यह तरीका भी उन्हें स्वयं ढूंढना होगा कि इस स्वयं अर्जित विद्या को कैसे व्यवस्थित किया जाये। इस तरह स्वयं कुछ करते हुए सीखने को ही जॉन डेवी शिक्षा का असल उद्देश्य बताते है।
महर्षि अरविन्द की शिक्षा प्रणाली को 'एकीकृत शिक्षा' कहा गया है। इस शिक्षा प्रणाली का मूल उद्देश्य है कि वह विद्यार्थियों में हर तरह की रचनात्मक क्षमताओं का विकास करें। यह शिक्षा ऐसी व्यवस्था है , जो विघार्थियों की चेतना को उच्चतम शिखर पर पहुंचा सकने में मददगार होगी। इस शिक्षा का उद्देश्य हैं - समाज के लिए तेजस्वी और आदर्श विद्यार्थी तैयार करना।
इस तरह का वातावरण बनाना ताकि विद्यार्थियों के शारीरिक, मौलिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक व्यक्तित्व का विकास सम्भव हो सकें। इस शिक्षा प्रणाली के तहत मानविकी और विज्ञान को एक दूसरे के करीब लाना है ताकि संयुक्त रूप से दोनों का विकास हो सकें। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर दुनिया में आपसी एकता का संदेश देना और भारत को आपसी सौहार्द के जरिये अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में सुधार करने की लागातार कोशिश करते रहना उनके शिक्षा सम्बन्धी चिन्तन की मौलिक देन हैं।
महर्षि अरविन्द की इस सर्वकालिक महत्वपूर्ण शिक्षा और संदेश को आज भी दुनिया गौर से सुनेगी। ऐसा दृढ़ विश्वास उस युग पुरुष को था। उन्हें यह भी पक्का भरोसा था कि भारत का विभाजन ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध है। एक न एक दिन इसका एकीकृत होना निश्चित है।
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